Science and Technology: Geostationary Satellite Launch Vehicle, GSLV

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उपग्रह प्रमोचक यान (Satellite Launch Vehicle)

भू- स्थैतिक उपग्रह प्रमोचक यान (Geostationary Satellite Launch Vehicle, GSLV)

इनसैट श्रेणी के उपग्रहों के प्रक्षेपण के उद्देश्य से भू-स्थैतिक उपग्रह प्रमोचक यान केविकास को संकल्पित किया गया था। तकनीकी रूप से जी. एस. एल. वी. का विकास पी. एस. एल. वी को संवर्द्धित कर दिया गया था। पी. एस. एल. वी के ऊपरी दोनों चरणों को निम्नतापी ईंजन (क्रायोजेनिक ईंजन) से प्रतिस्थापित किया गया है, जिसमें द्रवित हाइड्रोजन ईधन के रूप में तथा द्रवित आक्सीजन आक्सीकारक के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इन दोनों ही पदार्थों को अल्युमिनियम के मिश्र धातु से निर्मित दो अलग अलग प्रकोष्ठों में रखा जाता है। ये दोनों प्रकोष्ठ एक दूसरे से एक आंतरिक चरण की सहायता से जुड़े रहते है। जी. एस. एल. वी -डी 1 में लगभग 12.5 टन प्रणोदक का उपयोग किया गया था जिसकी ज्वलन क्षामता 750 सेकेंड तक की तथा इससे 75 किलो न्यूटन की शक्ति उत्पन्न की गई थी। इस यान में द्रवित हाइड्रोजन-2530 सेल्सियस तथा द्रवित आक्सीजन -1950 सेल्सियम तापक्रम पर रखे गये थे।

Geostationary Satellite Launch Vehicle (GSLV)

जी. एस. एल. वी के पहले चरण में ठोस प्रणोदक का प्रयोग करने वाला एक तथा द्रव प्रणोदक का प्रयोग करने वाले चार मोटर होते हैं। ठोस प्रणोदक के रूप में एच. टी. पी. बी. तथा द्रव प्रणोदक के रूप में यू. डी. एम. एच. का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ नाइट्रोजन टेट्राक्साइड ऑक्सीकारक के रूप में प्रयुक्त होता है। दूसरे चरण में केवल द्रव प्रणोदक तथा ऑक्सीकारक का ही प्रयोग होता है। जी. एस. एल. वी. की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें लगाए गए कम्प्यूटरों की सहायता से उपग्रहों को उनकी कक्षा में सटीकता के साथ स्थापित किया जा सकता है। पी. एस. एल. वी की तुलना में यह प्रमोचक यान कई मामलों में भिन्न है, जैसे

  • पहले चरण में द्रव प्रणोदक वाले स्ट्रैप ऑन मेटरों का प्रयोग।
  • पी. एस. एल. वी की तुलना में यान का अधिक व्यास।
  • मिशन डिजाइन तथा सिम्यूलेशन।
  • क्रायोजेनिक ईजन।

जीएसएलवी की पहली विकासात्मक उड़ान 18 अप्रैल 2001 को हुई थी जबकि दूसरी उड़ान 8 मई को। दोनों उड़ानों से क्रमश: ग्रामसैट-1 तथा ग्रामसैट-2 को उनकी कक्षा में स्थापित किया गया था। इसके उपरांत 20 सितंबर, 2004 को यान की पहली कार्यात्मक उड़ान दव्ारा एजुसैट को प्रक्षेपित किया गया था। लेकिन 10 जुलाई 2006 को यान की दूसरी कार्यात्मक उड़ान असफल हो गई जिसके कारण इनसैट-4 सी उपग्रह को नष्ट करना पड़ा। जुलाई 2007 में जीएसएलवी की तीसरी कार्यात्मक उड़ान की सहायता से इनसैट-4 सी-आर को प्रक्षेपित किया गया।

नई परियोजना के तहत जीएसएलवी मार्क-3 नामक यान का विकास किया जा रहा हैं हाल ही में तमिलनाडु के महेन्द्रगिरि में इसके एक शक्तिशाली ईंजन का सफल परीक्षण किया गया है।

उपग्रह संचालन प्रणालियाँ (Satellite Navigation System)

