गाँधी युग (Gandhi Era) Part 3 for Arunachal Pradesh PSC

Glide to success with Doorsteptutor material for UGC : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

Download PDF of This Page (Size: 124K)

खिलाफत आंदोलन का प्रारंभ

खिलाफत के प्रश्न के कारण जो मुस्लिम नेता भारत के राष्ट्रीय जागरण से सहानुभूति रखते थे, वे खिलाफत आंदोलन के प्रवर्तक बन गए। शौकत अली, मोहम्मद अली (अली बंधु), डा. अंसारी, हकीम अजमल खांंँ तथा मौलाना आजाद जैसे कांग्रेसी नेताओं के विचार से खिलाफत की समस्या एक धार्मिक तथा राजनीतिक समस्या थी।

अली बंधुओं सहित मौलाना आजाद, हकिम अजमल खां और हसरत मौहानी के नेतृत्व में एक खिलाफत कमिटी (समिति) बनी और देश व्यापी आंदोलन का आयोजन किया गया। मुस्लिम धर्म के नेताओं ने भी उनकी भरपूर सहायता की। कमिटी ने 24 नंवबर 1919 ई. को गांधी जी की अध्यक्षता में ऑल (पूरा) इंडिया (भारत) खिलाफत कान्फ्रेंस (सम्मेलन) का आयोजन किया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि जब तक सरकार उनकी मांगों को न मान ले तब तक वे किसी प्रकार का सहयोग नहीं करेंगे। बाल गंगाधर तिलक और गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन को हिन्दु मुस्लिम एकता को सुदृढ़ बनाने और बड़ी संख्या में मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन में लाने का सुनहरा मौका समझा। गांधी जी के परामर्श पर डा. अन्सारी की अध्यक्षता में मुसलमानों का एक शिष्ट मंडल वायसराय चेम्सफोर्ड से मिला, परन्तु वायसराय ने इस शिष्ट मंडल को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। अगली योजना यह बनायी गई कि एक शिष्ट मंडल लंदन जाकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री से भेंट करे तथा उनके पुराने खिलाफत बनाये रखने के वायदे का उन्हें स्मरण कराया जाए। मार्च, 1920 ई. में मौलाना मुहम्मद अली की अध्यक्षता में एक शिष्ट मंडल लंदन जाकर प्रधानमंत्री लायड जार्ज से मिला किन्तु कोई फायदा नहीं हुआ। शिष्ट मंडल खाली हाथ भारत लौट आया।

खिलाफत आंदोलन के समर्थन में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। इस तरह खिलाफत आंदोलन असहयोग आंदोलन का एक हिस्सा बन गया। असहयोग आंदोलन के दौरान गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर हिंसात्मक घटना हो जाने के कारण गांधी जी ने इस आंदोलन को स्थगित कर दिया। इसी समय ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी को बंदी बनाकर छ: वर्ष के लिए जेल भेज दिया। इससे खिलाफत आंदोलन में भी शिथिलता आ गई।

ब्रिटिश सरकार ने मालाबार में मुसलमानों के विद्रोह (मोपला विद्रोह) का कठोरता पूर्वक दमन किया और हिन्दू -मुस्लिम भेद की नीति अपनाकर सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन दिया। इससे खिलाफत आंदोलन पहले राजनीतिक रहा और बाद में धार्मिक बन गया। अंतत: ब्रिटिश सरकार अपनी कूटनीति से इस आंदोलन को दबाने में सफल रही।

आंदोलन का परिणाम

  • खिलाफत आंदोलन लीग और कांग्रेस के आपसी सहयोग पर आधारित था। इस आंदोलन के पतन से हिन्दू-मुस्लिम एकता पर घातक-प्रभाव पड़ा, साथ ही भारतीय राजनीति में मुस्लिम लीग का प्रभाव क्षीण हुआ।

  • खिलाफत आंदोलन के कारण ही ब्रिटिश सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ी और उसने भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए फूट डालो और शासन करो की नीति को अपनाया।

  • खिलाफत आंदोलन ने भारत में सांप्रदायिक एकता की नींव रखी, परन्तु यह एकता शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गयी।

  • खिलाफत आंदोलन की विफलता ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के स्वप्न को भंग कर दिया।

  • 1922 ई. में तुर्की में कमाल पाशा के नेतृत्व में गणतंत्र की स्थापना हुई और 1924 ई. में तुर्की संसद दव्ारा खलीफा के पद की समाप्ति ने खिलाफत के प्रश्न को ही सदा के लिए समाप्त कर दिया।

  • कांग्रेस लीग (संघ) समझौते का खोखलापन स्पष्ट हो गया और इस समझौते ने ही अंतत: पाकिस्तान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

  • राष्ट्रीय नेताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन के मंच से खिलाफत के प्रश्न को उठाकर मुसलमानों को खुश तो किया लेकिन कालांतर में मुस्लिम संप्रदाय के नेताओं ने सांप्रदायिकता के आवेग में देश के विभाजन की मांग की।

Developed by: