Science and Technology: Blue Tooth Technology and Cellular Telephony

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ब्लूटूथ प्रौद्योगिकी (Blue Tooth Technology)

  • सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ब्लूटूथ प्रौद्योगिकी को एक क्रांतिकारी परिवर्तन कहा जा सकता है। सामान्य भाषा में एक ब्लूटूथ उपकरण में एक बेस बैंड प्रोसेसर एक रेडियो तथा एक एन्टिना कार्य करते है।
  • बेस बैंड प्रोससर सूचनाओं को संकेतों में बदल देता है जिन्हें रेडियो दव्ारा अभिव्यक्त किया जाता है। इन संकेतों की आवृत्ति 2.4 गीगा हर्ट्‌ज होती है जो एन्टिना की सहायता से रेडियो दव्ारा संप्रेषित किये जाते हैं। लगभग 30 फीट की दूरी पर स्थित किसी अन्य ब्लूटूथ उपकरण के एन्टिना दव्ारा इन संकेतों को ग्रहण किया जाता है तथा उन्हें विपरीत दिशा में प्रसंस्कृत किया जाता है।

इस तकनीक के माध्यम से दो समान तकनीक का प्रयोग करने वाले उपकरणों से बेतार प्रौद्योगिकी के जरिए, संचार संपर्क स्थापित किये जा सकते हैं।

  • प्रौद्योगिकी में दो भाग होते हैं: पहलें का वॉल्यूम 1-कोर (Volume I-Core) तथा दूसरे को वॉल्यूम 2 -प्रोफाइल (Volume II-Profile) कहा जाता है। कोर के अवयवों में रेडियो, बेस बैंड, लिंक मैनेजर तथा सर्विस डिस्कवरी प्रोटोकॉल जबकि प्रोफाइल में विभिन्न प्रकार के कार्यो के लिए प्रक्रियाओं तथा प्रोटोकॉल को शामिल किया जाता है।
  • यह प्रौद्योगिकी वस्तुत: तीव्र लेकिन कम-ऊर्जा खपत वाली माइक्रोवेव बेतार प्रौद्योगिकी है जिसमें टेलीफोन, लैपटॉप, पर्सनल डिजिटल असिस्टेन्ट तथा अन्य उपकरणों को सरलतापूर्वक संबंद्ध किया जा सकता है। वर्तमान में हांलाकि सूचनाएं 1 - 2 मेगाबाइट प्रति सेकेंड (Megabyte per Second, Mbps) की दर से संप्रेषित की जा रही हैं लेकिन भविष्य में इस गति में वृद्धि की पूरी संभावना है, जिसके लिए प्रयास किये जा रहे हैं।

इस प्रौद्योगिकी में कम खर्च तथा छोटे आकार वाले लोकल एरिया नेटवर्क तकनीक का उपयोग किया जाता है। ब्लूटूथ प्रौद्योगिकी में उपकरणों को बिन्दु से बिन्दु अथवा कई बिन्दुओं पर जोड़ा जा सकता है तथा इनके बीच की दूरी 10 मीटर से बढ़ाकर 100 मीटर तक की जा सकती है लेकिन इसके लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता है।

