Science and Technology: Recent Space Operated by India and Development Activities

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अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में हुए नवीन विकास (New Developments in Space Technology)

भारत दव्ारा संचालित हालिया अंतरिक्ष (Recent Space Operated by India)

कुछ अन्य विकास गतिविधियाँ (Some Other Development Activities)

  • पीएसएलवी XI, C22 (PSLV XI, C22) : ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान की 24वीं उड़ान PSLV XI, C22 यान से संचालित हई। इस यान ने देश के प्रथम समर्पित नौवहन उपग्रह IRNSS-IA का सफल प्रक्षेपण किया। इस प्रक्षेपण के लिए PSLV के extra Large (XI) रूप का उपयोग किया गया। उल्लेखनीय है कि PSLV C11, PSLV-C17 और PSLV-C19 के दव्ारा पूर्व में संचालित क्रमश: चंद्रयान-1, जीसेट-12 और रीसैट-1 मिशनों में XI भी रूप का उपयोग किया गया था। इस प्रक्षेपण यान में प्रयुक्त ईंधन हैं-
    • HTPB (हाइड्रॉक्सिल टर्मिनटेड पॉली ब्यूटाडाइन)
    • UH25 (अनसिमेट्रकील डाई-मिथाइल हाइड्रजीन + 25 प्रतिशत हाइड्राजीन हाइड्रेट)
    • N2O4 (नाइट्रोजन टेट्रऑक्साइड)
    • MMH (मोना मिथाइल हाइड्रजीन) और
    • MON-3 (मिक्स्ड ऑक्साइड्‌स ऑफ नाइट्रोजन)

विदित हो कि PSLV का XL रूप स्ट्रैप -ऑन बूस्टर की सहायता से अधिक पेलोड (Pay Load) का वहन करने में सक्षम है। यह 1800 किग्रा. के पेलोड अपने साथ ले जा सकता है।

  • भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System) - अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) की भांति भारत ने भी ऐसी प्रणाली अपनाने पर बल दिया है। जीपीएस की भांति भारतीय उपग्रह भी आंकड़ों का निरंतर पारेषण करने में समर्थ होंगे। साथ ही इससे आंकड़ा प्राप्तकर्ता दव्ारा अपनी उपयुक्त अवस्थिति निर्धारण में भी सहायता मिलेगी। विदित है कि जीपीएस प्रणाली में 24 कक्षीय उपग्रहों का समूह कार्यकर्ता है। ये उपग्रह पूरे विश्व के प्रत्येक भाग को नियंत्रित करते हैं। इस प्रकार की प्रणाली व्यय साध्य है।
    • दूसरी ओर भारत के अंतरिक्ष संगठन इसरो (ISRO) ने भारत को नियंत्रण वाले देश के पूरे क्षेत्रफल को अपनी निगरानी में रखने वाला नेविगेशन प्रणाली स्थापित करने की पहल की है।
    • इस प्रणाली को भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System) की संज्ञा दी गई है। इसकी स्थापना के लिए 7 उपग्रहों की आवश्यकता दर्शायी गई है।
    • ये सातो आई. आर. एन. एस. एस. उपग्रह पृथ्वी से 36000 किमी. की ऊचाई पर पृथ्वी का परिक्रण एक दिन में कर सकेगी।
    • इनमें से तीन उपग्रह भूमध्य रेखा के ऊपर स्थापित किए जाएँगे। शेष चार उपग्रह दो अवनत भू तुल्यकालिक कक्षाओं में एक जोड़े में होंगे। नीचे से देखने पर ऐसा प्रतीत होगा कि ये उपग्रह एक दिन में “8” की आकृति में भ्रमण कर रहे हैं।
    • उल्लेखनीय है कि वर्ष 2006 में ही भारत सरकार ने इस प्रोजेक्ट को स्वीकृति दे दी थी। इस प्रणाली के जरिए पूरे भारत एवं इसकी सीमा से 1500 तक के किमी. क्षेत्र को अच्छादित किया जा सकेगा। आवश्यकतानुसार चार और उपग्रह सम्मिलत किए जा सकते हैं। इससे भारत के ईद गिर्द के व्यापक क्षेत्र को अच्छादित किया जा सकेगा।
    • पहले आइआरएनएसएस को ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान से 1 जुलाई को अंतरिक्ष में भेजा जाना है।
    • ज्ञातव्य है कि नेविगेशन उपग्रह प्रत्येक पारेषण के जरिए कक्षा में अपनी सुनश्चित स्थिति आवर्र्ती आधार पर दर्शाते हैं। उपग्रह से पारेषित सूक्ष्म तरंगे प्रकाश के वेग से दूरी तय करती है। सिग्नल को पारेषित करने के बाद संग्राहक दव्ारा इसकी प्राप्ति में लगे समय की गणना कर उपग्रह से संग्राहक की दूरी का पता लगाया जाता है।
    • प्रत्येक आईआरएनएसएस उपग्रह में तीन रूबीडियम परमाण्विक घड़ी लगाए गए हैं। यह घड़ी समय की शुद्ध गणना में सक्षम है। परन्तु इन घड़ियों के सही तरीके से काम करने के लिए आवश्यक है कि इन्हें इनके परिचालन योग्य तापमान के 1 डिग्री सेल्सियस के अंतर्गत रखा जाए। इन्हें अत्यधिक कंपन एवं वैद्युतचुम्बकीय अवरोधों से भी सुरक्षित रखने की आवश्यकता होती है। आईआरएनएसएस उपग्रहों को इसी आधार पर निर्मित किया जा रहा है।
    • परमाण्विक घड़ी दव्ारा दर्शाये गए समय और कक्षा में उपग्रह की स्थिति के आधार पर नेविगेशन कर रहा नीतिभार (Payload) ब्रॉडकास्ट करने वाले सिग्नल भेजता है। आईआरएनएसएस उपग्रह एल 5 और एस नामक दो सूक्ष्मतरंगीय आवृत्ति बैंड में सिग्नल पारेषित करते हैं। इस प्रणाली के जरिए दो प्रकार की सेवाएँ प्रदान की जाएँगी। एक है ‘स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस’ जो कि प्रत्येक व्यक्ति को उपलब्ध हो सकेगा और दूसरा है प्रतिबंधित सेवाएँ जो कि केवल सेना और अन्य सरकारी प्राधिकारियों को उपलब्ध होगा। यह आशा की जा रही है कि प्राथमिक सेवा क्षेत्र में यह उपग्रह प्रणाली 20 मीटर से अधिक स्तर की उपयुक्त स्थिति दर्शाने में भी सक्षम होगा। आईआरएनएसएस की सुविधा का उपयोग करने के लिए आवश्यक होगा कि संग्राहक में भारतीय उपग्रह प्रणाली दव्ारा पारेषित आँकड़े प्राप्त करना और इसका उपयोग करने हेतु उपकरण हो।
  • एस आर ई -2 (SRE-2) : यह एसआरई-1 प्रोजेक्ट का अगला प्रारूप है। यह पूरी तरह पुन: प्रवेश योग्य कैप्सूल होगा और यह माइक्रो ग्रैविटी अनुप्रयोगों के प्लेटफॉर्म के रूप में काम करेगा। इसमें पुन: प्रवेश योग्य प्रक्षेपण योनों के लिए आवश्यक क्रांतिक तकनीकों (Critical Technologies) का भी उपयोग किया जाएगा। स्पेन रिकवरी एक्सपेरिमेंट (SRE) कैप्सूल के 4 विशिष्ट हार्डवेयर अवयव है
    • एयरो थर्मा स्ट्रक्चर (ATS)
    • अंतरिक्षयान प्लैटफॉर्म
    • मदन एवं प्रवाह प्रणाली (Deceleration and Flotation System)
    • पेलोड (Payloads)

