Science and Technology: Science in Daily Life and Some Other Components

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ (Achievements of Indians in Science and Technology)

  • के. कस्तूरीरंगन- यें एक भारतीय अंतरिक्ष विज्ञानी हैं। इन्होंने भारतीय अनुसंधान संगठन का अध्यक्ष पद भी संभाला है। कस्तूरीरंगन ने खगोल भौतिकी क्षेत्र में उच्च ऊर्जा एक्स रे. गामा रे खगोल विज्ञान और ऑप्टीकल एस्ट्रोनॉमी विषयों पर शोध किए। इनके नेतृत्व में अनेक सफल प्रक्षेपण यानों का संचालन किया गया। ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयानों और भू तुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपणयानों के सफल संचालन में कस्तूरीरंगन का सराहनीय योगदान रहा है। भारत का ग्रहीय अन्वेषण क्षेत्र में प्रवेश करने के परिप्रेक्ष्य में इनका नेतृत्व रहा।
    • भारत के सबसे महत्वपूर्ण अंतरिक्ष आधारित उच्च ऊर्जा खगोलशास्त्र वेधशाला के निर्माण में कस्तूरीरंगन ने पहल की। नई पीढ़ी के अंतरिक्षयानों के विकास, भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह (इनसैट-2) और भारतीय सुदूर संवेदनशील उपग्रह (IRS और 1B) के विकास में भी कस्तूरीरंगन की प्रमुख भूमिका रही है। वे भारत के दो प्रायोगिक पृथ्वी सर्वेक्षण उपग्रहों भास्कर-1 और 2 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे।
  • अनिल काकोडकर- ये भारत के परमाणु वैज्ञानिक और मैकेनिकल इंजीनियर हैं। ये भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे। थोरियम के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनने के परिप्रेक्ष्य में काकेडकर का अमूल्य योगदान रहा। भारत में दाबित भारी जल रिएक्टर प्रौद्योगिकी क्षेत्र में स्वदेशी विकास में काकोडकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कलपक्कम में दो रिएक्टरों की पुनर्स्थापना और रावतभाटा में इसके एक इकाई की स्थापना में भी इनकी भूमिका रही। इनके वैज्ञानिक योगदान के लिए इन्हें वर्ष 2009 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
  • लालजी सिंह- श्री सिंह एक भारतीय आण्विक जीव विज्ञानी हैं। इन्होने लिंग निर्धारण के आण्विक आधार, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, वन्यजीव संरक्षण, रेशम के कीड़ों के जीनोम का विश्लेषण, मानव जीनोम और डीएनए अध्ययनों पर शोध कार्य किया है।
    • सिंह ने हैदराबाद स्थित कोशिकीय और आण्विक जीवविज्ञान केन्द्र (CCMB) में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया है। सिंह ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर डीएन फिंगरप्रिटिंग से संबंद्ध जाँच क्षेत्र में नए आयाम जोड़े। इन्होंने डीएनए फिंगर प्रिंटिंग में ब्रीकेएम व्युत्पन्न जाँच (BKM-Derived Probe) का प्रयोग किया है। श्री सिंह दव्ारा किए गए इस प्रयोग के बाद विधि चिकित्सकीय अन्वेषण (Forensic Investigation) और पितृत्व निर्धारण में इसका उपयोग किया जा रहा है।
  • अशोक सेन- श्री सेन एक भौतिक विज्ञानी हैं। इन्होंने स्ट्रोंग थ्योरी (Strong Theory) विषय पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उल्लेखनीय है कि यह थ्योरी एक विमीय पदार्थ (स्ट्रिंग) की मौलिक कण (Fundamental Particles) की संज्ञा देता है। इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न ज्ञात प्रारंभिक कण (Elementary Particles) इन स्ट्रिंग्स के विभिन्न क्वांटम अवस्था के रूप में दृष्टिगोचर होते है। ये स्ट्रिंग वस्तुत: परिकल्पित कपायमान एक विमीय उप परमाण्विक संरचना होती है।
    • स्ट्रिंग थ्योरी पर कार्य करने के कारण ही श्री सेन को वर्ष 2012 में फंडामेंटल फिजिक्स प्राइज से पुरस्कृत किया गया। पुन: इस वर्ष इन्हें पद्म भूषण सम्मान मिला। इन्होंने S- duality सिद्धांत पर भी कार्य किया है।
  • थानु पद्मनाभन- थानु पद्मनाभन भी भारत के जाने -माने भौतिकविज्ञानी और ब्रह्यांडविज्ञानी हैं। इन्होंने गुरुत्वाकर्षण, संरचना निर्माण (Structure Formation) और क्वांटम गुरुत्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। प्रसंगवश, भौतिकीय ब्रह्यांड विज्ञान में स्ट्रक्चर फॉर्मेशन एक जटिल शोध क्षेत्र है। इसके अंतर्गत आकाश में विद्यमान तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं के बीच के रिक्त स्थानों के उद्भव के कारणों का अध्ययन किया जा रहा है। पद्मानाभन के योगदानों में डार्क एनर्जी के विश्लेषण और मॉडलिंग से संबंद्ध कार्य भी सम्मिलित हैं।
  • डार्क एनर्जी- यह ऐसा परिकल्पित ऊर्जा रूप है जो पूरे अंतरिक्ष में व्याप्त है तथा ब्रह्यांड के विस्तार को गति देने का कार्य करता है। यह ब्रह्यांड के विस्तार से संबंद्ध सबसे विश्वस्त परिकल्पना है। प्लैक मिशन दल और ब्रह्यांड विज्ञान के मानक मॉडल के अनुसार, ब्रह्यांड के कुल द्रव्यमान ऊर्जा में 26.8 प्रतिशत डार्क मैटर और 68.3 प्रतिशत डार्क एनर्जी है।