  • ब्लूटूथ प्रौद्योगिकी में अदृश्य रेडियो तरंगों (2.4 गीगा हर्ट्‌ज बैंड) का प्रयोग होता है जो तत्काल स्वचालित रेडियो संपर्क का निर्माण करते हैं। इससे तंतुओं के असुविधाजनक नेटवर्किंग से बचा जा सकता है। साथ ही एक ब्लुटूथ उपकरण दव्ारा होल्ड मोड में केवल 30 माइक्रो एम्पीयर तथा कार्य करने के दौरान 8 - 30 मिली एम्पीयर ऊर्जा का उपभोग किया जाता है। इसमें प्रयुक्त रेडियो चिप को सामान्य मोबाइल फोन से ऊर्जा की लगभग 3 प्रतिशत कम मात्रा की आवश्यकता होती है। सूचनाओं की संख्या के आधार पर रेडियो चिप स्वत: होल्ड मोड में कार्य कर ऊर्जा की बचत कर सकता है। अपनी तीव्र आवृत्ति एवं क्षमता के कारण ब्लूटूथ रेडियों शोर से भरे रेडियों आवृत्ति में भी कार्य करने में सक्षम हैंं। इसके अलावा यह विद्यमान सूचना नेटवर्क को जोड़ने, एक अन्त: फलक के रूप में कार्य करने तथा स्थित अवसंरचनाओं से अलग हटकर कार्य करने मेें भी सक्षम है।
  • जहांँ तक सुरक्षा का प्रश्न है, यह तकनीक मानव शरीर अथवा सूचना नेटवर्कों के लिए पूर्णत: सुरक्षित है। उल्लेखनीय है कि इसकी सुरक्षा से संबंधित सभी प्रतिमानों का विकास कर लिया गया है।

वी सैट (Very Small Aperture Terminals, VSAT)

वी सैट पूरी तरह से निजी स्वामित्व वाला उपग्रह आधारित संचार तंत्र है। वास्तव में यह ऐसा पृथ्वी केन्द्र है जिसमें 2 मी. से भी छोटे व्यास का एक एंटीना लगाना पड़ता है, जो टर्मिनलों को बड़े नेटवर्क से बहुत आसानी से जोड़ देता है। इसमें पृथ्वी केन्द्र भारत में नई दिल्ली स्थिति ‘मास्टर अर्थ स्टेशन’ (मुख्य पृथ्वी केन्द्र) से जुड़ा होता है, जिससे उसे किसी आम नेटवर्क प्रणाली के अनुरूप श्रृंखलाबद्ध नहीं होना पड़ता। इसे व्यावसायिक फर्मे दूरसंचार विभाग के स्थान पर पूर्ण विश्वस्त आंकड़ा प्राप्त करने के लिए स्वीकार कर रही हैं। निकनेट की स्थापना के बाद 1988 में वी सैट प्रणाली को इससे जोड़कर पहली सूचना सेवा शुरू हुई। इसके अंतर्गत 650 से भी अधिक वी सैट का प्रयोग करके भारत के प्रत्येक जिला मुख्यालय को इस प्रणाली से जोड़ दिया गया है। वी-सैट की दूसरी सार्वजनिक सेवा 1991 में आर. ए. बी. एम. एन. (Remote Area Business Message Network) के रूप में शुरू की गई है जिसकी संपूर्ण क्षमता 1000 वी-सैट के संचालन की है। इसके अतिरिक्त वी-सैट प्रणाली का प्रयोग इलेक्ट्रॉनिक -मेल, वॉयस मेल, इलेक्ट्रानिक मुद्रा देश, अंतरराष्ट्रीय आंकड़ा नेटवर्क, फैक्स, दूरस्थ टेलेक्स, हाइब्रिड मेल सर्विस आदि में लाभकारी सिद्ध हो रहा है। वी-सैट प्रणाली का प्रत्येक उपभोक्ता को ‘सिम कार्ड’ दिया जाता है, जिसमें एक कम्प्यूटर चिप होती है। इस कम्प्यूट चिप में उपभोक्ता की व्यक्तिगत पहचान संख्या और उसके दव्ारा मूल्य संबंर्धित सेवाओं का उल्लेख होता है। उपभोक्ता इस ‘सिम कार्ड’ को किसी भी सेल्यूलर फोन में लगाकर बातचीत कर सकता है। भारत में इंटरनेट सर्फिंग की सुविधा सेल्यूलर फोन की स्क्रीन पर उपलब्ध है। इसे संभव बनाने वाली प्रौद्योगिकी ‘वायरलेस एक्सेस प्रोटोकॉल’ है। इंटरनेट की गति को भी तीव्र करने की तकनीक पर भी तेजी से कार्य हो रही है। निजी क्षेत्र की कंपनी एस्सार इस सुविधा को भारत में उपलब्ध करा रही है। इस सुविधा के उपलब्ध होने तथा देश में साइबर कानून बनने के बाद मोबाइल पर व्यापार सुविधा उपलब्ध होगी, जिसे एम-कॉमर्स नाम दिया गया है। एम कॉमर्स की सुविधा मिलते ही इसके तीव्रता से लोकप्रिय होने की आशा है क्योंकि यह सेल्यूलर फोन को उपभोक्ता का कारोबारी मित्र बना देगा।

