महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-26: Important Political Philosophies for Arunachal Pradesh PSCfor Arunachal Pradesh PSC

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भारत में नक्सलवाद और माओवाद

वर्तमान भारत में नक्सलवाद और माओवाद एक बड़ी चुनोती के रूप में विद्यमान है। इस विचारधारा का मूल संबध मार्क्स के वर्ग संघर्ष तथा हिंसक क्रांति के सिद्धांतों से है। आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से इन समस्याओं का समाधान करना भारतीय राज्य के लिए अब आवश्यक होता जा रहा है। नीचे संक्षेप में इन विचारधाराओं का परिचय दिया जा रहा है।

नक्सलवाद

स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में नक्सलवादी विचारधारा और आंदोलन का विषेष महत्व है। नक्सलवाद शब्द नक्सलबाड़ी नामक गांव के नाम से विकसित हुआ है जो पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में स्थित है। 1967 ई. की एक घटना से नक्सलवाद का औपचारिक आंरभ माना जाता है, हालांकि इसका इतिहास 1946 से 1951 तक चले तेलांगना आंदोलन से गहरे तौर पर जुड़ा है जहाँं स्वतंत्र भारत में पहली भारत हिंसक क्रांति की विचारधारा के साथ कुछ आदीवासी किसानों दव्ारा भूमिपतियों से अपने दव्ारा जोती जाने वाली जमीन के अधिकार हासिल करने की कोशिश की गयी थी।

1964 में जब संयुक्त कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (दल) ऑफ (का) इंडिया (भारत) (यूनाइटेड (एकजुट) सी. पी. आई.) से अलग होकर मौर्सवादी कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (समूह) ने राज्य का पूर्ण विरोध करने के स्थान पर चुनाव प्रणाली में भाग लेने का फैसला किया तो चारू मजूमदार, कानू सान्याल आदि क्रांतिकारियों ने इसे अवसरवाद कहकर खारिज कर दिया। 1967 के चुनावों में मार्क्सवादी कम्यूनिष्ट पार्टी की जाति हुई। तभी, 1967 में नक्सलबाड़ी नामक गांव में एक किसान की जमीन के मुद्दे को लेकर जमीदार और किसान नेताओं में झड़प हुई जिसमें एक पुलिस इंस्पेक्टर की मृत्यु हो गई। इस घटना ने सथाल जनजाति के बहुत सारे भूमिहीन कृषकों को प्रेरित किया कि वे अपने भूमि अधिकारों के लिए सीधे सीधे हिंसक संघर्ष में शामिल हो गए। यहीं से नक्सल आंदोलन की शुरुआत हुई और लगभग 72 दिनों तक यह आंदोलन चलता रहा। उस समय मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में संयुक्त मोर्चा की सरकार ने पश्चिम बंगाल में शासन करना आरंभ कर दिया था और उसी ने इस आंदोलन को कुचला। इस आंदोलन को कुचलने के लिए केन्द्र सरकार का भी पश्चिम बंगाल सरकार पर अत्यधिक दबाव था।

चारू मजूमदार तथा कानू सान्याल जैसे क्रांतिकारियो ने 1669 में अपने नये दल कम्युनिस्ट (साम्यवादी) पार्टी (दल) ऑफ (का) इंडिया (भारत) (मार्क्सवादी लेनिनवादी) का गठन किया। तब से आज तक नक्सलवादी आंदोलन का मूल संबंध इसी दल से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा, कुछ और दल जो नक्सल आंदोलन से जुड़े हैं, उनमें माओवादी कम्युनिस्ट (साम्यवादी) सेंटर (केन्द्र) तथा पीपल्स (लोग) वार (युद्ध) ग्रुप (समूह) प्रमुख हैं। इस आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से हुई थी, किन्तु वर्तमान में यह दस राज्यों के लगभग 180 जिलों तक फैल चुका है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, झारखंड तथा पश्चिम बंगाल इससे काफी ज्यादा प्रभावित हैं जबकि महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा कर्नाटक पर इसका थोड़ा बहुत असर है। पिछले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा तथा नारायणपुर क्षेत्रों में नक्सलवादियों दव्ारा केन्द्रीय रिजर्व (आरक्षित करना) पुलिस बल के बहुत से कर्मचारियों की हत्या तथा 2013 में बस्तर इलाके में बहुत से राजनेताओं की हत्या ने सिद्ध कर दिया है कि नक्सलवादी आंदोलन को हल्के में लेना आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ी भूल होगी।

नक्सलवादी विचारधारा मूलत: माओ त्से तुंग के विचारों से प्रभावित है। 1949 में ’माओ’ ने चीन में जिस तरह हिंसक क्रांति की थी, वैसी ही क्रांति करने का सपना नक्सलवादियों का था। ये राज्य को उच्च वर्ग के हाथों की कठपुतली मानते थे और इनका दावा था कि भूमिपतियों और सामंतों की आर्थिक ताकत के सहारे से बनी सरकार से यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह भूमिहीन किसानों को उनके भूमि संबंधी अधिकार दिलायेगी। इसलिये चारू मजूमदार तथा उनके सहयोगियों ने गरीब किसानों और आदिवासियों को प्रेरित किया कि यदि वे शोषण और दमन से मुक्ति चाहते हैं तो राज्य तथा शोषक वर्ग के खिलाफ हिंसक संघर्ष का रास्ता चुने।