Science & Technology: India՚S E-Waste Increase Drastically

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अद्यतन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (Latest Development in Science & Technology)

ई-कचरा (E-Waste)

भारत के ई-कचरें में अत्यधिक वृद्धि (India՚S E-Waste Increase Drastically)

  • स्याुंक्त राष्ट्र र्प्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने फरवरी, 2010 में बाली में ई-कचरे (e-waste) के संदर्भ में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि वर्ष 2020 तक चीन और दक्षिण अफ्रीका में कम्प्यूटर से संबंधित ई-कचरा वर्ष 2007 के स्तर से 400 प्रतिशत अधिक होगा। वहीं भारत के संदर्भ में यह वृद्धि 500 प्रतिशत अधिक होगी। बेकार हो चुके मोबाइल फोन से ऐसे ई-कचरे की मात्रा में वर्ष 2007 की तुलना में 18 गुना की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।
  • ई-कचरे में डेस्कटाप कम्प्यूटर, जिसके विभिन्न आंतरिक भाग प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, हार्ड डिस्क ड्राईव, चिपसेट्‌स आदि शामिल है। पुर्नचक्रण: ई-कचरा से संसाधन निर्माण शीर्षक रिपोर्ट में 11 प्रतिनिधि विकासशील देशों से संकलित आंकड़ों का प्रयोग किया गया है। जिसके आधार पर वर्तमान एवं भविष्य में उत्पन्न होने वाले ई-कचरे का आकलन किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत यह रिपोर्ट स्विस फेडरल लेबोट्रीज फार मेटेरियल टेस्टिंग एंड रिसर्च यूमीकोर तथा यूनाइटेड नेशंस यूनीवर्सिटीज दव्ारा बनाई गई है। जहाँ टी. वी. एवं रेफ्रीजीरेटर की बिक्री में क्रमश: 2 तथा 3 कारकों के आधार पर रेखीय संवृद्धि संभावित है वहीं संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में इन पदार्थो के भार एवं संगठन में परिवर्तन होगा जब डेस्कटाप से लैपटाप, सी. आर. टी. (कैथोड़ रे ट्‌यूॅब से एल. सी. डी. (लिक्विड़ क्र्रिस्टल डिस्प्ले) में परिवर्तित होगा और ये परिवर्तन पुनर्चक्रण एवं दव्तीयक बाजार पर दबाव डालेगा। रिपोर्ट के अनुसार ई-कचरे से संबंधित विधियों की कमी होने के कारण तथा कानून के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार होने के परिणामस्वरूप भारत में ई-कचरा तकनीक के हस्तांतरण में बाधाएं आ रही हैं।
  • यह पाया गया है कि भारत ने 99 प्रतिशत कचरे को प्रभावी ढंग से पुनर्चक्रित किया जा सकता है एवं इसमें से 1 प्रतिशत से भी कम जहरीले तत्वों के निकलने की संभावना होती है जिन्हें भूमि के अंदर निस्तारित किया जा सकता है। यद्यपि किसी ई-कचरा नीति के अभाव में न तो उपभोक्ता एवं न ही उत्पादक किसी नियमन अथवा उत्तरदायित्व से बंधे हैं हालांकि एक ई-कचरा नीति बनाई जा रही है। लेकिन प्रभावी होने से कम से कम एक वर्ष लगेगा।

ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन) नियम, 2011 (E-Waste (Management and Operating Rules, 2011) )

  • देश में ई-कचरा के समुचित प्रबंधन एवं निपटान हेतु हाल ही में केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर “ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन) नियम, 2011” (E-Waste (Management and Handing) Rules, 2011 की घोषणा की है। ये नियम 1 मई, 2012 से प्रभावी हो गए हैं।
  • इस नियमों के अंतर्गत भारत में ई-कचरा की समस्या के स्थायी समाधान के लिए यूरोपीय देशों में प्रचलित व्यवस्था ‘विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व’ (Extended Producer Responsibility) की तर्ज पर पुनर्चक्रण (Recycling) एवं निपटान (Disposal) प्रक्रिया विकसित करने का प्रावधान किया गया है।
  • विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व व्यवस्था के तहत इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के विनिर्माण में संलग्न संगठनों को ही इन उत्पादों के अनुपयोगी होने के पश्चात्‌ उनके निपटान या पुनर्चक्रण के लिए जवाबदेह बनाया जाता है।
  • उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड दव्ारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2005 में देश में लगभग 1,46, 800 टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था जिसके वर्ष 2012 तक बढ़ाकर आठ लाख टन हो जाने की संभावना है।
  • खराब एवं अनुपयोगी हो जाने पर इलेक्ट्रॉनिक सामानों का सुरक्षित एवं क्रमबद्ध निर्मूलन अथवा पुनर्चक्रण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ई-कचरे में कुछ जहरीले अपशिष्ट पदार्थों के अलावा कैडमियम, सीसा, पारा, आर्सेनिक और कई अन्य प्रकार के खतरनाक रसायन पाए जाते हैं जो पर्यावरण एवं स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत हानिकारक हैं।

ई-कचरे से उत्पन्न होने के खतरे (Dangers Arising from E-Waste)

