व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 20 for Arunachal Pradesh PSC

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सामाजिक चिंतन

अंबेडकर संघर्ष के प्रतीक थे। जाति रूपी दुर्ग की रचना, जिसकी बुनियाद अन्याय एवं शोषण पर रखी गयी है, उसे ध्वस्त करना वे जरूरी समझते थे। अंबेडकर की पीड़ा समाज के निम्न से निम्न एवं कमजोर से कमजोर व्यक्ति को स्वतंत्रता दिलानें की थी। उन्होंने सामाजिक जीवन के विविध पक्षों का गहन एवं विस्तृत अध्ययन किया था। एक विदव्ान का विचार है कि ’अंबेडकर के अध्ययन का विस्तार तथा उनकी दृष्टि की व्यापकता, विश्लेषण की गहनता व सोच की तार्किकता और कार्य के लिये उनके दव्ारा दिये गए मानवीय सुझाव लोगों को बरबस तत्पर व क्रियाशील बना देते थे।’

उनकी मान्यता थी कि शोषण के विरुद्ध श्रमिकों का संगठित होना आवश्यक है, किन्तु श्रमिकों को राजनीतिक रूप से जागरुक करने के पूर्व सामाजिक रूप से जागरुक करना वे ज्यादा जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि जाति भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है। इससे वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो कृषि तथा अन्य क्षेत्रों में सामूहिक प्रयत्नों के विरुद्ध है। जात-पाँत के रहते हुए ग्रामीण विकास समाजवादी सिद्धांतों के विरुद्ध रहेगा।

अंबेडकर ने भारत की आर्थिक समस्याओं एवं व्यवस्थाओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया। उनकी विश्लेषण पद्धति तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक थी। हाँ, एक बात अवश्य है कि उनके सामाजिक विश्लेषण में वस्तुपरकता तो है, किन्तु पूर्वाग्रह के साथ है; शायद इसकी वजह यह रही है कि प्राय: वे उन्हीं समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किए जिससे दलित वर्ग के शोषण का संबंध है और वे इतिहास के उन पक्षों की उपेक्षा कर बैठे जो भारतीय मानस के मूलभूत चिरन्तन सिद्धांतों का आभास दिलाते। फलत: उनके विचार अत्यंत उपयोगी होते हुए भी एकांगी लगते हैं। अंबेडकर का यह मानना कि वर्ण व्यवस्था मात्र शोषण का परिणाम थी तर्क संगत प्रतीत नहीं होती है। मनु ने जो व्याख्या दी वह पूर्व से चली आ रही रीतियों का संकलन ही है। मनु की कुछ परंपरागत मान्यताएं निश्चय ही तिरस्कार के योग्य हैं किन्तु मनु की ऐतिहासिकता को पूर्णत: अस्वीकार करना युक्ति संगत नहीं होगा। क्योंकि इस विचार से इंकार नहीं किया जा सकता कि मनु महान विदव्ान थे और उन्होंने तदयुगीन सर्वमान्य सिद्धांतों का निरूपण किया। अत: अतीत को नकाराना इतिहास की अवहेलना होगी।

उनके अनुसार संसदीय प्रजातंत्र वैयक्तिक स्वतंत्रता को तो महत्व देता है किन्तु समानता की उपेक्षा करता है। अत: समाजवाद के साथ वैयक्तिक स्वतंत्रता की प्राप्ति का सबसे अच्छा तरीका संसदीय प्रजातंत्र को बनाये रखते हुए राज्य समाजवाद को संविधान के कानून में सम्मिलित करना है। उनका मानना था कि यदि लोकतंत्र लोगों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में मौलिक परिवर्तन लाता है और यदि लोग इन परिवर्तनों को बिना खून खराबे के स्वीकार करते हैं तो वह सही अर्थ में लोकतंत्र है।

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