एसआरई-2 में कार्बन-कार्बन नोज कैप (Carbon-Carbon Nose Cap) और स्वदेशी अल्ट्रा हाई फ्रिक्वेंसी बिकॉन्स (Ultra High Frequency Beacons) का उपयोग किया गया है।

  • भारतीय ह्मूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम (Indian Human Spaceflight Programme) : भारत एक ऐसे चालक दल युक्त अंतरिक्ष यान का निर्माण करने की योजना बना रहा है जिसमें 2 या 3 अंतरिक्षयात्री यात्रा कर सकेंगे। प्रारंभ में वर्ष 2017 के पहले एक मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान का प्रस्ताव सामने आया था, जिसमें पूरी तरह स्वायत कक्षीय अंतरिक्ष यान का उपयोग किया जाता था। यह यान 2 से 3 अंतरिक्षयात्रियों के दल को 7 दिनों के लिए लो अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit) में ले जाता और पुन: वापस लाता।
    • लेकिन विगत दिनों में GSLV उड़ानों में विफलता के कारण भारत ने फिलहाल मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान प्रोजेक्ट को ठप कर दिया।

भारतीय अंतरिक्ष संगठन इसरो इस प्रोजेक्ट के मद्देनजर तीन प्रमुख क्षेत्रों में स्वयं को सुदृढ़ करना चाहता हैं, ये हैं:-

  • इनवायरन्मेंटल कंट्रोल एंड लाइफ सपोर्ट (ECLS) सिस्टम
  • क्यू एरस्केप सिस्टम
  • फ्लाइट सूट

इसरों ने प्रथम मानवयुक्त मिशन 2015 में भेजने की संभावना व्यक्त की थी। फिर कुछ ही दिनों बाद इसकी अवधि एक वर्ष और बढ़ाकर 2016 कर दी गई। लेकिन दिसंबर, 2010 में GSLV – FO6 की विफलता के कारण इस मिशन में और देरी की स्थिति बनने लगी। चूँकि इस मिशन GSLV में का ही उपयोग किया जाना विचारणीय था अत: GSLV तकनीक में और विकास बात पर जोर दिया गया।

  • भारत का मानव युक्त अंतरिक्षयान रूस के सोयूज अंतरिक्षयान पर आधारित होगा। यह यान GSLV II/GSLV III लांचर का वहन करेगा। यह अंतरिक्षयान सात दिवसीय मिशन के लिए डिजाइन किया जाएगा और मिशन पूरा होने के बाद अरब सागर या बंगाल की खाड़ी में गिर जाएगा।
  • इस वर्ष इसरों ने प्लाज्मा विंड टनल टेस्ट (Plasma Wind Tunnel Test) दव्ारा यह पता लगाया कि क््रयू मॉड्‌यूल में प्रयोग किये जाने वाले थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम (TPS) किस प्रकार कार्य करते है। जटिल वातावरण से सुरक्षित रखने के लिए यान को हल्कापन प्रदान किया जाएगा और इसमें अच्छी गुणवत्ता के TPS प्रणाली जोड़ी जाएगी।
  • इसरो ने मानवयुक्त अंतरिक्षयान मिशन प्रयोग के मद्देनजर इसी वर्ष SRE-2 प्रक्षेपित करने की योजना बनायी है।

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