महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-23: Important Political Philosophies for Arunachal Pradesh PSCfor Arunachal Pradesh PSC

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नवमार्क्सवाद

नवमार्क्सवाद मार्क्सवादी दर्शन का एक नवीन रूप है जो मुख्यत: बीसवीं शताब्दी में विकसित हुआ है। यह विचारधारा पारंपरिक मार्क्सवाद के ’वर्ग-संघर्ष’ और ’क्रांति’ के सिद्धांतों को प्रासंगिक नहीं मानती तथा बदली हुई परिस्थितियों में मनुष्य के जीवन पर पूंजीवाद के प्रभावों का सूक्ष्म विश्लेषण करती है। इस विचारधारा के समर्थकों में प्रमुख हैं- एंटोनियो ग्राम्शी, लुई आल्थूजर, एरिक फ्रॉम, हर्बर्ट मारक्यूज, जुर्गेन, हैबरमास, जॉर्ज ल्यूकाच, थियोडोर एडोर्नो, मैस हार्खाइमर और जीन पॉल सार्त्र।

ग्राम्शी और लुई आल्थूजर ने अपना विश्लेषण इस बिन्दु पर केन्द्रित किया कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने स्थायित्व को कैसे बनाए रखती है। ग्राम्शी ने ’वर्चस्व’ की संकल्पना प्रस्तुत की जिसमें उसने बताया कि पूंजीवादी वर्ग अपना ’वर्चस्व’ दो संस्थाओं-नागरिक समाज तथा राज्य के माध्यम से बनाए रखता है। नागरिक समाज के अंतर्गत वे सभी संस्थाएँ शामिल हैं जो समाज की विचारधारा निर्मित करती हैं, जैसे शिक्षा संस्थाएँ, धार्मिक संस्थाएँ तथा परिवार आदि। ये सभी संस्थाएँ व्यक्ति को वहीं मूल्य सिखाती हैं जो व्यवस्था के पक्ष में होते हैं, न कि विरोध में इसका परिणाम यह होता है कि सभी व्यक्ति आदतन पूंजीवादी मानसिकता से सोचने लगते हैं जबकि उनके जीवन की स्थितियाँ इसके विपरीत होती हैं। जब नागरिक समाज की संस्थाएँ यह कार्य सफलतापूर्वक नहीं कर पाता तो राज्य अपनी दमनात्मक शक्ति का प्रयोग करता है और किसी भी विद्रोह अथवा क्रांति को बर्बरतापूर्वक कुचल देता है।

एरिक फ्रॉम, हर्बर्ट मारक्यूज,, हैबरमास तथा सार्त्र ने पूंजीवादी समाज के अंतर्गत मनुष्य की सृजनात्मकता और उस पर विद्यमान खतरों का विश्लेषण किया। एरिक फ्रॉम ने बताया कि पूंजीवादी प्रणाली से संबंद्ध व्यक्ति सृजनात्मक, कार्य नहीं कर पाते, इसलिए उनमें अलगाव और अकेलापन पैदा होता है। इससे मुक्ति का उपाय यही है कि व्यक्ति अपने उत्पादक कार्यो से भिन्न कुछ ऐसे कार्य करे जिसमें उसकी रचनात्मकता और सहज भावनाएँ व्यक्त होती हों।

मार्क्यूज ने समकालीन पूंजीवाद दव्ारा उत्पन्न किये गये ’उपभोक्तावाद’ का विस्तृत विवेचन किया है। अपनी पुस्तक ’एकआयामी मनुष्य’ में उसने कहा कि वतर्ममान श्रमिकों का संकट न तो कम वेतन है और न ही काम की अमानवीय दशांंएँ। कल्याणकारी लोकतंत्र और श्रमिक आंदोलनों के कारण मजदूरों की आय तथा कार्य-स्थितियाँ प्राय: बेहतर हुई हैं। इन बेहतर स्थितियों की उपयोगिता यह होनी चाहिये थी कि कामगार अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रयाेेग करते किन्तु उत्तर-औद्योगिक पूंजीवाद ने इलैक्ट्रॉनिक (विद्युतीय) मीडिया (संचार माध्यम) का प्रयोग करते हुए व्यक्ति की उपभोग करने की इच्छाओं को असीमित रूप से बढ़ा दिया है। इच्छाओं का यह विस्फोट इतना तीव्र और भयानक हैं कि व्यक्ति अपनी परिभाषा अपने उपभोग-स्तर से ही करने लगा है। वह निरंतर नई-नई भौतिक इच्छाओं का दास बनता है और यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। विडंबना तो यह है कि न केवल वह अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता खो चुका है बल्कि उसे यह समझ भी नहीं है कि उसकी रचनात्मकता खो गई है।

इस प्रकार, नवमार्क्सवादी विचारकों ने आज के मनुष्य और उसकी रचनात्मकता तथा अलगाव जैसे संकटों को समकालीन पूंजीवाद के परिदृश्य में विश्लेषित किया है। इस विश्लेषण की उपयोगिता यह है कि इसने अमेरिकी और यूरोपीय नागरिकों के सामने उत्पन्न हो रहे मनोवैज्ञानिक संकटों के समाधान का वैज्ञानिक नज़रिया प्रस्तुत किया है। इन विचारों की सीमा यह है कि ये एशियाई और अफ्रीकी देशों की मूल समस्याओं से नहीं जुड़ पाते क्योंकि इन देशों में गरीबी और शोषण इतना अधिक है कि मानव की रचनात्मक स्वतंत्रता का विचार अभी अर्थपूर्ण प्रतीत नहीं होता है।