Science and Technology: Computers: Classification of Computers

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कम्प्यूटर (Computers)

कम्प्यूटर का वर्गीकरण (Classification of Computers)

जैसा कि विदित है, कम्प्यूटरों का प्रयोग साधारण गणना से संचार के अति उच्च तकनीक तक कमोबेश सभी क्षेत्रों में किया जाता हैं व्यापक स्तर पर कम्प्यूटरों के चार प्रमुख प्रकारों की पहचान की जा सकती है:

  • माइक्रो कम्प्यूटर (Micro Computer) : इस श्रेणी में वैयक्तिक कम्प्यूटर, लैपटॉप, पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट तथा वर्कस्टेशनों को सम्मिलित किया जाता है।
    • वैयक्तिक कम्प्यूटर (Personal Computer) : इस प्रकार के कम्प्यूटर को डेस्क टॉप यंत्र भी कहते हैं। पूर्व में इसमें 8088 नामक माइक्रोप्रोससर का प्रयोग किया जाता था। लेकिन वर्ष 2001 तथा उसके बाद पेन्टियम-4 नामक प्रोसेसर का प्रयोग किया जाने लगा हैं
    • लैपटॉप (Laptop) : इसे नोटबुक कम्प्यूटर भी कहते हैं। वस्तुत: ये कम्प्यूटर वैयक्ति कम्प्यूटर के सिद्धांत पर ही कार्य करते हैं। लेकिन इन्हें सरलतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। इनमें एक चौड़े पर्दे, द्रव क्रिस्टल डिस्प्ले तथा एक की-बोर्ड का उपयोग किया जाता है।
    • वैयक्तिक अंकीय सहायक (Personal Digital Assistant, PDA) : नोटबुक कम्प्यूटरों की अपेक्षा इनका आकार अत्यंत छोटा होता है। इन्हें संचार के व्यक्तिगत उपयोग के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
    • वर्कस्टेशन (Workstation) : इन कम्प्यूटरों को भी डेस्क टॉप यंत्र कहते हैं लेकिन इनकी कार्य क्षमता अत्यधिक होती है। इस कारण इनका उपयोग मुख्यत: विज्ञान और अभियांत्रिकी के क्षेत्र में बड़ी मात्रा में सूचनाओं के प्रसंस्करण के लिए किया जाता है।
  • मिनी कम्प्यूटर (Minicomputer) : इस प्रकार के कम्प्यूटरों को मिड-रेंज कम्प्यूटर भी कहते हैं। इनका निर्माण विनिर्माण के क्षेत्र में सूचनाओं के संग्रहण तथा प्रसंस्करण के उद्देश्य से किया गया है। मिनी कम्प्यूटर उपभोक्ता-सेवक तकनीक (Client-Server Technology) पर कार्य करते हैं। इसके कारण इनका पूरा लाभ उपभोक्ताओं को प्राप्त होता है। अत्यंत शक्तिशाली मिनी कम्प्यूटरों को सुपरमिनी कहा जाता है।
  • मेनफ्रेम (Mainframe) : जिन संगठनों में बड़ी मात्रा में सूचनाओं के प्रसंस्करण की अनिवार्यता है, वहां ऐसे कम्प्यूटरों का प्रयोग किया जाता है। इन संगठनों में रेलवे, बीमा आदि प्रमुख हैं। इन कम्प्यूटरों की प्रसंस्करण क्षमता एक करोड़ सूचना प्रति सेकेंड है।
  • सुपर कम्प्यूटर (Supercomputer) : संरचानात्मक एवं कार्यात्मक भिन्नता के आधार पर किसी कम्प्यूटर को सुपर कम्प्यूटर की संज्ञा दी जाती है। वस्तुत: सुपर कम्प्यूटर एकीकृत स्मृति क्षमता के साथ बहुपक्षीय प्रोसेसर तकनीक पर कार्य करता है जिनकी सहायता से मेगाफ्लॉप, टेराफ्लॉप तथा पेंटाफ्लॉप की दर पर कार्य करना संभव होता है। सामान्यत: इनमें एक साथ 10 - 15 प्रोसेसरों का प्रयोग किया जाता है, जो एक दूसरे के साथ समायोजित रहते हैं। अत्यधिक अंकगणितीय क्षमता के अतिरिक्त ऐसे कम्प्यूटरों की प्राथमिक स्मृति सामान्यत: 16 गीगाबाइट तथा दव्तीयक स्मृति 1000 गीगाबाइट की होती है। सभी सुपर कम्प्यूटर समानान्तर संगणना (Parallel Computation) के सिद्धांत पर कार्य करते हैं। इस प्रकार की संगणना में सभी प्रोससर अपने निकटस्थ प्रोसेसर के साथ सूचनाओं का विनिमय करते हैं। इसके फलस्वरूप एक समय में बड़ी संख्या में सूचनाओं का प्रसंस्करण किया जा सकता है। इस कारण ऐसे कम्प्यूटरों का उपयोग मौसम पूर्वानुमान, डी. एन. ए. की संगणनाओं, कृत्रिम बुद्धि, अंतरिक्ष विज्ञान, सांख्यकी संबंधी संगणनाओं, विभिन्न दवाओं की आणविक संरचना के अध्ययन तथा खगोलिकी के क्षेत्र में किया जाता है। सुपर कम्प्यूटर या तो अकेला कार्य करता है या कई ऐसे कम्प्यूटर एक साथ संबद्ध होते हैं। विश्व का प्रथम सुपर कम्प्यूटर 1960 के दशक में बनाया गया था जिसे सी. डी. सी. -6000 का नाम दिया गया था।

