इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 3for Maharashtra PSC Exam

Glide to success with Doorsteptutor material for CTET-Hindi/Paper-1 : get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-1.

सैमुअल अलेक्जैडर: ये भी विकासवाद का मूल सिद्धांत लेकर चले है और स्पेंशर के मूल विचारों से सहमत है-

इनके अनुसार आदर्श अवस्था वह है जिसमें समाज के विभिन्न व्यक्ति अपनी विरोधी प्रवृत्ति को संतुलित करके जीवन को सामंज्यपूर्ण बना लेते हैं।

इन्होंने नैतिक आदर्शों के रिवाज की प्रकिया की व्याख्या नये तरीके से की है, इनका दावा है कि जिस प्रकार प्राकृतिक जगत में सर्वोत्तम की उत्तर जीविता तथा प्राकृतिक चयन के नियम लागू होते हैं वैसे ही नीति मीमांसा में भी, विभिन्न नैतिक आदर्शों में संघर्ष होता रहता है और अंतत: वही सिद्धांत सुरक्षित रहता है जो सामाजिक कल्याण में सर्वाधिक सहायक हो।

अंतर यह है कि प्राणियों के संघर्ष में शारीरिक बल की केन्द्रीय भूमिका होती है जबकि नैतिक आदर्शो में संघर्ष में तर्को तथा दूसरो को अपनी बातों से सहमत करने का महत्व होता है, हर नैतिक आदर्श का समर्थन कुछ ऐसे व्यक्ति जरूर करते हैं जिनके पास उच्च तर्क क्षमता तथा प्रभावी अभिव्यक्ति क्षमता होती हैं, इनमें संघर्ष में समूचित नैतिक सिद्धांत विजय होते हैं।

नये नैतिक आदर्शो का प्रतिपालन करने वाले को प्राय: रूढ़ीवादी सदस्यों का विरोध झेलना पड़ता है यहां तक उनकी हत्या भी हो सकती है। उदाहरण- लिनेन गांधी, मार्टिन लूथर किंग।

किन्तु विचार नही मरते और धीरे-धीरे समाज के अधिकांश लोग उन विचारों का महत्व समझने लगते है।

मूल्यांकन-

  • जैविक जगत के नियमों को नैतिक जगत पूरी तरह लागू करना उचित नहीं है।
  • अलेक्जेंडर मानकर चल रहे है कि बाद में विकसित होने वाले मूल्य हमेशा पूर्ववर्ती मूल्यों से बेहतर होते है जबकि वास्तविकता में ऐसा होना आवश्यक नहीं हैं।

लेस्ली स्टीफन:- समाज को महत्व, व्यक्ति वो नही निरपेक्ष नैतिकता की स्थिति न आयी है न आयेगी।

स्टीफन भी स्पेंशर की तरह कई बातों को मानते है जैसे - सुख ही जीवन का मूल उद्देश्य हैं, नीति मीमांसा की व्याख्या विकासवाद के आधार पर ही की जा सकती है।

निम्न pointe (बिन्दु) में स्पेंशर से अलग उन्होंने व्यक्ति की तुलना में समाज को अत्यधिक महत्व दिया जबकि स्पेंशर ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पुरजोर समर्थन किया था स्टीफन ने समाज को शरीर ओर व्यक्ति को ओर के रूप में परिभाषित करते हुए सिद्ध करने का प्रयास किया है जैसे अंग शरीर के अभाव में अस्तित्व हीन हो जाता है वैसे ही व्यक्ति समाज से पृथक होकर नहीं जी सकता।

नैतिकता का एकमात्र मानदंड सामाजिक कल्याण है व्यक्ति को चाहिए की वह अपने हित को भूलकर केवल सामाजिक हित को साधने का प्रयास करे।

समाज के विकास की कोई अंतिम स्थिति नहीं होती। विकास एक निरन्तर प्रक्रिया है। निरपेक्ष नैतिकता एक कल्पना है हमें सिर्फ सापेक्ष नैतिकता अर्थात वर्तमान स्थिति को ही सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।

मूल्यांकन- व्यक्ति को महत्व नही दिया।

सामाजिक कल्याण को इस तरह प्रस्तुत किया है कि जैसे वह व्यक्तिगत कल्याण के विरुद्ध है, सच यह है कि सभी व्यक्तियों का कल्याण ही सामाजिक कल्याण होता है। इसमें कोई विरोध नहीं हैं।

जो व्यक्ति नैतिकता और न्याय के इन मूल नियमों का पालन नही करते है उन्हें दंड दिया जाना नैतिक है, समाज के अस्तित्व का लाभ अगर उन्हें मिलता है तो उनकी यह भी जिम्मेदारी है कि उसके अनुरूप नियमों का पालन करे।

Developed by: