जीवाईपीएस गिद्ध पुन परिचय कार्यक्रम (GVAPS Vulture Recognition Program – Environment)

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सुर्ख़ियों में क्यों?

• इसे हरियाणा सरकार दव्ारा पिछले वर्ष प्रारंभ किया गया। इसके अंतर्गत हरियाणा के पिंजौर स्थित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र के नजदीक दस कैप्टिव (क़ैदी) ब्रेड (रोटी/डबलरोटी) गिद्धो को छोड़ने से पहले पक्षीशाला में रखा जाता है।

• यह एशिया का पहला जीवाईपीएस गिद्ध पुन: परिचय कार्यक्रम हैं।

• हाल ही में, इस कार्यक्रम के हिस्से के रूप में दो हिमालयन ग्रिफ्रिन जंगल में छोड़े गए।

• यह कार्यक्रम सरंक्षण का एक बाह्य-स्थान साधन है, जिसके तहत कुछ गिद्धों को कुछ समय के लिए प्रजनन केंद्र में रखा जाता है और फिर जंगल में छोड़ दिया जाता है।

• गिद्ध पर्यावरण को स्वच्छ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है, इसलिए उनके नस्लों की वृद्धि की जानी चाहिए और सरकार को लगातार उसकी संख्या बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए।

भारत में गिद्ध प्रजाति की स्थिति

मुख्य रूप चार प्रकार के गिद्ध भारत में पाए जाते हैं-

• जीवाईपीएस स्पेसिस-इसे भारतीय गिद्ध भी कहा जाता है, लॉन्स, बिल्लड व स्लेंडर बिल्लड गिद्ध इसमें प्रमुख हैं- गंभीर संकटापन्न (क्रिटिकली इंडेंजर्ड)

• हिमालय ग्रिफिन -भारतीय जीवाईपीएस से करीबी संबंध-संकटापन्न नहीं; केवल खतरे के निकट (नियर थ्रिटेंड)

• रेड-हेडड गिद्ध-गंभीर संकटान्न (क्रिटिकली इंडेंजर्ड)

एजिप्टीयन गिद्ध-आईयूपीसीएस के अनुसार इंडेंजर्ड

गिद्धों की आबादी क्यों बढ़ रही हैं?

• मुख्य रूप से डाईक्लोफेनाक के उपयोग की वजह से इनकी आबादी में कमी देखी गयी है। यह एक दवा है जो कि सूजन और दर्द के लिए मवेशियों को दी जाती है। जब यह यह मृत पशुओं के अवशेषों के माध्यम से गिद्धों के शरीर में प्रवेश करती है तो इसके परिणामस्वरूप गिद्धों के गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं।

• सरकार ने 2006 में डाईक्लोफेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन इसका अवैध उपयोग बहुतायत में होता है। लोगों को इसकी वैकल्पिक दवा मोलोक्सीयम के उपयोग के लिए और अधिक जागरूक किए जाने की जरूरत है।

जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र

• यह चंडीगढ़ के निकट, हरियाणा के पिंजौर शहर में भारतीय गिद्धों के प्रजनन और संरक्षण के लिए बीर शिकरगढ़ वन्यजीवन अभयारण्य के भीतर एक सुविधा केंद्र है।

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