जहांँ तक भारत का प्रश्न है, 1980 के दशक में भारत में बंगलौर-स्थित एरोस्पेस प्रयोगशाला दव्ारा FLOSLOVE-MK 3 नामक पहला सुपर कम्प्यूटर बनाया गया था। इसका निर्माण द्रव और वायुगतिकी से संबंधित समस्याआंे के निराकरण के मूल उद्देय से किया गया था। कालांतर में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Research & Development Organisation, DRDO) की आवश्यकताओं के संदर्भ में हैदराबाद स्थित उन्नत संख्यात्मक अनुसंधान और विश्लेषण समूह (Advanced Numerical Research and Analysis Group, ANURAG) ने पेस (PACE: Processor for Aerodynamics Computation and Evaluation) का विकास किया। लेकिन भारत ने जिस सुपर कम्प्यूटर के विकास दव्ारा विश्व पटल पर अपनी पहचान बनाई है, वह है परम (Param) । इसका विकास पुणे स्थित उन्नत संगणना विकास केन्द्र (Centre for Development of Advanced Computing C-DAC) दव्ारा किया गया है। कालांतर में परम के कई मॉडल विकसित किये गये हैं। इनमें परम 8000, परम 8600 और परम 10000 शामिल हैं। हाल ही में सामान्य प्रोसेसर का प्रयोग कर केन्द्र ने परम पद्मा (Param Padma) नामक सुपर कम्प्यूटर का विकास किया गया है।

परम 10,000 में जिस प्रोसेसर का प्रयोग किया गया है उसे अल्ट्रा स्पार्क 2 (Ultra Sparc II) कहा जाता है। इस सुपर कम्प्यूटर की कई विशिष्टताएंँ एक विशेष प्रकार के साफ्टवेयर क्षिप्रा (Kishipra) दव्ारा प्रदान की गई हैं।

