Science & Technology: Prototype Fast Breeder Reactor and Cyber War

Get unlimited access to the best preparation resource for CTET-Hindi/Paper-1 : get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-1.

अद्यतन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Latest Development in Science & Technology)

प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियक्टर (Prototype Fast Breeder Reactor)

  • भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) के अनुसार, जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियक्टर (PFBR) का निर्माण कर रहा है, इस प्रोजेक्ट ने विशिष्ट उपलबि हासिल कर ली है। 500 डॅम वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियक्टर (PFBR) के इस प्रोजेक्ट का निर्माण भारत में दव्तीय चरण के नाभिकीय शक्ति कार्यक्रम की शुरूआत का संकेत दे रहा है, जिसके अंतर्गत फास्ट ब्रीडर रियक्टर की एक श्रृंखला स्थापित की जाएगी। प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रियक्टर (PFBR) में ईंधन के तौर पर प्लूटोनियम-यूरेनियम आक्साइड और शीतलक के तौर पर तरल सोडियम का प्रयोग किया जाएगा। यह मार्च, 2012 तक उत्पादन अवस्था में होगा। रियक्टर के सभी आंतरिक भाग, जिसमें कोर और प्राथमिक सोडियम परिपथ शामिल है, एक मुख्य वेसल में स्थित होते हैं। तापीय बफल (Thermal Baffle) जो कि अभी हाल में ही स्थापित की गई थी उसमें दो संकेदव्क कोष होते हैं जो लगभग 12.5 मीटर व्यास वाले एवं 5 मीटर लंबे होते हैं।
  • परमाणु ऊर्जा विभाग के नाभिकीय शक्ति कार्यक्रम के प्रथम चरण के अंतर्गत दाबित भारी जल रियक्टरों की श्रृंखला पहले से ही बनाई जा चुकी है जिसमें प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन के तौर पर एवं भारी जल शीतलक एवं मंदक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  • बफल ठंडे सोडियम को मुख्य वेसल को ठंडा करने हेतु रास्ता उपलब्ध कराएगा और सामान्य परिचालन के दौरान रियक्टर के तापक्रम को 5500c से 4500c तक नीचे लाएगा। इसका उद्देश्य ताप से होने वाली जटिलता एवं संरचना के टूटने के खतरे से मुख्य वेसल को बचाना है।
  • बफल का निर्माण भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स दव्ारा किया गया है तथा इसे मुख्य वेसल के साथ जोड़ा जाएगा। यह वेसल तैरने वाली मकड़ी की संकल्पना पर आधारित होगा। इसके दोनों संकेद्रिक कोषों से कार्य लेने हेतु सावधानी पूर्वक नियोजन एवं प्रक्रियाओं के विकास की आवश्यकता है क्योंकि परंपरागत विधियांँ इसमें प्रभावी नहीं होगी। कल्पक्कम स्थित इंद्रा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्द्र दव्ारा डिज़ाइन किया गया है तथा इसका जीवन काल 40 वर्षो का होगा।

साइबर युद्ध (Cyber War)