सेल्यूलर फोन प्रणालियाँ (Cellular Telephony)

फ्रिंक्वेंसी डिवीजन मल्टीपल एक्सेस (Frequency Division Multiple Access (FDMA) )

इसका उपयोग एनालॉग सेल्यूलर सिस्टम में किया जाता है। सामान्यत: एफडीएमए लोकेटेड स्पैक्ट्रम को कई चैनलों में विभाजित कर देता है। वर्तमान में एनालॉग सिस्ट में प्रत्येक चैनल 30 किलोहर्टज का होता है। जब एफडीएमए सेलफोन से कोई कॉल की जाती है, तो उस पूरी कॉल के दौरान यह फ्रीक्वेंसी को रिजर्व कर लेता है। वॉयस डाटा इस चैनल को फ्रीक्वेंसी बैंड पर मॉडुलेट करता है और एयरवेव के माध्यम से भेज देता है। रिसीवर इस इन्फॉरमेशन को बैंड पास फिल्टर दव्ारा ले लेता है। एनालॉग सिग्नल वॉयस क्वालिटी के दृष्टिकोण से विशेष संवेदनशील होते हैं। इनमें किसी प्रकार के शोर को फिल्टर नहीं किया जा सकता। एफडीएमए सिस्टम वर्तमान में प्रयोग हो रहे सेल्यूलर सिस्टम के दृष्टिकोण से कम उपयोगी है।

टाइम डिवीजन मल्टीपल एक्सेस (Time Division Multiple Access (TDMA) )

एफडीएमए के आधार पर ही निर्मित टीडीएम में आवृत्ति स्पैक्ट्रम के साथ समय को भी विभिन्न चैनलों में विभाजित कर दिया जाता है। इससे लाभ यह होता है कि डिजिटल कंप्रेशन के दव्ारा वॉयस 10 किलोबाइट प्रति (10 किलो हर्ट्‌ज) सेकंड में पहुँच जाती है। इससे सेल्यूलर सिस्टम की क्षमता बढ़ जाती है। टीडीएम सिस्टम का घाटा यह है कि डिजिटल डाटा रेट के अनुसार परिवर्तन नहीं करता अर्थात वॉयस क्वालिटी बेहतर हो, खराब हो या नेटवर्क पर ट्रैफिक हो फिर भी यह अपने चैनल स्लॉट को उसी दर से बांटता है।

कोड डिवीजन मल्टीपल एक्सेस (Code Division Multiple Access (CDMA) )