दैनिक जीवन में विज्ञान (Science in Daily Life)

रसोई उपकरण एवं उनके कार्य सिद्धांत (Kitchen Appliances and Their Working Principles)

रेफ्रीजरेटर (Refrigerator)

  • यह एक घरेलू उपकरण है। इसमें तापीय कुचालक कक्ष का उपयोग किया जाता है। इसमें एक हीट पंप भी लगा होता है। इस पंप के जरिए फ्रीज के अंदर की ऊष्मा को बाह्‌य वातावरण में स्थानांतरित किया जाता है। इससे फ्रीज के अंदर का तापमान कमरे के तापमान से भी कम हो जाता है। फ्रीज के एक सीमित आयतन में कम तापमान रहने से जीवाणुओं का जनन दर धीमा हो जाता है। इस कारण रेफ्रीजरेटर खाद्य पदार्थों के नष्ट होने की दर को कम कर देता है।
  • रेफ्रीजरेटर में लगा कंम्प्रेशर इसे आवश्यक शक्ति (Power) प्रदान करता है। यह कंम्प्रेशर एक प्रकार का पंप होता है। यह मोटर दव्ारा संचालित किया जाता है। मूल रूप से रेफ्रीजरेशन प्रणाली में 4 प्रमुख घटकों की भूमिका होती है। ये सभी रेफ्रीजरेटर की अवस्था परिवर्तन के लिए एक साथ कार्य करते हैं।

इन चार घटकों का वर्णन इस प्रकार है-

  • कम्प्रेशर (Compressor) : कम्प्रेशर एक ऐसी मशीन होती है जो पदार्थ को एक सीमित क्षेत्र में दाबानुकूलित करता है। कम्प्रेशर को प्राय: रेफ्रीजरेटर के नीचे या इसके सबसे ऊपर में लगाया जाता है। उल्लेखनीय है कि कमरे के वायु से ऊष्मा अवशोषित करने के बाद रेफ्रीजरेटर आयतन बनाए रखने के लिए दाब में कमी लाता है। ऐसे में कम दाब पर ‘रेफ्रीजरेट’ में ‘कंप्रेशर’ कम्प्रेशिंग के जरिए दाब बढ़ाता है। इससे तापमान में बढ़ोतरी होती है।
  • कन्डेंसर (Condenser) : कंप्रेशर से निकलने वाली गर्म, अधिक दाबित गैस कन्डेंसर से होकर गुजरती है। संवहन या पंखे या फिर पानी के उपयोग दव्ारा कन्डेसर पाईप का ठंडा रखा जाता है।
    • कन्डेसर का प्रमुख कार्य गर्म वाष्पीकृत रेफ्रीजरेंट को ठंडे द्रव में परिवर्तित करना होता है। इस प्रकार रेफ्रीजरेशन चक्र फिर से प्रारंभ हो जाता है।
  • इवैपोरेटर (Evaporator) : रेफ्रीजरेंट के कन्डेसर से गुजरने और द्रव में परिणत होने के बाद यह एक पैमाने (Metering Device) से गुजरता है। कन्डेसर रेफ्रीजरेंट को अधिक स्थान प्रदान करता है जिससे यह फिर से गैसीय अवस्था में आ जाता है। इस कारण तीव्र शीतलन होता है और इवैपोरेटर पर विद्यमान नमी भी जमने लगती है। इस प्रकार प्राप्त ठंडी हवा को एक पंखे के जरिए पूरे फ्रीज में भेजा जाता है।
  • थर्मल एक्सपानसन वॉल्व (Thermal Expansion Valve) : एक्सपानसन वॉल्व रेफ्रीजरेंट को प्रसारित करता है और इसके दाब को कम करता है। इससे तापमान में भी तीव्र गिरावट आती है। अत: रेफ्रीजरेंट फिर से कम दबाव और कम तापमान वाले द्रव अवस्था में आ जाता है। रेफ्रीजरेंट इवैपोरेटर के जरिए फिर से वापस जाता है तथा कुछ और हवा को शीतलित करता है।