  • लंदन स्थित ‘अंतरराष्ट्रीय सामरिक संस्थान’ की नीवनतम रिपोर्ट के अनुसार साइबर युद्ध सैन्य आधार संरचना, सरकारी एवं निजी संचार तंत्र और वित्तीय बाजारों के समक्ष एक क्रमश: बढ़ती हुई लेकिन बहुत कम समझी गई अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी खतरा उत्पन्न करता है एवं राज्यों के मध्य भविष्य में होने वाले संघर्षों में एक निर्णायक हथियार सिद्ध हो सकता है। राजनीतिक विवाद में साइबर आक्रमण के प्रभाव के बावजूद साइबर विवाद को किस प्रकार आंका जाए इस संदर्भ में वैश्विक स्तर पर थोड़ी समझ विकसित हुई है। कुछ विशेषज्ञों ने कहा है कि वर्तमान विश्व साइबर युद्ध की समस्या के साथ-साथ बौद्धिक विकास के उसी स्तर पर पहुंच गया है जैसा कि 1950 के दशक में नाभिकीय युद्ध की संभाव्यता थी। रिपोर्ट का नामक ‘सैन्य संतुलन 2010’ है जो वैश्विक सैन्य क्षमता और रक्षा आर्थिकी का एक आकलन प्रस्तुत करती है। अध्ययन में अन्य सुरक्षा खतरों की ओर भी संकेत किया गया है। इनमें अफगानिस्तान में युद्ध, चीन का सैन्य विविधीकरण, इरान कें परमाणु कार्यक्रम का विकास और इराक के और कहीं भी आतंकवादी समूहों का प्रभाव आदि शामिल हैं। भविष्य में राज्यों के बीच संघर्ष तथा ऐसे संघर्ष जिसमें अलकायदा जैसे गैर राज्यीय कर्ता शामिल होंगे असंतुलित युद्ध तकनीकों पर निर्भरता के आधार पर पहचाने जाएगे। ऐसा राज्य जो दूसरे राज्यों के प्रति शत्रुतापूर्ण दुष्टिकोण रखता है तीव्र गति से उन्नतशील प्रोद्योगिकी की आड़ में गुप्त आक्रमण करने में सक्षम होंगे। पारंपरिक एवं नाभिकीय हथियारों से भिन्न साइबर हथियारों की रोक पर काई भी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बनी है। साइबर युद्ध स्थिति किसी देश के आधारिक संरचना को असक्षम कर सकता है, दूसरे देश के सैनिक आंकड़ों से हस्तक्षेप कर उसकी अखंड़ता को प्रभावित कर सकता है, किसी देश के वित्तीय लेन देन को भ्रमित अथवा अन्य संभावित तरीकों से पंगु कर सकता है।
  • साइबर युद्ध प्रणाली में, मुख्यत: इंटरनेट प्रणाली में अवैध घुसपैठ, कम्प्यूटर नैटवर्कों एवं साफटवेयर प्रणाली को नष्ट-भ्रष्ट करना, हैकिंग एवं कम्प्यूटर जासूस फौरेंसिक जैसी चीजें शामिल होती है। साइबर युद्ध आक्रमण, चाहें वे सरकार समर्थित हो अथवा नीति संगठनों दव्ारा चालित हो, से संबंधित रिपोर्ट लगातार सामने आ रही है। हाल ही में गूगल ने चीन से संचालित साइबर आक्रमणों की जाँच का कार्य प्रारंभ किया जिनमें कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के ई-मेल खातों को तोड़ने का प्रयास किया गया था।
  • दिसम्बर 2009 में दक्षिण कोरिया सरकार ने उत्तर कोरियाई हैकरों के दव्ारा गुप्त रक्षा योजनाओं, जिनमें कोरियाई प्रायदव्ीप पर यृद्ध की स्थिति में दक्षिण कोरियाई अमरीकी रणनीति की रूप रेखा दी गई थी, को चुराने हेतु साइबर आक्रमण की रिपोर्ट दी थी। अब तक का सर्वाधिक कुख्यात साइबर आक्रमण एस्टोनिया में 2007 में घटित हुआ था जब 10 लाख से अधिक कम्प्यूटरों के माध्यम से सरकारी व्यापारिक एवं मीडिया व्यवसायों को अवरूद्ध कर दिया था। यह आक्रमण जो संभवत: रूस से संचालित हुआ था, ने दोनो देशों के बीच तीव्र राजनीतिक तनाव को जन्म दिया था इससे हजारों मिलियन यूरो की क्षति हुई थी।

इस रिपोर्ट में निम्नांकित बाते उल्लेखनीय हैं:

  • अफगानिस्तान में आतंकवाद अत्यंत जटिल है एवं पाकिस्तान का पूर्ण सहयोग संदिग्ध है।
  • अलकायदा के पास अभी भी बगदाद में नियमित आक्रमण क्षमता मौजूद है।
  • यद्यपि तकनीकी बाधाएँं ईरान की नाभिकीय महत्वाकाक्षाओं को सफल नहीं होने दे रही हैं फिर भी इरान में सर्वाधिक यूरोनियम का संग्रहण बढ़ता जा रहा है।

ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र (Brahmos Missile)

