Science and Technology: Cellular Telephony: Global System for Mobile (GSM)

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सेल्यूलर फोन प्रणालियाँ (Cellular Telephony)

ग्लोबाल सिस्टम फॉर मोबाइल (Global System for Mobile (GSM) )

3-जी मोबाइल सेवा (3-G Mobile Service)

  • प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 11 दिसंबर, 2008 को भारत में पहली बार 3-जी मोबाइल सेवा का शुभारंभ किया। उन्होंने महासागर टेलीफोन निगम लि. (MTNL) की 3 -जी मोबाइल सेवा का नई दिल्ली में उद्घाटन किया। इसे ‘जादू’ नाम दिया गया है। यह तीसरी पीढ़ी की मोबाइल सेवा है, जो तकनीक और सुविधाओं के मामलें में मौजूदा दूसरी पीढ़ी (2-जी) से कई गुना बेहतर है। 3-जी नेटवर्क पर उपभोक्ता 2 मेगाबाइट प्रति सेकंड की गति से इन्टरनेट सर्फिंग कर सकेंगे, जबकि 2-जी नेटवर्क पर अधिकतम 144 किलोबाइट प्रति सेकंड डाटा का ट्रांसफर हो सकता है। 3-जी मोबाइल 15 - 20 मेगाहर्टर्स बैंडविड्‌थ में कार्य करते हैं, जबकि 2-जी मोबाइल अधिकतम 200 किलोहर्ट्‌स बैंडविड्‌थ ही उपयोग करते हैं। बैंडविड्‌थ जितनी अधिक होगी, डाटा ट्रांसफर की गति भी उतनी ही अधिक होगी। 3-जी नेटवर्क ऑपरेटर उपभोक्ताओं को उन्नत सेवाओं की एक विस्तृत रेंज प्रदान करने में सक्षम होंगे। उन्नत स्पैक्ट्रम सक्षमता के माध्यम से अधिकतम नेटवर्क क्षमता प्राप्त करने में सहायता होगी अर्थात उपलब्ध बैंडविड्‌थ में अब अधिकतम सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सकेगा।
  • उपभोक्ताओं के लिए 3-जी तकनीक का लाभ यह होगा कि वे अपने मोबाइल फोन का हाई स्पीड इंटरनेट (ब्रांडबैंड जैसी सेवा) और इन्टरएक्टिव गेमिंग का आनंद ले सकेंगे तथा फिल्में, वीडियों क्लिप और म्युजिक डाउनलोड कर सकेंगे। 3-जी तकनीक से उपभोक्ता वीडियों काफ्रेंसिंग, वॉयस व वीडियो डाटा ट्रांसफर (2-जी तकनीक के मुकाबले डाटा ट्रांसफर की गति आठ गुना अधिक होगी) और वाई-फाई की बदौलत कुछ भी लिखकर कहीं भी भेज सकेंगे। इंटरनेट के स्काइपी प्रोग्राम का उपयोग करके मोबाइल पर मुफ्त में बात भी की जा सकेगी जो एक वायरलेस इंटरनेट से युक्त लैपटॉप देता है।

4-जी तकनीक (3 - G Techniques)

4-जी तकनीक वायरलेस सेवा (मोबाइल सेवा) की चौथी पीढ़ी की तकनीक है, जिसमें आर्थोगोनल फ्रिक्वेंसी डिविजन मल्टीपल एक्सेस (OFDMA) की सहायता से नेटवर्क की सुविधा को और बेहतर बनाया जा सकेगा। 4-जी तरह से इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) आधारित सेवा होगी जिसमें वॉयस डाटा और मल्टीमीडिया को समान गति से भेजा और प्राप्त किया जा सकेगा। 4-जी की गति 100 एमबीपीएस होगी, जबकि 3-जी की गति मात्र 384 केबीपीएस से 2 एमबीपीएस तक है। 4-जी लोकल एरिया नेटवर्क (LAN) की अवधारणा पर कार्य करेगा, जबकि 3-जी तकनीक वाइड एरिया नेटवर्क (WAN) अवधारणा पर कार्य करती है। 4-जी तकनीक के प्रमुख लाभ निम्नांकित हैं:

