राष्ट्रवाद का उदय (Rise of Nationalism) for Arunachal Pradesh PSC Part 4 for Arunachal Pradesh PSC

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यातायात तथा संचार के साधनों का विकास

अंग्रेजों ने यातायात तथा संचार के साधनों का विकास अपनी सुविधा के लिए किया, किन्तु इससे राष्ट्रीयता की भावना को भी प्रोत्साहन मिला। 1860 ई. के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में तेजी से सड़क, रेल, डाकतार आदि का विकास किया, जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ़ और स्थायी किया जा सके तथा भारत का कच्चा माल आसानी से बंदरगाह तक पहुँचाया जा सके। यातायात तथा संचार के साधनों का विकसित होने से देश के दूर-दूर भागों में बसे भारतीय एक दूसरे के निकट आ गए। नेतागण आसानी से देश के विभिन्न भागों में भ्रमण करने लगे। इससे देश में राष्ट्रीयता की भावना तेजी से बढ़ने लगी। राष्ट्रवादी लेखक गुरुमुख निहाल सिंह के शब्दों में ”आवागमन के साधनों ने विशाल देश को एक कड़ी में जोड़ दिया तथा भौगोलिक एकता को वास्तविकता में बदल दिया।”

मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका

ब्रिटिश शासनकाल में मध्यम-वर्गीय बुद्धि-जीवियों के एक वर्ग का विकास हुआ। इस वर्ग ने अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त की, जिससे इन्हें अच्छी नौकरी के साथ-साथ समाज में सम्मान मिलने लगा। वास्तव में यह नवीन मध्यम वर्ग एक संगठित अखिल भारतीय वर्ग था, जिसकी पृष्ठभूमि तो अलग-अलग थी किन्तु जिसका ज्ञान, विचार तथा मूल्यों की आधारभूमि समान थी। मध्यम वर्ग भारतीय समाज का एक छोटा सा अंग था। इनमें उद्देश्य की एकता तथा आशा की भावना थी। इसी वर्ग ने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया।

प्राचीन इतिहास का पुनरावलोकन

19वीं सदी के आरंभ में प्राचीन इतिहास का ज्ञान बहुत कम था। केवल मध्यकालीन तथा 18वीं सदी के इतिहास का कुछ ज्ञान था। पश्चिमी इतिहासकारों ने अतीत के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के लिए विश्व के अन्य देशों की प्राचीन सभ्यताओं का पता लगाया।

मिश्र की चित्रात्मक तथा सुमेरिया और बेबीलोनिया की कीलाकार लिपियों को इसी समय पढ़ा गया। प्राचीन खरोष्ठी तथा गुप्त लिपि को भी पढ़ा गया और प्राचीन भारतीय सभ्यताओं का पता लगा। उनकी उपलब्धियों तथा महानता के ज्ञान से भारतीय नेताओं को गौरवान्वित होने का अवसर मिला। भारतीय गौरव के विकास से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों और ईसाई मिशनरियों के आलोचानात्मक प्रचार का प्रतिकार हो सकता।

साहित्य का विकास

19वीं सदी में क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का विकास हुआ, उस साहित्य में सामाजिक सुधार तथा राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति होती थी। बांग्ला, हिन्दी तथा मराठी साहित्य में भारतीय होने पर गर्व, भारत माता के प्रति भक्ति एवं बलिदान की भावना का वर्णन होता था। बांग्ला साहित्य में बंगाल के प्रति भक्ति अथवा बांग्ला भाषी क्षेत्र को एक माता के समान मानना, क्षेत्रीयता को प्रोत्साहन अवश्य देता था। लेकिन यह क्षेत्रीयता राष्ट्रीयता विरोधी नहीं थी। मराठी साहित्य में शिवाजी का गुणगान तथा उनके मुगलों के विरुद्ध संघर्ष का वर्णन विदेशी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष को प्रोत्साहन देने के लिए किया गया। इसी प्रकार हिन्दी साहित्य में प्राचीन संस्कृत साहित्य की महानता, वेदों में वर्णित उपलब्धियों की व्याख्या स्वाभाविक रूप से भारतीय देशप्रेम और गौरव को बढ़ाने में सहायक हुई। इन क्षेत्रीय साहित्यों में भावनात्मक आधार पर जागरण पैदा करने का प्रयत्न किया गया। यह भावनात्मक एकता तथा जागरण राष्ट्रीयता को प्रोत्साहन देने वाली बनी।

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