Science and Technology: Different Stages of Inferior Surgery

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निम्नतापी शल्य चिकित्सा के विभिन्न चरण (Different Stages of Inferior Surgery)

Different Stages of Inferior Surgery

निम्नतापी जैविकी (Cryobiology)

निम्न तापी जैविकी जीवों पर हिमायन तथा निम्न तापमान के प्रभाव के साथ संबंधित है। वर्तमान में, निम्नतापी जैविकी संबंधी तकनीक निर्जीव वस्तुओं के लिए भी प्रयुक्त होने लगी है। निम्नतापी जैविकी में निम्नतापी शल्य चिकित्सा, भ्रूण तथा युग्मक संरक्षण, उत्तक संरक्षण तथा प्रत्यारोपण, रक्त पदार्थ संरक्षण तथा निम्नतापी परिवहन सम्मिलित होते हैं। क्रायोजेनिक्स इंटरनेशनल, 1999 के अनुसार, मानव का वर्तमान चिकित्सा पद्धति से उपचार नहीं होने की स्थिति में हिमायन करने की प्रक्रिया को क्रायोनिक्स कहते हैं। व्यापक दृष्टिकोण से, निम्नतापी जैविकी अथवा Cryobiology का संबंध कार्यान्तरण विधियों, वनस्पति पदार्थों तथा कम तापमान (1960c) पर, निम्नतापी संरक्षकों की उपस्थिति में तरल नाइट्रोजन दव्ारा संचित किए हुए पशुओं की प्रतिक्रियाओं से भी है। सबसे अधिक प्रयोग में लाया जाने वाला कृत्रिम निम्नतापी संरक्षक है, डाइमिथाईल सल्फॉक्साइड (Dimethyl sulphoxide) I

निम्नतापी शल्यचिकित्सा (Cryosurgery)

इसके अंतर्गत कई प्रकार के उत्तकों को अत्यंत न्यून तापमान पर नष्ट किया जाता है। कम तापमान, एक विशेष घोल क्रायोजेन का प्रयोग करके प्राप्त किया जाता है। कफलिक, 1994 के अनुसार, उपचार के तीन मुख्य उद्देश्य सुधार, उपचार अथवा लघुकरण हैं। अधिकांशत: डिपस्टिक तकनीक का निम्नतापी शल्यचिकित्सा में प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक के अंतर्गत एक रूई युक्त प्रयोगक को तरल नाईट्रोजन में डुबाकर, घाव पर लगाया जाता है, जब तक पर्याप्त परिशमन घटित न हो जाए। इसके अतिरिक्त खुली सामग्री भी घाव पर (Cryogen) छिड़कने के लिए प्रयुक्त की जा सकती है। ठोस रूप में कार्बनडायक्साइड का भी प्रयोग त्वचा पर (Acetone) का मिश्रण लगा कर किया जाता है। ऐसा उपचार (Slush therapy) कहलाता है।

निम्नतापी संरक्षण (Cryopreservation)

यह तकनीक सर्वप्रथम वर्ष 1972 में चूहे के भ्रूण तथा युग्मक के संरक्षण, 1976 में बकरी तथा 1983 में मनुष्य के भ्रूण तथा युग्मक के संरक्षण हेतु प्रयुक्त की गई थी। यह पाया गया है, कि बहुत से बीज, पौधे तथा निम्न श्रेणी के पशु निम्न तापमान पर जीवित रह सकते है। परन्तु अधिकतर मानव, पशुओं तथा पौधों की कोशिकाएँं जीवित नहीं रह सकतीं। विशेषकर पौधों में उनकी विशेषताएँ, जैसे बड़ा आकार, अधिक बड़ी रिक्तिकाएं तथा जल का बाहुल्य समस्या उत्पन्न कर देती हैं। कोशिकाओं तथा उत्तकों को निम्न ताप पर नष्ट होने से बचाने के लिए निम्नतापी संरक्षक प्रयुक्त किए जाते हैं। ये निम्नतापी संरक्षक रासायनिक पदार्थ होते हैं, जैसे ग्लाईकॉल शर्करा, अल्कोहल, पोलीविनाईल पाईरोलिडोन, पोलीएथीलीन ग्लाइकोल (PEG) , पाली एथिलीन आक्साईड (PEO) , ग्लिसरीन, सुक्रोज तथा प्रोलीन। ये रासायनिक पदार्थ निम्नतापी विनाश की दर को घटा देते हैं।

