Science and Technology: INSAT-Indian National Satellite System

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अंतरिक्ष (Space)

भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT -Indian National Satellite System)

  • भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली एक बहुउद्देशीय उपग्रह प्रणाली है जिसका उपयोग घरेलू दूरसंचार ग्रामीण क्षेत्रों में उपग्रह के माध्यम से सामुदायिक दूरदर्शन के राष्ट्रव्यापी प्रसारण को बेहतर बनाने, भू-स्थित ट्रांसमीटरों के माध्यम से पुन: प्रसारण के लिए आकाशवाणी तथा दूरदर्शन कार्यक्रमों को देशभर में प्रसारित करने, मौसम संबंधी जानकारी, वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भू-सर्वेक्षण तथा आँकड़ों के संप्रेषण में होता है।
  • इनसेट प्रणाली अंतरिक्ष विभाग, दूरसंचार विभाग, भारतीय मौसम विभाग, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन का संयुक्त प्रयास है। इनसेट अंतरिक्ष कार्यक्रमों की व्यवस्था, निगरानी व संचालन का पूर्ण दायित्व अंतरिक्ष विभाग को सौंपा गया है। इनसेट प्रणाली की पहली पीढ़ी के चारों उपग्रह अमरीकी कंपनी ‘फोर्ड एरोस्पेस’ दव्ारा बनवाए गए परन्तु इसके बाद दव्तीय एवं तृतीय पीढ़ी के सभी उपग्रह स्वदेश में ही निर्मित किये गये।
  • इनसेट-1 श्रृंखला अथवा पहली पीढ़ी के उपग्रह 1982 - 90 के दौरान विकसित किये गये। इस श्रृंखला में चार उपग्रह थे-इनसेट 1 (A) , 1 (B) , 1 (C) , 1 (D) । इस श्रृंखला के चारों उपग्रहों में से वर्तमान समय में केवल एक उपग्रह इनसेट -1 (D) कार्यरत इस श्रृंखला के इनसेट में 1 (B) पहली चार मौसम संबंधी आँकड़ों के लिए VHRR (Very High Resolution Radiometer) का प्रयोग किया गया था।
  • उपग्रहों के विकास की दूसरी पीढ़ी इनसेट-2 श्रृंखला कहलाती है। इस श्रृंखला के उपग्रह न केवल भारतीय वैज्ञानिकों दव्ारा परिकल्पित थे बल्कि उनके डिजाइन भी इसरो के वैज्ञानिकों दव्ारा ही तैयार किये गये। इस श्रृंखला के अंतर्गत 5 उपग्रह छोड़े गये 2ए, 2बी, 2सी, 2डी एवं 2ई। इस श्रृंखला का प्रयोग 1990 से कुछ पहले आरंभ हुआ तथा सन्‌ 2000 तक चलता रहा। इस श्रृंखला में सी एवं एस बैंड के ट्रांसपोन्डर्स का प्रयोग तो हुआ ही, 2सी में पहली बार केयू बैंड के ट्रांसपोंडर भी प्रयुक्त हुए। मौसम संबंधी सूचनाओं, मेट्रो टीबी, वीडियो और टेलीफोन आदि सुविधाओं का विकास इसी श्रृंखला केे अंतर्गत किया गया। अभी इस श्रृंखला के दो उपग्रह 2बी एवं 2एफ काम कर रहे हैं।
  • संचार उपग्रहों के विकास की तीसरी पीढ़ी को इनसेट-2 श्रृंखला कहते हैं, जिसका प्रथम उपग्रह इनसेट-3बी मार्च, 2000 में प्रक्षेपित किया गया था। 2डी के अचानक खराब हो जाने के कारण भारत को अरबसेट के ट्रांसपोंडर किराए पर लेने पड़े थे। इस समस्या के उपाय के रूप में इनसेंट-3ए से पहले 3बी को प्रक्षेपित किया गया, क्योंकि वह उन सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में ज्यादा सक्षम था। इसमें लगे सी बैंड के ट्रांसपोंडर न केवल पहले की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली हैं, बल्कि यह पहली बार क्षैतिज दिशा में काम करने के साथ लंबवत भी काम कर सकेंगे। टेली मेडिसिन और टेली एजुकेशन जैसे क्षेत्रों में इस उपग्रह के विशेष उपयोग होंगे। इसी के आधार पर ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की शिक्षा देने के लिए विद्यावाहिनी चैनल की स्थापना की गई है।

उपरोक्त संचार उपग्रहों के उपयोग को दो क्षेत्रों में वर्गीकृत करके देखा जा सकता है।

  • संचार क्षेत्र में उपयोग
  • गैर संचार उपयोग

संचार क्षेत्र में उपयोग (Uses in Communication)