  • उपभोक्ता को अत्याधुनिक उन्नत गुणवत्ता की ऑडियो और वीडियो सुविधा उपलब्ध होगी।
  • इंटनरेट स्पीड यूनिफार्म हो जाएगी।
  • डाटा ट्रांसफर अत्यधिक तीव्र गति से हो सकेगा।
  • 3-जी के तुलना में कीमत में कमी आएगी।
  • इंटनरेट प्रोटोकॉल आधारित सेवा होने के कारण वॉयस, डेटा और मल्टीमीडिया को एक समान गति से भेजना और प्राप्त करना संभव हो सकेगा।

मोबाइल सर्विलांस (Mobile Surveillance)

किसी भी व्यक्ति से संबंधित सूचनाएँ एकत्र करने के लिए इसके मोबाइल को ऑब्जरवेशन पर लगाने की प्रक्रिया को ‘मोबाइल सर्विलांस’ पर लगाना कहते हैं। दो प्रकार के मोबाइल सर्विलांस होती हैं:

  • कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जानकारी प्राप्त करने के लिए
  • बातचीत की रिकॉडिंग का ब्यौरा ‘लिसनिंग वॉच’ प्रक्रिया के तहत।
    • सर्विस प्रोवाइडर जब ‘काल डिटेल रिकॉर्ड’ (CDR) पुलिस को मुहैया कराती है तो इसमें उन नंबरों की सूची शामिल होती है जिस पर उस व्यक्ति ने बातचीत की होती है। साथ में कॉल ड्‌यूरेशन भी पता चलता है कि उस नंबर पर सर्विलांस में लगे नंबर से कितने देर तक बातचीत हुई है। सर्विलांस के जरिए व्यक्ति की लोकेशन की भी जानकारी हासिल होती है। फिर पुलिस उस नंबर को रखने वाले से पूछताछ कर उस व्यक्ति का पता ठिकाना लगाती है।
    • वहीं लिंसनिंग वॉच प्रक्रिया के तहत सर्विस प्रोवाइडर से बातचीत रिकॉर्ड करने की व्यवस्था करती है। इसके लिए पुलिस ‘व्यायस लॉगर’ उपकरण के जरिए बातचीत रिकॉर्ड करती है। फिर पुलिस बातचीत को आधार मानते हुए उस व्यक्ति के खिलाफ एविडेंस जुटाती है और मोबाइल टावर में शो किए जाने वाले लोकेशन से उस व्यक्ति तक पहुँचती है।

कम्प्यूटर (Computers)

किसी पूर्व लिखित मार्गदर्शनों को समुचित ढंग से क्रियान्वित करने के लिए किसी विशिष्ट निर्देश के तहत कार्य करने वाली युक्ति को कम्यूटर कहते हैं। 19वीं शताब्दी में चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage) ने सूचनाओं के प्रसंस्करण के उद्देश्य से एक यंत्र का निर्माण किया था। बैबेज दव्ारा निर्मित यंत्र में मुख्यत: तीन भाग थे, यथा संग्राहक (Store) , चकरी (Mill) तथा नियंत्रक (Controller) हांलाकि यह यंत्र अत्यंत साधारण था लेकिन इसने कालांतरपेज में कम्प्यूटरों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