  • हांलाकि उपग्रह संचालन प्रणालियाँं काफी पहले से सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है लेकिन हाल के दशकों में विश्व स्तर पर व्यापक तथा क्षेत्रीय प्रणालियों के विकास की दिशा में तेजी से प्रगति हुई है। तकनीकी रूप से उपग्रह संचालन प्रणाली उन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों अथवा यंत्रों का समूह है जिनकी सहायता से किसी वस्तु, अथवा पिंड अथवा स्थान की अक्षांशीय, देशांतरीय, उच्चावच तथा अन्य संबंधित पक्षों की विस्तृत और सटीक जानकारी प्राप्त की जाती है। दूसरे शब्दों में, ये प्रणालियांँ भू-स्थानिक (Geo-Spatial) सूचनाएंँ देने में सहायक होती हैं। मुख्य रूप से इन प्रणालियों दव्ारा रेडियों संकेतों का प्रयोग किया जाता है जो उपग्रहों के माध्यम से पृथ्वी पर स्थापित केन्द्रों तक संप्रेषित किए जाते हैं, जहाँं उनका सटीक अध्ययन कर अपेक्षित जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। ये रेडियो तरंगे दीर्घ तंरगदैर्ध्य वाली होती हैं। इनकी आवृत्ति कम होने से अधिक दूरी तक संकेतों को भेजा जा सकता है।
  • 1960 के दशक के पूर्वसंचालन प्रणालियों जैसे लोरान (LORAN) , डेका (DECCA) तथा ओमेगा (OMEGA) में उपग्रहों के बदले दीर्घ तरंग दैर्ध्य वाली पार्थिव रेडियो तरंगों का प्रयोग किया जाता था। एक प्रणाली दव्ारा एक मुख्य केन्द्र से रेडियो विक्षोभ (Radio pulse) भेजा जाता था। इसके बाद विक्षोभों की पुनरावृत्ति की जाती थी जिन्हें अन्य केन्द्रों दव्ारा संग्रहित कर लिया जाता था। संकेतों के भेजने तथा उनका संग्रहण करने के बीच की अवधि को नियंत्रित किया जाता था।
  • 1960 के दशक में अमेरिका दव्ारा “ट्रांजिट” (TRANSIT) नामक विश्व की पहली उपग्रह-आधारित संचालन प्रणाली विकसित की गई। यह प्रणाली “डॉप्लर प्रभाव” पर आधारित थी। इसमें शामिल उपग्रह अपने निश्चित पथ पर परिक्रमा करते थे तथा उनके दव्ारा नियंत्रित आवृत्ति पर संकेत भेजे जाते थे। उपग्रह के गतिशील होने के कारण संप्रेषित आवृत्ति तथा संग्रहित आवृत्ति में भिन्नता देखी जाती थी। कम समयांतराल में आवृत्ति में हुए इस परिवर्तन का आकलन कर अवस्थिति का ज्ञान प्राप्त किया जाता था। उल्लेखनीय है कि उपग्रह संचालन प्रणाली में शामिल सभी उपग्रहों को समतुल्य बनाए रखने के लिए एक परमाणविक घड़ी (Atomic Clock) का प्रयोग किया जाता है।

उपग्रह संचालन प्रणालियोंं को सैनिक तथा असैनिक दोनों ही क्षेत्रों में प्रयोग में लाया जा सकता है। आरंभिक चरणों में इसका प्रयोग केवल सैन्य उद्देश्यों की प्राप्ति, विशेषकर हथियारों को लक्ष्य तक पहुँचाने तथा चौकसी के लिए किया जाता था। लेकिन हाल के वर्षों में विश्व में तेजी से बढ़ रही असैनिक आवश्यकताओं ने इस क्षेत्र में भी इसके उपयोग को प्रोत्साहित किया है। असैनिक क्षेत्र में मुख्य रूप से ऐसी प्रणालियों को निम्नांकित कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता है-

  • राहत एवं बचाव।
  • स्थान-विशिष्ट सेवाओं की उपलब्धता।
  • वन तथा वन्य जीव प्रबंधन।
  • वाहनों, जलयानों तथा वायुयानों का संचालन।
  • सर्वेक्षण।
  • भौगोलिक सूचना प्रणाली को सहयोग।

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