  • क्वांट कम्प्यूटर (Quantum Computer) : जैसा के अध्याय में अब तक वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है, एक परंपरागत कम्प्यूटर में सूचनाओं को कोड के रूप में संग्रहित किया जाता है। इसके विपरीत एक क्वांट कम्प्यूटर में सूचनाओं की आधारित इकाई को क्यूबिट (Qubit) कहते हैं। इसका कारण ऐसे कम्प्यूटर का क्वांटम भौतिकी के सिद्धांत पर कार्य करना है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि क्यूबट दव्आधारी प्रणाली के अतिरिक्त अन्य स्थितियों में भी उपलब्ध हो सकता हैं। दूसरे शब्दों में, एक क्यूबिट 0 - 1 तथा एक ही समय में दोनों ही अंकों के रूप में कार्य कर सकता है। इस आधार पर स्पष्ट है कि क्वांटम कम्प्यूटर भी सामानान्तंर संगणना की संकल्पना पर आधारित है। विभिन्न प्रकार की सूचनाओं को हस्तक्षेप से बचाने के लिए इसमें एक विशेष प्रकार की युक्ति का प्रयोग किया जाता है, जिसे इन्टरफेरोमीटर (Interferometer) कहते हैं।
  • ब्लू जीन कम्प्यूटर (Blue Gene Computer) : आगामी वर्षों में आई. बी. एम. कारपोरेशन दव्ारा के तीव्रतम कम्प्यूटर का विकास किये जाने की संभावना है। इसे ब्लू जीन कम्प्यूटर का नाम दिया गया है। इस परियोजना पर कुल 100 मिलियन डालर के व्यय होने की संभावना है। इसकी कार्यक्षमता में कार्य करने वाले सुपर कम्प्यूटरों से 500 गुणा अधिक होगी। कम्प्यूटर निर्माण के लिए एक नये कम्प्यूटर डिजाइन और तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। इसे स्मैश (SMASH: Simple, Many and Self-Healing) की संज्ञा दी गई है। साथ ही, इसमें 64 अत्यधिक तीव्र गति से कार्य करने वाले प्रोसेसरों का प्रयोग किया जाएगा। इस कम्प्यूटर के निर्माण के बाद इसका प्रयोग मानव प्रोटीन की संरचना की जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से किये जाने की संभावना है। इससे चिकित्सा वैज्ञानिकों को विभिन्न रोगों की पहचान करने में सहायता मिलेगी।
    • सागा-220 (SAGA-220) : Supercomputer for Aerospace with GPU Architecture:- इसरों (ISRO) के तिरूवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र ने इस सुपर कम्प्यूटर का विकास किया है जो अधिकतम कार्य निष्पादन क्षमता के मामले में देश का सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर है। ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट (GPU: Graphic Processing Unit) पर आधारित इस सुपर कम्प्यूटर का प्रयोग अंतरिक्ष वैज्ञानिकों दव्ारा अंतरिक्ष वैज्ञानिकी की जटिल समस्याओं को हल करने के लिए प्रयुक्त किया जाएगा।
    • अन्नपूर्णा (Annapurna) : यह भारत का सातवां सबसे तीव्र सुपर कम्प्यूटर है। इसकी मेमोरी 1.5 टेराबाइट एवं सूचना भंडारण क्षमता 30 टेराबाइट। इसकी Proccessing Speed 12 टेराफ्लॉप है।
  • प्रकाशीय कम्प्यूटर (Photonic Computer or Optical Computer) : प्रकाशीय कम्प्यूटर वह कम्प्यूटर प्रणाली है जिसमें लेजर प्रकाश का प्रयोग सूचनाओं के संप्रेषण संगणन के लिए किया जाता है। निश्चित रूप से इसमें प्रंसस्करण तथा संप्रेषण दोनों की ही गति अत्यधिक होती है। इसके लिए प्रकाश तुंतुओं के नेटवर्क की अनिवार्यता है।
    • इस दिशा में पहला प्रयास 1989 में किया गया था जब प्रकाशीय ट्रांजिस्टर का विकास हुआ था। जैसा के हम जानते हैं, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर में ट्रांजिस्टर की आवश्यकता होती है लेकिन उसमें फोटोन की सहायता से कार्य करने की क्षमता होती है। इस कारण ऐसे ट्रांजिस्टर में अरेखीय अपवर्तनाक (Non-Linear Refractive Index) वाले पदार्थों की प्रयोग होता है।
    • हांलाकि इस संबंध में एक समस्या का उल्लेख वैज्ञानिकों दव्ारा किया गया है। संगणन (Computation) एक आरेखीय प्रक्रिया है जिसमें कई प्रकार के संकेतों के बीच अन्त: क्रिया होती है ताकि प्रसंस्करण किया जा सके। यह अन्त: क्रिया इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर में अत्यधिक तीव्र गति से होती है। इसके विपरीत, प्रकाश जो एक वैद्युत चुंबकीय तरंग है, किसी अन्य ऐसी ही तरंग के साथ अन्त: क्रिया कर सकता है। इलेक्ट्रॉन अनुपस्थिति में यह अन्त: क्रिया कम दर पर होती है। इस कारण प्रकाशीय कम्प्यूटर में ऊर्जा की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।
    • लेकिन दूसरी ओर, प्रकाश की गति अत्यधिक होने के कारण सूचनाओं का संप्रेषण अत्यंत तीव्र गति से होता है। अत: सुपर कम्प्यूटरों में प्रकाशीय तकनीक प्रयुक्त हो रही है। उल्लेखनीय है कि प्रकाश तंतुओं के बिना इनका प्रयोग किया जाता है तथा इसमें 2 अरब बिट प्रति सेंकड की दर प्रसंस्करण संभव होता है।
    • हांलाकि वर्तमान में कोई वास्तविक प्रकाशीय कम्प्यूटर विकसित नहीं किया जा सकता है लेकिन भविष्य में दूर संचार के क्षेत्र में इसके विकास की प्रबल संभावना है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह हैं कि प्रकाशीय कम्प्यूटर एक से अधिक आवृत्ति वाली तरंगों को एक ही समय संप्रेषित करने की क्षमता होती है।

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