The Computers
  • इन्हीं आधारों पर 1940 के दशक में प्रथम पीढ़ी के कम्प्यूटरों का निर्माण किया गया था। ऐसा पहला कम्प्यूटर वर्ष 1944 में मार्क-1 के नाम से हारवर्ड विश्वविद्यालय में विकसित किया गया। लेकिन पहले इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर का विकास 1946 में हुआ था जिसे इलेक्ट्रॉनिक न्यूमेरिकल इन्टीग्रेटर एंड कैलकुलेटर (Electronic Numerical Integrator and Calculator, ENIAC) कहा गया था। वलय-गणक (Ring Counter) पर आधारित गणना के सिद्धांत पर कार्य करने वाला यह पहला कम्प्यूटर था। इसमें दो अंकों को जोड़ने के लिए 200 माइक्रोसेकंड तथा गुणा करने के लिए 2800 माइक्रोसेकंड का समय लगता था। इसके बाद 1949 में प्रोगाम को संग्रहित करने के सिद्धांत पर आधारित पहले कम्प्यूटर का विकास किया गया, जिसे इलेक्ट्रॉनिक डिले स्टोरेज ऑटोमेटिक कैलकुलेटर (Electronic Delay Storage Automatic Calculator, EDSAC) की संज्ञा दी गई। यह पारे की विलंबित रेखाओं के माध्यम से संग्रहण का कार्य करने में सक्षम था। वस्तुत: कम्प्यूटर के निर्माण की प्रेरणा वैन न्यूमैन (Van Newman) के सिद्धांत से प्राप्त हुई थी। इस कम्प्यूटर ने सूचनाओं और निर्देशों को एक ही स्मृति खंड में मिश्रित करने की पद्धति अपनाई थी। हांलाकि यह कम्प्यूटर कई वर्षों तक प्रचलित रहा लेकिन 1951 में पहले व्यावसायिक कम्प्यूटर का विकास किया गया जिसे यूनिवर्सल ऑटोमेटिक कम्प्यूटर (Universal Automatic Computer, UNIVAC) का नाम दिया गया। तकनीक दृष्टिकोण से यह एक निर्वात-नलिका कम्प्यूटर (Vacuum Tube Computer) था जिसमें चुंबकीय टेप की सहायता प्रदान की जाती थीं। कोर स्मृति की तुलना में इस प्रकार के कम्प्यूटरों के प्रसंस्करण की दर दस गुणा अधिक थी।
  • 1960 के दशक में समेकित परिपथ प्रणाली (Integrated Circuit System) का विकास संभव हुआ जिसे ट्रांजिस्टर, डायोड तथा प्रतिरोधक (Resistors) का उपयोग किया जाने लगा। वर्ष 1965 में तृतीय पीढ़ी के कम्प्यूटरों का भी विकास करने में सफलता प्राप्त हुई। इस अवधि में जर्मेनियम से निर्मित ट्रांजिस्टरों को सिलिकन के ट्रांजिस्टरों से प्रतिस्थापित कर दिया गया। इसके बाद, माइक्रोप्रोसेसर तकनीक के विकास ने विशिष्ट समेकित परिपथ प्रणालियों के विकास को भी सुगम बनाया। इस प्रकार की प्रणालियों को अति व्यापक समेकित परिपथ की संज्ञा दी गई। इस प्रकार के परिपथ में एक चिप के अंतर्गत लगभग 50,000 ट्रांजिस्टरों का प्रयोग करने में सफलता मिली। चुंबकीय स्मृति खंडों को अर्द्धचालक स्मृतियों से प्रतिस्थापित करने की तकनीक भी विकसित हुई। वर्ष 1986 से 2000 के बीच उच्च गति वाले माइक्रोप्रोसेसर तथा वृहत स्मृति क्षमता वाले कम्प्यूटरों का विकास किया गया। विशेष रूप से 1990 के दशक में पेन्टियम, सेलेरॉन तथा इटेनियम जैसे प्रोसेसरों ने कम्प्यूटर तकनीक में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिये। यद्यपि कालांतर में कम्प्यूटर तकनीक में व्यापक परिवर्तन हुए हैं लेकिन वैन न्यूमैन की संकल्पना वर्तमान में भी कमोबेश प्रासंगिक बनी हुई है। एक सामान्य कम्प्यूटर में एक आदान (Input) एक केन्द्रीय प्रसंस्करण इकाई (Central Processing Unit, CPU) तथा एक निर्गमक इकाई (Output) होता है। प्रसंस्करण इकाई में एक अंकगणितीय तथा एक तार्किक इकाई होती है। इसके माध्यम से सूचनाओं का प्रसंस्करण किया जाता है।

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