  • पुराने बेकार हो चुके कम्प्यूटरों के धात्विक भाग पर्यावरण के लिए हानिकारक होते है क्योंकि ये विषैले रसायनों से युक्त होते हैं।
  • टेलीविजन एवं कम्प्यूटर मोनीटर के पुराने माडलों में, जो कि बहुत अधिक मात्रा में हैं, लगभग 5 पाउंड तक विषैला धात्विक सीसा होता है।
  • सीसा (लेड) कम्प्यूटर मोनीटर एवं टेलीविजन मोनीटर के कैथोड़ ट्‌यूब में भी पाया जाता है। यह धातु केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को नष्ट कर सकती है।
  • फ्लैंट पैनल डिस्प्ले स्क्रीन में खतरनाक मरकरी धातु प्रयोग की जाती है जो एक न्यूरोटोक्सिक है। खतरनाक धातु पीने के पानी के साथ मनुष्य के शरीर में पहुंच जाती है। धात्विक मरकरी की अधिक मात्रा से तंत्रिका तंत्र एवं विकसित हो रहे भ्रूण नष्ट हो जाते है। यदि एक बार मरकरी वातावरण में मुक्त हो जाए तो इससे छुटकारा पाना अत्यंत कठिन है।
  • परिपथ बोर्ड एवं बैटरियों में कैडमियम पाया जाता है जिसे कारसिनोजेन के नाम से जाना जाता है यह प्रत्यक्ष तौर से विभिन्न प्रकार के कैंसर उत्पन्न करता है।
  • पालीविनायल क्लोराइड, (पी. वी. सी.) जो एक संश्लेषित पोलीमर है, वैद्युत उपकरणों के तारों एवं केबल में विद्युत रोधी के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। जब इसका निस्तारण किया जाता है तो यह क्लोरीनेटेड डाईआक्सिन और फ्यूरेंस के उत्सर्जन को बढ़ा देता है।
  • पुराने बेकार हो चुके डेस्कटाप पीसी के मोनीटरों में कैंडमियनम एवं मरकरी पाया जाता है। जब ये भूगर्भीय जल में छनकर पहुंच जाते हैं तो उसे दूषित कर देते हैं।
  • अनुसंधानकर्ताओं ने यह पाया है कि ई-कचरे का अनुचित ढंग से निस्तारण के परिणामस्वरूप आने वाले 10 - 20 वर्षों में भूगर्भीय जल की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
  • एक अनुमान के अनुसार अनुचित तरीके से निस्तारित ई-कचरे से आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल की आपूर्ति बाधित होगी।
  • रिचार्जबल निकेल-कैडमियम बैटरियां, जो लैपटॉप कम्प्यूटर में प्रयुक्त होती हैं ई-कचरा के एक प्रमुख के रूप में होती है।

इंटरनेट टेलीफोनी (Internet Telephony)

इंटरनेट वर्किग प्रणाली से जुड़ी ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत टेलीफोन सेवा इंटरनेट प्रणाली का उपयोग करते हुए उपलब्ध होती है, इसे इंटरनेट फोन के नाम से जाना जाता है। सामान्य टेलीफोन नेटवर्क स्वीचिंग सिस्टम के आधार पर कार्य करता है तथा यह स्वीचिंग प्रोग्राम से नियंत्रित होता है। इंटरनेट टेलीफोन में स्वीचिंग प्रोग्राम की प्रणाली को इंटरनेट के साथ जोड़ दिया जाता है। इससे टेलीफोनिक सिस्टम भी कम्प्यूटर इंटरनेट से जुड़ जाता है। इस व्यवस्था के माध्यम से कोई कस्टमर अब फोन भी कर सकता है।

भारत में भी टेलीफोन सेवा का उपयोग करने वाले ग्राहक अपने इंटरनेट युक्त व्यक्तिगत कम्प्यूटर से किसी बेसिक टेलीफोन या मोबाइल पर तथा पुन: टेलीफोन से कम्प्यूटर पर कॉल करने की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं, यदि इसके संबंध में ट्राई (TRAI) दव्ारा निर्धारित प्रक्रिया व नियम को सरकार अनुमति प्रदान कर देती है। ट्राई ने अनुशंसा की है कि इंटरनेट से की जाने वाली काल को टेलीफोन पर प्राप्त करने की अनुमति दी जाए। इससे टेलीफोन मार्केट में प्रतिस्पर्धा में जबरदस्त वृद्धि होगी। पिछले वर्ष टेलीफोन विभाग ने प्रथम बार VOIP उत्पादों जैसे याहू, जीटाक, नेट टू फोन आदि को निम्नांकित कारणों से प्रतिबंधित करने की कोशिश किया था:

  • सुरक्षा कारण VOIP के दव्ारा कॉल करने पर कॉलर्स का स्रोत पता करना मुश्किल होता था।
  • राजस्व की व्यापक हानि।

नियमानुसार अब प्रत्येक लाइसेंस प्राप्त सर्विस प्रोवाइडर को 12.5 प्रतिशत सेवा कर तथा 6 प्रतिशत राजस्व का भाग सरकार को देना होगा। यह 19 प्रतिशत कर सभी अवैध इंटरनेट सेवा प्रदाताओं दव्ारा चोरी कर लिया था और इसी कारण प्रदाता टूल्स के प्रति सतर्क हैं जैसे याहू, स्काइप आदि। वर्ष 2007 के आंकड़ों के अनुसार इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने 30 मिलियन मिनट इंटरनेट टेलीफोनिक सेवा प्रति माह कारपोरेट, कॉलसेंटर और बीपीओ को प्रदान किया जिससे बड़ी मात्रा में हानि दर्ज की गई।

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