जारवा जनजाति जल्लीकट्‌टू (Jarawa Tribe Jallikattu – Culture)

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• अंडमान दव्ीप समूह की जनजातियों- जारवा, ग्रेट (महान) अंडमानी, ओन्गे और सेंटीनली का निवास अंडमार निकोबार दव्ीप समूह में पिछले 55000 वर्षों से माना जाता है।

• धरती पर सबसे एकाकी मानी जाने वाली जारवा जनजाति मुख्यत: शिकार पर निर्भर रहती है। यह जनजाति अंडमान के घने जंगलों में बाहरी दुनिया से पूरी तरह से विलगित रहती है।

• हालाकि, बाहरी लोगों की बढ़ते अंतर्प्रवाह के कारण जारवा विलुप्ति के खतरे का सामना कर रहे हैं। वर्तमान में, जनजाति के लगभग 400 सदस्य 40-50 के समूह में चाद्धा, जो उनका निवास स्थान को कहते हैं में रहते हैं।

• इन्हें अनुसूचित जनजाति श्रेणी में रखा गया हैं।

• जारवा दव्ारा वचाही और हाथो वृक्ष की पत्तियाँ गर्भ निरोधक के रूप में प्रयोग की जाती हैं।

• चलवासी जीवनयापन के दौरान इस जनजाति के दव्ारा श्रम-विभाजन का विशिष्ट सिद्धांत अपनाया जाता है, जहां पुरुष सदस्य शिकार को ढूँढ़ते और उसका शिकार करते हैं वहीं महिला सदस्य खाद्य और अन्य आवश्यक वस्तुओं को अपने साथ ढोने का कार्य करती हैं।

• जारवा स्त्री-पुरुष पूर्णत: नग्न रहते हैं यद्यपि उनके दव्ारा कुछ आभूषण पहने जाते है किन्तु इसका उद्देश्य अपनी नग्नता को छुपाना नही होता है।

इस जनजाति के लोगों में प्राय: विवाह किशोरावस्था में ही संपन्न हो जाता है किन्तु जारवा समुदाय के अंतर्गत विधुर या विधवा विवाह की स्वीकृति है यद्यपि जारवा जनजाति में एक पत्नीक प्रथा की परंपरा कठोरता से मान्य की गयी है, दव्तीय विवाह भी सामान्य रूप से प्रचलन में दिखायी पड़ता है।

जल्लीकट्‌टू (Jallikattu – Culture)

सुर्खिंयों में क्यों?

• हाल ही में सरकार ने जल्लीकट्‌टू पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। अब उच्चतम न्यायालय ने सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी है। जल्लीकट्‌टू एक पारंपरिक खेल है जिसमें सांडों की लड़ाई होती है, यह तमिलनाडु में सदियों से लोकप्रिय है।

जल्लीकट्‌टू क्या है?

• जल्लीकट्‌टू एक (बैलो के ऊपर से छलांग लगाना) आयोजन है जो कि तमिलनाडु में पोंगल समारोह के तहत मट्‌टू पोंगल के दिन मनाया जाता है।

• प्रतिभागी सांड को उसके कूबड़ से पकड़ते हैं और उस पर तब तक लटके रहने का प्रयत्न करते हैं जब तक कि सांड समापान रेखा पार न कर ले।

• जल्लीकट्‌टू मदुरै, तिरुचिरापल्ली, थेनी, पुदुक्कोट्टई और डिंडीगुल जिलों में लोकप्रिय है। इन क्षेत्रों को जल्लीकट्‌टू बेल्ट (पट्टा से मारना) के रूप में भी जाना जाता है।

जल्लीकट्‌टू एक प्राचीन खेल है। सिंधु घाटी सभ्यता की मोहरों में भी इसे दर्शाया गया है। इसके अलावा संगम साहित्य (ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से दूसरी शताब्दी) में भी ईरु थाजुवुथल (बैलों को गले लगाना) के कई विस्तृत उल्लेख मिलते हैं।