मूलत: आईएम-95 के रूप में प्रचलित सीडीएम एक सेल्यूलर तकनीक है। जिसका विकास एक अमेरिकी कंपनी क्वालकॉम ने किया। इस तकनीक में एक अलग किस्म के कोड का इस्तेमाल किया जाता है ताकि प्रत्येक कॉल में अंतर किया जा सके। इसमें विभिन्न सिग्नल एक ही ट्रांसमिशन चैनल से होकर गुजरते हैं, ताकि उपलब्ध बैंडविड्‌थ का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सके। यह तकनीक अल्ट्रा हाई फ्रिक्वेंसी सिस्टम (900 मेगाहर्टज से 1.9 गीगाहर्टज बैंड) में काम करती है। किसी अन्य तकनीक के मुकाबले इसमें वॉयस और डाटा की क्वालिटी बेहतर होती है। साथ ही इस तकनीक में विभिन्न यूजर एक ही समय पर जुड़ सकते हैं। आईएस-95 सेल्यूलर प्रणाली सीडीएमए तकनीक का प्रयोग करता है। आईएम-95 एक एनालॉग वार्ता सिंग्नल है, जो एक सेल को भेजा जाता है। और इसे पहले राशिकृत किया जाता है, इसके बाद डिजिटल आरेख संरचनाओं में से किसी एक संगठित किया जाता है। सीडीएमए को कभी-कभी स्पीड स्पैक्ट्रम मल्टीपल एक्सेस के साथ संबंद्ध किया जाता है, क्योंकि कूट अनुक्रम दव्ारा सिंग्नल के बहुगुणन की प्रक्रिया के कारण प्रसारित सिग्नल की शक्ति एक वृहत्तर बैंड विडथ पर विस्तारित हो जाती है। आवृत्ति प्रबंधन सीडीएम में समाप्त हो जाता है। सीडीएम प्रत्येक प्रयोक्ता को एक विशिष्ट आवृत्ति के साथ नहीं जोड़ता है। इसके बजाए प्रत्येक चैनल पूर्ण उपलब्ध स्पैक्ट्रम का प्रयोग करता है। भारत में सीडीएमए तकनीक की शुरूआत इसलिए की गई थी ताकि इसे फिक्स्ड लाइन तकनीक के रूप में स्थापित किया जा सके।

ग्लोबाल सिस्टम फॉर मोबाइल (Global System for Mobile (GSM) )

वर्ष 1982 में यूरोप में यूरोपियन कांफ्रेंस ऑफ पोस्टल एवं कम्युनिकेशन एडमिनिस्ट्रेशन में स्टैंडर्ड टेलीफोन सिस्टम के विकास एवं अध्ययन हेतु एक समूह का गठन किया गया, जो ग्रुप स्पेशल मोबाइल कहलाता था। वर्ष 1987 में यूरोप के 13 देशों की तरफ से एक मेमोरेंडम हस्ताक्षरित किया गया, जिसमें ऐसी सेल्यूलर तकनीक बनाने की बात की गई जो पूरे यूरोप के लिए समान हो। वर्ष 1989 में इसे बनाने की जिम्मेदारी यूरोपियन टेलीकम्यूनिकेशन स्टैंडर्ड इंस्टीट्‌यूट को दे दी गई। इसके बाद एक दव्तीय पीढ़ी सेल्यूलर मानक के ग्लोबल सिस्टम मोबाइल कम्यूनिकेशन का उदय हुआ जिसने ध्वनि सेवाओं और आँकड़ा संप्रेषण की सुविधाओं का विकास किया। पहला जीएसएम नेटवर्क फिनलैंड में शुरू किया गया। वर्ष 1991 में वाणिज्यिक सेवा शुरू करने के बाद वर्तमान में संपूर्ण विश्व के मोबाइल बाजार में जीएसएम में टीडीएमए तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है तथा इसका नेटवर्क का ही प्रयोग किया गया। जीएसएम की टीडीएमए तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है तथा इसका नेटवर्क चार विभिन्न आवृत्तियों में कार्य करता है। ये चार विभिन्न आवृत्तियाँ हैं- 850 मेगाहर्ट्‌ज, 900 मेगाहर्ट्‌ज, 1800 मेगाहर्ट्‌ज। अधिकांश जीएसएम नेटवर्क 900 मेगाहर्ट्‌ज से 1800 मेगाहर्ट्‌ज में मध्य काम करते हैं। जीएसएम नेटवर्क में चार अलग साइज के सेलफोन प्रयोग होते हैं जो हैं- माइक्रो, मेक्रो, पिका, फेमटो।

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