Science and Technology: Main Applications and Role of INSAT System

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इनसैट प्रणाली (The INSAT System)

  • यह एक बहुआयामी उपग्रह प्रणाली है, जिसका विकास देश के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को प्रगतिशील बनाने के लिए कया गया है। इस प्रणाली का उपयोग दूरसंचार, दूरदर्शन, राहत एवं बचाव मौसम संबंधी जानकारी प्राप्त करने तथा रेडियो नेटवर्किंग के लिये किया जा रहा है। अब तक तीन पीढ़ी के इनसैट उपग्रहों को प्रक्षेपित किया जा चुका है जबकि चौथी पीढ़ी के उपग्रहों को वर्ष 200 तक प्रक्षेपित किये जाने की संभावना है।
  • इनसैट प्रणाली को 30 अगस्त, 1983 को इनसैट -1 बी. के सफल प्रक्षेपण के साथ राष्ट्र को समर्पित किया गया था। हांलाकि यह कार्य 10 अप्रैल, 1982 को ही होना था लेकिन इनसैट-1 ए की असफलता के कारण यह लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सका।
  • इनसैट उपग्रहों में प्रयुक्त वेरी हाई रिज़ोल्यूशन रेडियोमीटर (Very High Resolution Radiometer, VHRR) की सहायता से दूरसंचार, दूरदर्शन तथा रेडियो नेटवर्क के अतिरिक्त मोबाइल नेटवर्क का भी विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण किया जाता है। राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इनसैट प्रणाली को प्रभावी बनाने में कई एजेंसियों जैसे दूरसंचार विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तथा भारतीय मौसम विभाग की भूमिका अत्यंत कारगर सिद्ध हुई है। इस दिशा में भारत की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि 3 अप्रैल 1999 को फ्रेंच गुआना के कौरू प्रक्षेपण केन्द्र से इनसैट-2 ई का सफल प्रक्षेपण किया गया था। वर्ष 1999 तक यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन दव्ारा विकसित सर्वाधिक उत्कृष्ट उपग्रह था। इसमें 17 सी -बैड तथा विस्तरित सी-बैड ट्रांसपौंड, इनसैट -2 ए तथा इनसैट -2 बी की भांति वी. एच. आर. आर. के अतिरिक्त जलवाष्प चैनल (Water-Vapour Channel) तथा एक चार्ज्ड कपल डिवाइस (Charge Couple Device) कैमरे का भी प्रयोग किया गया था। इस कैमरे के माध्यम से एक किलोमीटर की दूरी तक दृश्य, निकटस्थ अवरक्त तथा लघु तरंगदैर्ध्य वाली अवरक्त विकिरणों को प्रयोग कर चित्रण किया जा सकता है।
  • इसी क्रम में भारत ने 22 मार्च, 2000 को इनसैट-3 बी का सफल प्रक्षेपण किया था जिसने भारत को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र मेें विश्व अग्रणी देशों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। इस उपग्रह ने न केवल इनसैट प्रणाली की गुणवत्ता बल्कि संपूर्ण संचार नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण में अंति विशिष्ट योगदान भी दिया।

इनसैट प्रणाली के प्रमुख अनुप्रयोग (Main Applications of INSAT System)

  • स्वर्णजयंती विद्या विकास अंतरिक्ष उपग्रह योजना (विद्या वाहिनी) :- इस कार्यक्रम का आरंभ उड़ीसा में मई 2000 में किया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य कालाहांडी-बोलंगीर-कोरापेट क्षेत्र के 800 गांवों में विकासोन्मुखी संचार की सुविधा उपलब्ध कराना था।
  • दूरस्थ शिक्षा:- इनसैट-3 बी के विशिष्ट ट्रांसपौंडर की सहायता से आंध्र प्रदेश में दूरस्थ शिक्षा का कार्यक्रम क्रियान्वित किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त उपग्रह के माध्यम से कृषि, दूरस्थ चिकित्सा, इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन जैसे क्षेत्रों में भी विशेष कार्यक्रम क्रियान्वित किये जा रहे हैं।
  • झाबुआ विकास संचार परियोजना (Jhabua Development Communication Project, JDCP) : -मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के सभी पंचायतों के लगभग 200 गांवों जो धार तथा बरवानी जिलों के समीपवर्ती हैं, में 1 नवंबर, 1996 को इस कार्यक्रम का आंरभ किया गया था।

