आचार संहिता (Code of Ethics – Part 9)

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नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि

कनाडा में, फेडरल के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कोई लिखित आचार संहिता नहीं है, परन्तु विगत कई वर्षों से, कनाडा न्यायिक परिषद दव्ारा प्रकाशित विविध कागजातों में उन नैतिक मानदंडो का वर्णन मिल जाता है, जिनकी न्यायाधीशों को इच्छा रहती है। कनाडा न्यायिक परिषद् का गठन 1971 में न्यायिक शासन के क्षेत्र में व्यापक विधायी अधिदेश के साथ किया गया था। इस परिषद का मुख्य उद्देश्य कार्यकुशलता और एकाग्रता विकसित करना और कनाडा के सभी उच्च न्यायालयों में न्यायिक सेवा की गुणवत्ता का सुधार करना है।

भारत में न्यायाधीशों के आचार संहिता: भारत के उच्चतम न्यायालय ने 7 मई, 1997 को हुई अपनी पूर्ण न्यायालय बैठक में ’न्यायिक जीवन के मूल्यों के पुनर्कथन’ नामक एक चार्टर को पारित कर दिया जिसे सामान्यत: न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता के नाम से जाना जाता है। इसमें निम्निलिखत शामिल हैं;

• केवल न्याय ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि न्याय कर दिया गया हैं। उच्चतर न्यायपालिका के सदस्यों के आचार और व्यवहार से न्यायपालिका की निष्पक्षता में लोगों का विश्वास सुदृढ़ होना चाहिए। तदनुसार, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश का ऐसा कोई कृत्य चाहे वह कार्यालय में हो या व्यक्तिगत रूप से हो, जिससे इस पेशे की विश्वसनीयता को ठेस पहुंचे तो उससे बचना होगा।

• किसी भी न्यायाधीशों को क्लब (मंडली), सोसायटी (समाज) या अन्य किसी संघ के किसी पद चुनाव नहीं लड़ना चाहिए इसके अलावा, उसे कोई निर्वाचन पद को धारण नहीं करना चाहिए, सिवाय उस सोसायटी या संघ के जिसका संबंध कानून से हो।

• विधिज्ञ संघ के व्यक्तिगत सदस्यों के साथ नजदीकी संबंध, विशेष रूप से, जो उसी न्यायालय में अपना काम कर रहे हों, से दूर रहना चाहिए।

• न्यायाधीश अपने नजदीकी परिवार के किसी भी सदस्य को, जैसे कि पति/पत्नी, पुत्र/पुत्री, दामाद या बहू या अन्य कोई नजदीकी रिश्तेदार, जो विधिज्ञ संघ का एक सदस्य हो, अपने न्यायालय में उपस्थित होने देने और उस न्यायाधीश दव्ारा किए जाने वाले किसी काम के साथ किसी प्रकार से भी संबंधित होने की आज्ञा नहीं देगा।

• उसके परिवार के किसी भी सदस्य को, जो विधिज्ञ संघ का सदस्य हो, न्यायाधीश के वास्तविक आवास में रहने देने या उसके व्यावसायिक काम के लिए अन्य सुविधाएं दिए जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

• न्यायाधीश को अपनी मर्यादा के अनुरूप अपनी पद्धति में अंतर का दर्जा रखना होगा।

• न्यायाधीश ऐसे किसी मामले को नहीं सुनेगा और न ही अपना निर्णय देगा जिसमें उसके परिवार का कोई सदस्य, नजदीकी संबंधी या मित्र उस मामलें से संबंधित हो।

• न्यायाधीश किसी सार्वजनिक वाद-विवाद बहस में भाग नहीं लेगा या राजनीतिक मामलों अथवा उन मामलों में जो निलंबित हो और जिनका न्यायिक निर्णय आने की संभावना हो पर जनता के समक्ष अपने विचार व्यक्त नहीं करेगा।

• एक न्यायाधीश से यह अपेक्षित है कि उसका निर्णय स्वयं बोलने की क्षमता रखता हो। वह मीडिया (संचार माध्यम) के समक्ष कोई साक्षात्कार नहीं देगा।

• न्यायाधीश अपने परिवार, नजदीकी संबंधी और मित्रों को छोड़कर किसी से उपहार या आतिथ्य सत्कार को स्वीकार नहीं करेगा।

• न्यायाधीश ऐसी किसी कंपनी (संघ) से संबंधित मामले की सुनवाई नहीं करेगा और निर्णय नहीं लेगा, जिसमें उसके शेयर लगे हो जब तक कि उसने उसमें अपने हित को प्रकट न कर दिया हो और उस मामले की सुनवाई और निर्णय देने के लिए कोई आपत्तिं न ले ली हो।

• न्यायाधीश शेयरों, स्टॉको (भंडार) और ऐसी ही अन्य चीजों में सट्टा नहीं लगाएगा।

• न्यायाधीश स्वयं को या किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई व्यापार या व्यवसाय में लिप्त नहीं होगा। (किसी शौक के रूप में विधि के शोध-प्रबंध के प्रकाशन या अन्य किसी गतिविधि को व्यापार या व्यवसाय नहीं समझा जाएगा)

• न्यायाधीश किसी भी प्रयोजन के लिए किसी भी प्रकार के कोप के लिए न तो अंशदान मांगेगा, न उसे स्वीकार करेगा या अन्यथा स्वयं को सक्रिय रूप से उससे संबंधित नहीं करेगा।

• न्यायाधीश अपने कार्यालय संबद्ध किसी परिलब्धि या विशेषाधिकार के रूप में किसी वित्तीय लाभ को प्राप्त नहीं करेगा जब तक कि यह स्पष्ट रूप से उपलब्ध न हो। इस बारे में किसी भी संदेह का समाधान करवा कर मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए।

• प्रत्येक न्यायाधीश को इस बात से सर्वदा सावधान रहना चाहिए कि जनता उस पर टकटकी बांधे देख रही है और उसके दव्ारा ऐसा कोई कृताकृत नहीं होना चाहिए जिससे उसके दव्ारा धारित उच्च पद तथा लोक प्रतिष्ठा जिसमें वह पद धारित किया हुआ है-दोनों अशोभनीय बनें।

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