  • इन उपग्रहों से दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क की स्थापना हुई, जिससे पूरा देश एकता के सूत्र में बंधा साथ ही केयू बैंड के ट्रांसपोंडरों के माध्यम से DTH सुविधा भी आरंभ की जा चुकी है।
  • रेडियो क्षेत्र में एफ. एम. (FM) सेवा का विकास इसी का परिणाम है। एफ. एम की मूल विशेषता यह है कि इस पर वायुमंडलीय व्यवधानों का कोई असर नहीं होता।
  • आपातकालीन स्थितियां में जहाँ केबल के माध्यम से संचार स्थापित करना संभव नहीं होता, वहाँ इनका उपयोग किया जा सकता है। गुजरात में आये भूकंप के बाद सबसे पहले सैटेलाइट के माध्यम से ही संचार स्थापित हो सका था।
  • दूरस्थ क्षेत्रों में जहा टेलीफोन केबल नहीं बिछायी जा सकती है, उपग्रह के प्रयोग से डब्ल्यू. एल. एल. (WLL -Wireless in Local Loop) जैसी सेवाएँ आरंभ की जा सकती हैं तथा सामान्य व सरल संचार आरंभ हो सकता है।
  • व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में भी संचार सुविधाओं का प्रयोग किया जा रहा है। जिन बड़े संगठनों के मुख्य कार्यक्रमों तथा शाखाओं के बीच तीव्र और सरल संचार की आवश्यकता होती है, उनके लिए (Remote Area Business Message Network) पद्धति आरंभ की गयी है।
  • यदि कोई वायुयान या जलयान किसी विपदा में फँस जाए तो इन उपग्रहों के माध्यम से उनसे संचार स्थापित किया जा सकता है। इसके लिए उपग्रहों पर विशेष सर्च एंड रेस्क्यू ट्रांसपोंडर लगाये जाते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर विश्व भर में काम करते हैं। ये ट्रांसपोंडर 2 ए तथा 2बी उपग्रहों में लगाए गए हैं।
  • समुद्र के भीतर विभिन्न जहाजों, तेल उत्पादन केन्द्रों आदि के बीच भी ये उपग्रह संचार सेवा उपलब्ध कराते है। ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का नाम ‘इन्मारसेट’ (INMARSET) है।
  • शिक्षा और सामुदायिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी संचार उपग्रहों का प्रयोग किया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में इस ‘दूरस्थ शिक्षा’ (Tele-Education) कहते हैं तथा चिकित्सा के क्षेत्र में इसका प्रयोग ‘टेलीमेडिसिन’ के रूप में होता है।
  • सरकारी क्षेत्र में निकनेट (NICNET -National Informatics Centre Network) जैसे नेटवर्क इन उपग्रहाेें के प्रयोग से देश के प्रत्येक जिले को केन्द्र सरकार के साथ हमेशा संचार की स्थिति में बनाए रखते हैं।

गैर-संचार क्षेत्र में उपयोग (Uses in Non-Communication)

  • मौसम विज्ञान का अध्ययन- इन उपग्रहों पर एक विशेष यंत्र लगा होता है, जिसे वी. एच. आर. आर. (VHRR) कहते हैं। इसकी मदद से ये उपग्रह मौसमी दशाओं का अंकन करके बेस स्टेशन को प्रेषित करते हैं। इससे बादलों के आच्छीदन तथा प्रदूषण की मात्रा आदि के तथ्य उपलब्ध हो जाते हैं।
  • प्राकृतिक विपदा की चेतावनी-ये उपग्रह कई प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व सूचना देने में सक्षम होते हैं। भारत के पूर्वी तट पर बाढ़ एवं चक्रवात जैसी स्थितियां अक्सर बनती रहती है। ये उपग्रह अन्य स्थानों से तुलना करके इन विपदाओं का पूर्वानुमान लगाते हैंं।
  • निर्देशों तथा शत्रु देशों में जासूसी कार्य के लिए भी इनका प्रयोग किया जा सकता है। शत्रु देशों के सैन्य ठिकानों तथा स्थापित मिसाइलों के चित्र इनके माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • इन उपग्रहों के माध्यम से विदेशी मुद्रा का अर्जन भी किया जा सकता है। वर्तमान समय में भारत ने अंतरिक्ष आयोग का गठन किया है (एंटिक्स आयोग) , जो ट्रांसपोंडर्स तथा उनसे प्राप्त सूचनाओं का विपणन और विक्रय करता है।

भारतीय दूर-संवेदी उपग्रह प्रणाली (Indian Remote Sensing Satellite System)

  • सुदूर संवेदन का अर्थ है-लक्षित वस्तु के प्राथमिक संपर्क में आये बिना उसके संबंध में संवेदन के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना। सुदूर संवेदी उपग्रह विभिन्न क्षेत्रों से तरंगों का आदान-प्रदान करते हैं तथा उनके प्रत्यावर्तन कमान (Reflected Indexes) के आधार पर यह संभावना व्यक्त करते हैं कि पृथ्वी के भीतर या समुद्र के भीतर कौन से तत्व होने की संभावना है? इसके लिए प्राय: अवरक्त किरणों (Infra Red Rays) का प्रयोग किया जाता है, जो अपनी उच्च भेदन क्षमता के कारण सतह के काफी भीतर तक पहुँचकर वास्तविक तथ्यों का बोध कराती हैं।
  • भारत में सुदूर संवेदी उपग्रहों के विकास की तीन-पीढ़ियाँ मानी जाती हैं। भास्कर-1 तथा भास्कर-2 जैसे प्रायोगिक दूर संवेदी उपग्रहों के बाद 1988 में IRS-1A के साथ ही यह विकास यात्रा आरंभ हुई। पहली पीढ़ी में IRS-1A के अतिरिक्त IRS-1B को 1991 में छोड़ा गया। इस पीढ़ी के उपग्रहों में LISS (Liner Imaging Self Scanning Sensor) नामक कैमरे का प्रयोग किया गया।
  • दूर संवेदी उपग्रहों की दूसरी पीढ़ी में IRS-1C, 1D, 1 E थे। यह श्रृंखला 1993 - 1995 तक चली। इसमें IRS-1D को पहली बार स्वदेशी ध्रुवीय प्रक्षेपण यान (PSLV) से छोड़ा गया। इस श्रृंखला के उपग्रहों में विशेष पैनक्रोमेटिक कैमरों का प्रयोग किया गया। इनकी क्षमता पहली पीढ़ी की तुलना में काफी अधिक थी।
  • दूर संवेदी उपग्रहों की तीसरी पीढ़ी 1996 से प्रारंभ होकर वर्तमान समय तक की है, जिसमें IRS-P1 से पी6 तक उपग्रह प्रक्षेपित किये गये।

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