जर्मप्लाज्म बैंक (Germplasm Bank)

जर्मप्लाज्म बैंक जीन संसाधनों के भंडार है, जहाँ ऐसे संसाधन लंबी अवधि के लिए तरल नाईट्रोजन का प्रयोग करके सुरक्षित रखे जाते हैं। ये संसाधन राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय आधार पर आवश्यकता पड़ने पर उपलब्ध किए जा सकते है। यह परामर्श दिया गया है, कि ऐसे जर्मप्लाज्म बैंकों को किसी अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान से संबद्ध कर दिया जाना चाहिए ताकि महत्वपूर्ण पौधों के रोग रहित जर्मप्लाज्म का भंडारण, वितरण तथा विनिमय सुनिश्चित किया जा सके।

जैव उर्वरक (Bio Fertilizers)

प्राकृतिक रूप से बनने वाले उर्वरक जो पौधों के विकास में सहायता करते हैं, जैव उर्वरक कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में ऐसे जैव-उर्वरक जैविक मूल के होते हैं। वर्ष 1982 में सुब्बाराव ने जैव उर्वरकों को जीवाणु संचरक (Microbial Inoculants) की संज्ञा देने का सुझाव दिया था। पौधों की जड़ों में सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं, जो जैव उर्वरक के रूप में प्रयुक्त होते हैं। सर्वाधिक प्रचलित जैव उर्वरकों में जीवाणु तथा साइनोबैक्टेरिया सम्मिलित हैं, जो नाईट्रोजन स्थरीकरण को प्रोत्साहन देते हैं। कुछ जैव उर्वरक जैसे (Azotobakterin) के उपयोग से उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई है। कुछ जैव उर्वरक जैसे-भारी धातुओं के विरुद्ध सहनशीलता प्रदर्शित करते हैं।

जैव उर्वरक से लाभ (Advantages from Bio Fertilizers)

  • कम मूल्य के कारण छोटे तथा मध्यम वर्गीय कृषकों दव्ारा सुगमता से प्रयोग।
  • प्रदूषण मुक्त।
  • कुछ जैव उर्वरकों से वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले पदार्थों का स्राव।
  • मृदा की उर्वरता में वृद्धि।
  • भौतिक तथा रासायनिक गुण जैसे भूमि में सीलन, जल-अवरोधन क्षमता आदि का विकास।
  • कुछ (Mycorrhizas) दव्ारा उप-पाचक उत्पन्न करने का कार्य।

शैवालीकरण (Algalization)

शैवालीकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वेंकटरमन दव्ारा वर्ष 1961 में किया गया था। शैवालीकरण, जैव उर्वरक के रूप में व्यापकस्तर पर हरित शैवाल के संवर्द्ध्रन की प्रक्रिया है। यद्यपि यह संकल्पना का प्रादुर्भाव भारत में हुआ था, तथापि इस तकनीक को वास्तविक रूप से जापान में विकसित किया गया। वर्ष 1990 में भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग दव्ारा शैवालीकरण हेतु उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चित बंगाल तथा नई दिल्ली में एक विशेष कार्यक्रम क्रियान्वित किया गया था। इस परियोजना के तहत कार्यरत वैज्ञानिकों के अनुसार, शैवालों की प्रकृति पर्यावरण-मित्रा की होती है जिसके फलस्वरूप उन्हें जैव उर्वरक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इनके प्रयोग से विशेषत: धान की उपज में 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की वृद्धि पाई गई है।

सामान्य जैव उर्वरक (Common Organic Fertilizer)

एजोला (Azolla) , एजोस्पीरिलियम (Azbspirillium) , माइकोराइजा (Mycorrihiza) , नील हरित शैवाल (Blue Green Algae) , राइजोबियम (Rhizobium) , फ्रैंकिया (Frankia) , स्यूडोमोनास स्ट्रायटा (Pseudmonas striata) , बैसिलिस पॉलीमिक्सा (Bacillus Polymyxa) , बैसिलस मेगाटेरियम (Bacillus Megaterium) एनाबिना एजोली (Anabaena azollae) ।

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