इसके तहत 1995 में आरंभ किये गये प्रशिक्षण तथा विकास संचार चैनल (Training and Development Communication Channel) का प्रयोग किया जाता है। इस चैनल के माध्यम से एकल-मार्गी वीडियो तथा दव्मार्गी ऑडियो अंतरापृष्ठ नेटवर्क उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए इनसैट-3 बी समन्वय का कार्य करता है।

स्चाांर में इनसैट की भूमिका (Role of INSAT in Communication)

  • भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत उपग्रह सचार प्रणाली के दो आधार स्तंभ हैं-इनसैट तथा दूर सवेंदी उपग्रह। विगत वर्षों में भारत ने इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभाओं और क्षमताओं का प्रदर्शन भी किया है। लेकिन अब तक भारत को भू-स्थैतिक कक्षा में उपग्रहों को स्थापित करने में स्वावलंबन प्राप्त नहीं हो पाया हैं। इस कारण ऐसे प्रक्षेपणों के लिए भारत को विदेशी प्रमोचक यानों पर निर्भर होना पड़ता है। जहाँं तक उपग्रहों का प्रश्न है, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को संचार तथा दूर संवेदी, दोनों ही प्रकार के उपग्रहों का स्वदेशी तकनीक से विकास करने में सफलता मिली है।
  • जैसा कि ऊपर कहा गया है, निकट भविष्य में भारत दव्ारा इनसैट -3 डी तथा इनसैट-3 ई उपग्रहों का प्रक्षेपण किया जाएगा। यह संभावना व्यक्त की गई है कि इन प्रक्षेपणों के उपरांत दूरदर्शन प्रसारण में उपग्रहों की भूमिका का व्यापक विस्तार होगा तथा दूर संचार के क्षेत्र मे संवृद्धि की दर भी बढ़ाई जा सकेगी।
  • इसरो ने यह आशा की थी कि वर्ष 2001 तक इनसैट उपग्रहों में लगभग 160 ट्रांसपौंडर कार्य करेंगे। लेकिन उपरोक्त दोनों उपग्रहों के प्रक्षेपण के उपरांत ट्रांसपौंडरों की संख्या बढ़कर 122 होगी। वास्तव में सुदृढ़ संचार की तेजी से बढ़ती हुई मांग के कारण भारत को कुल 300 सी-बैंड ट्रांसपौंडरों की आवश्यकता हैं। लेकिन वर्ष 2007 तक इस संख्या के 250 तक ही पहुंचने की आशा है। वर्तमान में कुल 15 विदेशी उपग्रहों की सेवाएँ ली जा रही हैं।
  • भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उपग्रहों में प्रयुक्त विस्तरित सी-बैंड ट्रांसपौंडर सही रूप में कार्य करते रहें। दुर्भाग्यवश अब तक इनसैट उपगग्रहों में प्रयुक्त ऐसे ट्रांसपौंडरों से अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं किये जा सके हैं। तकनीकी रूप से विस्तरित-सी बैंड ट्रांसपौंडर रेडियो आवृत्ति में कार्य करते हैं। सरकार ने इस सेवा के व्यापक विस्तार और संचार नेटवर्क को सुदृढ़ बनाने के लिए जनवरी 2000 में एक उपग्रह संचार नीति की घोषणा की थी। इस नीति के प्रभावी हो जाने से यह आशा की गई है कि वर्ष 2007 तक 300 ट्रांसपौंडरों की आवश्यकता के संदर्भ में निजी इकाइयों की भूमिका का विस्तार होगा। इसके लिए कई अन्य प्रयास भी किये गये हैं। इन प्रयासों में कम तथा लंबी दूरी के लिए दूर संचार सुविधाओं का उपयोग करने की छूट विदेश संचार निगम लिमिटेड के अतिरिक्त कई अन्य एजेंसियों को भी प्रदान करना शामिल है। साथ ही प्रकाश तंतुओं के नेटवर्क के विस्तार पर अत्यधिक बल दिया गया हैं, जो आने वाले वर्षों में निश्चित रूप से संचार नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण में सहायक होगा।