  • भारत विश्व मे ंपहला देश है जिसने उड़ीसा तट से एक गतिशील युद्धपोत आई. एन. एस रणवीर से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का लम्बवत्‌ प्रक्षेपण किया। यह मिसाइल आई. एन. एस रणवीर पर स्थापित एक लंबवत्‌ लांचर से प्रक्ष्ेपित किया गया तथा जिसमें अनुप्रयुक्त लक्षित जहाजा आई. एन. एस. मीन को सफलतापूर्वक नष्ट किया। इस उड़ान ने मिशन की सभी आवश्यकताओं को पूरा किया तथा यह 100 प्रतिशत सफल था। यह परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण था, जिसमें मिसाइल जो 2.8 मैक की चाल से लम्बवत्‌ लांचर दव्ारा प्रक्षेपित किया था एवं जिसने सफलतापूर्वक लक्ष्य को नष्ट किया।
  • नौसेना ने पहले से ही 290 किमी. पारस वाली ब्रह्मोस मिसाइल को अपने कुछ युद्धपोतों पर तैनात किया है। 711 करोड़ रुपये की लागत वाली 49 फायरिंग इकाइयों को स्थापित किया है, ये झुके हुए प्रमोचक विन्यास पर आधारित है। अब इन हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करने वाली मिसाइल को लम्बवत्‌ प्रामोचक विन्यास में भी शामिल किए जाने की तैयारियां चल रही है।
  • यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जबसे लम्बवत्‌ प्रमोचक (लांचर) , युद्धपोत के फर्श के नीचे स्थापित किया गया है, वातावरणीय पदव्तियों से बचाना संरक्षित हो रहा है तथा हथियार प्रणाली को गुप्त रखने में सहायता मिली है। यह प्रणाली मिसाइल को किसी भी दिशा में आक्रमण करने हेतु सक्षम बनाती है।
  • लम्बवत्‌ प्रमोचकों के कारण ब्रह्मोस 3600 स्पैक्ट्रम में भी लक्ष्य को भेद सकती है। ऐसे दो मोड्‌यूल 16 मिसाइलों के साथ प्रत्येक तीन कोलकाता क्लास पी-15 डिस्ट्रायरों में स्थापित किये जा रहे हैं जो 11.662 करोड़ रु. की लागत से मझगांव डाक में बनाई जा रही है। ब्रह्मोस, तीन तलवार क्लास, स्टील्थ फिग्रेट पर स्थापित की जाएगी। जिसे कैलिनिगार्ड (रशिया) में यांनतार शिपयार्ड पर 5514 करोड़ रु. के प्रोजेक्ट के अंतर्गत निर्मित किया जाएगा।
  • सेना ने दो और ब्रह्मोस-2 लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LACM) ‘सटीक लक्ष्य भेदक हथियार’ के रूप में निर्मित की है जिसे अनियोजित शहरी वातावरण में स्थित छोटे लक्ष्यों को लक्षित करने में सक्षम बनाया गया है। ब्रह्मोस ब्लाक-2 को शामिल करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि पाकिस्तान चीन के सहयोग से विकसित नाभिकीय क्षमतायुक्त बाबर, जिसका परास 500 किमी है। बड़ी मात्रा में अपनी सेना शामिल कर रहा है। ब्रह्मोस-2 को देश की सीमा के बाहर स्थित आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्रों पर Surgical Strickes के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है वह भी बिना किसी समपार्शिविक क्षति पहुंचाए। 290 किमी. परास वाली ब्रह्मोस-1 विन्यास की एक रेजीमेंट, जिसमें 67 मिसाइलें, 5 सचल स्वतंत्र प्रमोचक, जो 12x12 Tatra गाड़ी पर स्थित है और दो सचल कमांड पोस्ट तथा अन्य उपकरण, पहले से ही सेना में प्रयोग की जा रही है। सेना ने प्रथम चरण में 8352 करोड़ रु. की लागत वाली दो ब्रह्मोस रेजीमेंट का आर्डर पहले ही दे दिया था। ब्रह्मोस-2 विन्यास बहुलक्षित वातावरण में स्वू Radar Cross Section के साथ विशिष्ट छोटे लक्ष्यों के लिए निर्मित की गई है।
  • भारत एवं रूस ने 5 और 7 मैक की रफ्तार से उड़ने में सक्षम हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-2 मिसाइल के निर्माण हेतु प्रारंभिक कार्य प्रारंभ कर दिया है। अंतत: सशस्त्र बल की योजना 1500 किमी. मारक क्षमता वाली न्यूक्लियर टिप्ड LACM के विकसित करने की है। अग्नि जैसे बैलिस्टिक मिसाइलों के विपरीत क्रूज मिसाइलें वातावरण को नहीं छोड़ती और अपने उड़ान मार्ग दव्ारा समर्थित एवं निर्देशित होती हैं। क्रूज मिसाइलें निम्न अक्षांशों पर उड़ने के परिणामस्वरूप शत्रु के रडारों एवं वायु रक्षा तंत्र से बच सकती हैं साथ ही साथ बैलिस्टिक मिसाइलों की तुलना में ये सस्ती हैं एवं अधिक सटीकता तथा सरल ढंग से संचालित की जा सकती हैं।

Developed by: