Science and Technology: Remote Sensing and Satellite Launch Vehicle

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दूर संवेदन (Remote Sensing)

दूर संवेदन की अन्य उपयोगिताएंँ (Other Applications of Remote Sensing)

वर्ष 2003 - 04 में सरकार दव्ारा राष्ट्रीय दूर संवेदन सूचना नीति की घोषणा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय तथा विदेशी उपग्रहों से प्राप्त की जाने वाली सूचनाओं का सटीक एवं प्रभावी उपयोग करना है। हैदराबाद-स्थित राष्ट्रीय दूर संवेदन एजेंसी को भारत में ऐसी सूचनाओं के संकलन और वितरण के लिए उत्तरदायी बनाया गया है। वर्तमान में दूर संवेदन तकनीक का प्रयोग निम्नांकित क्षेत्रों में किया जा रहा है:

  • फसल क्षेत्रफल उत्पादन एवं मूल्यांकन (Crop Acreage & Production Estimation, CAPE) :-इस कार्यक्रम का आरंभ 1995 में किया गया था, जिसके लिए कृषि और सहकारिता विभाग को प्रायोजक बनाया गया था। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य प्रमुख फसलों की कटाई के पूर्व उनके उत्पादन के मूल्यांकन से संबंधित उपग्रह-आधारित सूचनाओं का विश्लेषण करना था।
  • फसल (FASAL: Forecasting Agricultural Output using Space, Aerometer-logy & Land) :- कृषि मंत्रालय दव्ारा इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जाता है। वस्तुत: यह फसल क्षेत्रफल उत्पादन और मूल्यांकन नामक कार्यक्रम का ही विस्तार है। इस कार्यक्रम के तहत खरीफ फसलों का पूर्वानमुमान किया जाता है।
  • बाढ़ मानचित्रीकरण (Flood Mapping) :- कृषि विभाग, केन्द्री जल आयोग तथा राज्य राहत एजेंसियों दव्ारा संयुक्त रूप से 1987 से बाढ़ मानचित्रीकरण के लिए एक कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इसके तहत गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी, सिंधु सतलज, गोदावरी तथा महानदी के जलग्रहण क्षेत्र में बाढ़ मानचित्रीकरण कार्य किया जाता है।
  • सूखा मूल्यांकन (Drought Assessment) :- वास्पति सूचकांक तथा पृष्ठीय सूचनाओं के आधार पर उपग्रह-आधारित विश्लेषण कर 11 राज्यों में फसल की स्थितियों की जानकारी प्रदान की जाती है।
  • वन पर्यवेक्षण (Forest Monitoring) :-उपग्रह-आधारित सूचनाओं का उपयोग भारतीय वन सर्वेक्षण दव्ारा वनों के दव्वर्षीय पर्यवेक्षण के लिए किया जाता है। इस प्रकार के उपयोग से जैव विविधता के संरक्षण में भी व्यापक सहायता मिलती है। देश के चार क्षेत्रों में जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रयास किये जा रहे हैं। ये क्षेत्र हैं: उत्तर-पूर्वी हिमालय, पश्चिमी हिमालय, पश्चिमी घाट तथा अंडमान और निकोबार दव्ीपसमूह।
  • सिंचाई (Irrigation) :- केन्द्रीय जल आयोग दव्ारा दूर संवेदन का उपयोग कर एक विशेष कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इसके तहत असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा पश्चिम बंगाल में कमान क्षेत्र के अंतर्गत सिंचाई के सुदृढ़ीकरण के प्रयास किये जा रहे हैं।
  • बंजरभूमि मानचित्रीकरण (Wasteland Mapping) :- वर्ष 1986 - 2000 के मध्य ग्रामीण विकास मंत्रालय दव्ारा बंजरभूमि विकास हेतु एक वृहत कार्यक्रम क्रियान्वित किया गया था। पांच चरण वाले इस कार्यक्रम के तहत भारत के बंजरभूमि मानचित्र का निर्माण किया गया है।

उपग्रह प्रमोचक यान (Satellite Launch Vehicle)

किसी देश को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में तब तक स्वावलंबी नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसके दव्ारा उपग्रह प्रमोचक यान तकनीक का विकास नहीं किया जाये। इसका मुख्य कारण यह हैं कि कई अवसरों पर प्रमोचन पर होने वाला व्यय उसके निर्माण पर होने वाले व्यय से अधिक हो जाता है। इस कारण भारत जैसे देश में प्रमोचक यान तकनीक के विकास की रणनीति को अंतरिक्ष कार्यक्रम के उद्देश्यों में शामिल कर लिया गया। प्रत्येक प्रमोचक यान की उड़ाने विकासात्मक तथा व्यावसायिक दोनों होती हैं। इन्हें क्रमश: अंग्रेजी के अक्षरों ‘डी’ तथा ‘सी’ से अभिव्यक्त किया जाता है।

उपग्रह प्रमोचक यान (Satellite Launch Vehicle, SLV)

स्वदेशी तकनीक से उपग्रह प्रमोचक यान का विकास किया गया था, जिसके दव्ारा रोहिणी श्रेणी के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया। इस यान के चारों चरणों में ठोस प्रणोदकों का प्रयोग किया गया था।

स्वांर्द्धित उपग्रह प्रमोचक यान (Augmented Satellite Launch Vehicle, ASLV)

यह एस. एल. वी. का ही संवर्द्धन है। यह एक पांच चरणों वाला यान था जिसमें ठोस प्रणोदक के रूप्ज्ञ में एच. टी. पी. बी. (HTPB: Hydroxyl Terminated Poly Butadyne) अथवा एल. टी. पी. बी. (LTPB: Lactone Terminated Poly Butadyne) का प्रयोग किया गया था। इसमें उपग्रहों को सटीकता के साथ कक्षा में स्थापित करने के लिए एक विशेष युक्ति के रूप में रियल टाइम डिसीशन (RTD: Real Time Decision) का प्रयोग हुआ था।

ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक यान (Polar Satellite Launch Vehicle, PSLV)

  • इस प्रमोचक यान की प्रथम दो विकासात्मक उड़ानों को संवर्द्धित उपग्रह प्रमोचक यान के समकक्ष कहा जा सकता था। लेकिन तीसरी विकासात्मक उड़ान में पहली बार द्रव प्रणोदक का प्रयोग किया गया था। द्रव प्रणोदक के रूप में यू. डी. एम. एच. (UDMH: Unsymmetrical Di Methyl Hydrazine) तथा ऑक्सीकरक के रूप में नाइट्रोजन टेट्राक्साइड (Nitrogen Tetroxide) प्रयुक्त हुआ था। इस प्रणोदक तथा ऑक्सीकरक का प्रयोग करने वाले ईंजन को विकास ईजन (Vikas Engine) की संज्ञा दी गई थी जिसका प्रयोग यान के दूसरे चरण में किया गया था। इस यान ने 21 मार्च, 1996 को आई. आर. एस. -पी 3 नामक दूर संवेदी उपग्रह को ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया था।
  • विकासात्मक उड़ानों की सफलता के उपरांत ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचक यान की व्यवसायिक उड़ान की सहायता से कारियाई उपग्रह किटसैट तथा जर्मनी के उपग्रह ट्‌यूबसैट का सफल प्रक्षेपण किया गया। पी. एस. एल. वी. -डी 3 में वितरक कम्प्यूटर नेटवर्क तकनीक प्रयोग में लाई गई थी जिसके अंतर्गत 4 मिनी तथा 30 माइक्रो कम्प्यूटर प्रयुक्त हुए थे।
  • पी. एस. एल. वी. अब वासतव में एक विश्व स्तरीय प्रमोचक यान बन चुके है। इसका प्रयोग कर वर्ष 2001 - 02 में जर्मनी के बर्ड तथा बेल्जियम के प्रोब (PROBA) नामक उपग्रहों को प्रक्षेपित किया गया था।
  • इसी प्रकार 23 अप्रेल 2007 को पीएसएलवी सी-8 दव्ारा इटली के एजाइल नामक उपग्रह का भी सफल प्रक्षेपण किया गया था।
  • चंद्रयान-1 मिशन तथा रिसैट (RISAT-Radar Imaging Satellite) प्रक्षेपण के लिए पीएसएलवी- एक्स. एल. नामक संस्करण का विकास किया गया था। अधिक भार वाले उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भी एक नए संस्करण का विकास किया जाएगा जिसे पीएसएलवी एच. वी (हाई परफॉर्मेन्स) की संज्ञा दी गई है।

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