इनसैट प्रणाली के प्रभाव (Impact of INSAT System)

राष्ट्र को समर्पित किये जाने के साथ इनसैट प्रणाली भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। विकासोन्मुखी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए यह दूरस्थ अवस्थित क्षेत्रों में भी संचार को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती है।

निश्चित रूप से यह कार्य कम कीमत वाले टर्मिनलों (Low Cost Terminals, LCTs) से संभव हो सका है। साथ ही 450 पृष्ठीय केन्द्र (Earth Stations) भी कार्यरत हैंं इनके अतिरिक्त, लगभग 12,000 वी-सैट भी स्थापित किये गये हैं। इनसैट प्रणाली के प्रभाव में से कुछ प्रमुख का उल्लेख नीचे किया गया है:

  • व्यापारिक प्रष्तिष्ठानों की संचार संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति।
  • जनसंख्या के लगभग 85 प्रतिशत भाग तक दूरदर्शन नेटवर्क की उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास।
  • प्रशिक्षण और विकासोन्मुखी शिक्षा का विस्तार।
  • औद्योगिकी कर्मचारियों, समाज कल्याण के क्षेत्र में कार्यरत लोगों तथा पंचायती राज संस्थाओं के कर्मचारियों को कार्यस्थल पर ही प्रशिक्षण देने की सुविधा की उपलब्धता।
  • आम नागरिकों के साथ-साथ जनजातियों में स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, परिवार नियोजन तथा अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता का विकास।
  • मौसमी घटनाक्रमों के सटीक पूर्वानुमान में सहायता।
  • आपदा प्रबंधन के लिए एक पूर्व सूचना प्रणाली के विकास में सहायता। तूफान -संभावित क्षेत्रों तथा भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तट पर अब तक लगभग 250 आपदा सूचना संग्रहकों की स्थापना की गई हैं।

वी -सैट (VSAT)

इनसैट प्रणाली को भू-स्थित वी-सैट के माध्यम से कार्यशील बनाया जाता है। तकनीकी रूप से वी-सैट पृष्ठीय समस्याओं से सुरक्षित होता है। विगत वर्षों में वी-सैट का उपयोग सूचनाओं के संप्रेषण से कहीं अधिक होने लगता है। हांलाकि भारत ने संचार के क्षेत्र में ई उत्कृष्ट कार्य किये हैं, लेकिन अब भी इस दिशा मेंं ठोस प्रयास करने की नितांत आवश्यकता है। इनसैट-3 बी में प्रयुक्त के. यू. बैंड ट्रांसपौंडरों के कारण वी-सैट सेवाओं के विस्तार तथा बैंडविथ के विस्तृत होने की पूरी संभावना है। वी-सैट के माध्यम से इंटरनेट सेवाओं का भी विस्तार करने की योजना है। वर्तमान में वी-सैट का प्रयोग इंट्रानेट में किया जाता है, जिससे अंतत: इंटरनेट की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। वी-सैट उद्योग के समक्ष विद्यमान समस्याओं में सरकार के निर्देशानुसार बड़े एन्टिना का प्रयोग जिससे कीमत वृद्धि होती है, विदेशी उपग्रहों के प्रयोग पर रोक तथा इंटरनेट सेवाओं के विस्तार पर रोक प्रमुख हैं।

वी-सैट के आद्येगिक उपयोग (Industrial Use of VSATs)

  • जैसा कि हम जानते हैं, वी-सैट सूचना संप्रेषण के लिए अत्यंत उपयोगी है अत: स्टॉक एक्सचेंजों में इनका प्रयोग व्यापक स्तर पर किया जाता हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के पास देश का वृहततम वी-सैट नेटवर्क है।
  • अंतर्क्रियात्मक स्कूली शिक्षा में वी-सैट का प्रयोग अत्यंत उपयोगी हैं।
  • तेल अन्वेषण में वी-सैट तथा माइक्रोवेव संचार का एकीकृत उपयोग।
  • खुदरा बैंकिंग में विशेषकर ए. टी. एम. सेवाओं के विस्तार में।

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