कुछ अन्य घटक (Some Other Components)

  • डीफ्रॉस्ट प्रणाली (Defrost System) : स्वचालित डीफ्रॉस्ट प्रणाली न होने से इवैपोरेटर पर निर्मित फ्रॉस्ट अत्यधिक हो सकता है। ऐसे में आइसिंग (Icing) होने पर अन्य समस्याए भी उत्पन्न हो सकती हैं। लेकिन डीफ्रॉस्ट प्रणाली नियमित रूप से गलाने का कार्य करता है। इससे अत्यधिक आइसिंग नहीं होती है। डीफ्रॉस्ट प्रणाली मूलत: तीन हिस्सों में निर्मित होता है। इसमें लगा टाईमर (Timer) नियमित समयांतराल पर ऊष्मीय कुंडलियों को ऊष्मन (Heating) प्रारंभ करने का संकेत देता है। ये कुंडलियाँ ही फ्रॉस्ट को पिघलाती हैं। फ्रीजिंग से अधिक तापमान होने पर एक तापमान सेंसर हीटर को बंद होने का सिग्नल देता है। इस प्रकार प्रणाली फिर से कूलिंग करने लगता है।
  • थर्मोस्टेट (Thermostate) : यह रेफ्रीजरेटर का एक सरल उपकरण है। यह रेफ्रीजरेटर के मुख्य भाग में आंतरिक तापमान का पता लगाता है। यह मुख्य भाग में 32 से 38 डिग्री फॉरेनहाइट के बीच पाया जाता है। जब तापमान वांछित सेटिंग से कम हो जाता है तब थर्मोस्टेट कंप्रेशर को ऊर्जा देना रोक देता है।
  • आईस मेकर (Ice Maker) : आधुनिक रेफ्रीजरेटरों में आईस मेकर बने होते हैं। इस घटक का तात्पर्य है कि फ्रीजर में और अधिक आईस ट्रे की आवश्यकता नहीं होती है। सतत: जलापूर्ति होने से क्यूब मोल्ड्‌स (Cube Modals) में पानी भरा जाता है और तब आईस मेकर जमे हुए आईस क्यूब बनाता है।
  • इन्टरकूलर प्रणाली (Inter Cooler System) : यह प्रणाली रेफ्रीजरेटर के आंतरिक भाग को ठंडा और कमरे के तापमान से कम तापमान पर रखता है। इससे कमरे के तापमान पर जल्द ही खराब हो सकने वाले खाद्य पदार्थों का परिरक्षण किया जाता है।

इस प्रणाली में दो सबसे प्रचलित प्रकारों का उपयोग किया जाता है। ये हैं- तरल एवं वायवीय। पर्यावरणीय चिंताओं को देखते हुए रेफ्रीजरेटरों में वायवीय इन्टरकूलर प्रणाली (Air-Intercooler Systems) का उपयोग बढ़ाता जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि रेफ्रीजरेटर के चालू रहने की अवस्था में भी इसका आंतरिक भाग ठंडा नहीं हो पाता है तो यह इन्टरकूलिंग प्रणाली में खराबी का द्योतक होता है।

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