Science and Technology: Development of Super Computer in India

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कम्प्यूटर एवं सूचना प्रौद्योगिकी (Computer and Information Technology)

सुपर कम्प्यूटर (Super Computer)

भारत में सुपर कम्प्यूटर का विकास (Development of Super Computer in India)

  • सी-डैक की अगली योजना एक टेराफ्लॉप संसाधन तीव्रता से युक्त कम्प्यूटर बनाने की है जो अभी तक दुनिया के किसी भी कम्प्यूटर की सर्वोच्च गति है। यह तकनीक केवल अमेरिका व जापान के पास है। परम के साथ सी-डैक ने पारस व परूल नामक साफ्टवेयर बनाये हैं जिनमें से पारस परम का सिस्टम साफ्टवेयर है तथा परूल परम से संबंधित तथ्यों की ऑनलाइन लाइब्रेरी है।
  • सुपर कम्प्यूटर के विकास में (DRDO) की भी अतिविशिष्ट भूमिका रही है DRDO के विशेष विभाग अनुराग ने PACEE (Processor for Aerodynamic Computation and Evaluation) नाम से सुपर कम्प्यूटर की श्रृंखला का विकास किया है। 1996 में इसी का विकसित रूप PACE + जारी किया गया जिसकी क्षमता 1 गीगा लॉप से कुछ अधिक थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसे पेस स्पार्क के नाम से जारी किया गया।
  • पेस श्रृंखला के सुपर कम्प्यूटर लड़ाकू विमानों के निर्माण नाभिकीय रिएक्टर के डिज़ाइन, प्रक्षेपास्त्र विकास, सुदूर संवेदन के आँकड़ों का विश्लेषण, मौसम विज्ञान का विश्लेषण तथा भू-गर्भ शास्त्र जैसे क्षेत्रों में विशेष रूप से काम आते हैं।
  • इस कम्प्यूटर की मदद से DRDO ने अनामिका नाम से एक व्यवस्था शुरू की है जिसके माध्यम से एक्स-रे, सीटी स्कैन तथा MRI के त्रिआयामी चित्र प्राप्त किये जाते है।
  • सुपर कम्प्यूटर के विकास में इन दोनों संस्थाओं के अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण भूमिका BARC की है। BARC ने अनुपम नाम से एक सुपर कम्प्यूटर बनाया जिसकी मूल विशेषता यह है कि वह CISC (Complex Instruction Set Computer) प्रणाली के स्थान पर RISC (Reduced Instruction Set Computer) की प्रणाली पर काम करता है। इसका विशेष उपयोग नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में हुआ है, जिनमें अनुसंधान रिएक्टरों के डिज़ाइन, रेडियो समस्थानिकों के निर्माण तथा नाभिकीय चिकित्सा जैसे क्षेत्र प्रमुख हैं।
  • भारत को सुपर कम्प्यूटर के विकास के क्षेत्र में विश्व के सर्वाधिक विकसित कुछ देशों में शामिल किया जाता है। इन कम्प्यूटरों की विशेषता यह है कि ये अमेरिका के वेक्टर या ‘क्रेज’ सुपर कम्प्यूटरों की पद्धति पर कार्य नहीं करते बल्कि इनकी पद्धति अलग है। अमेरिकी कम्प्यूटरों की पद्धति को Pipe Line Processing कहते हैं जबकि भारतीय कम्प्यूटरों की पद्धति को Parallel Processing कहते हैं।
  • पाइप लाइन प्रोसेसिंग में एक बड़े प्रश्न को ऊपर से नीचे के क्रम में बाँटा जाता है तथा बहुत बड़े प्रोसेसर की मदद से उसे तेजी से सुलझाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में न केवल मँहगे संसाधनों का प्रयोग करना पड़ता है बल्कि बहुत अधिक तापीय ऊर्जा भी निकलती है, जिससे ताप नियंत्रण जटिल हो जाता है।
  • भारतीय पद्धति में बहुत बड़ी संख्या में साधारण कम्प्यूटर संसाधनों का प्रयोग किया जाता है तथा एक ही कार्य को कई अलग-अलग भागों में बाँटकर अलग-अलग संसाधनों के माध्यम से एक साथ किया जाता है। इस प्रक्रिया में न ते महँगे संसाधनों की आवश्यकता होती है और न ही अधिक तापीय ऊर्जा निकलती है।

यदि भारत में सुपर कम्प्यूटर विकास की प्रस्थान को आरंभिक चरण से लेकर वर्तमान समय तक देखा जाये तो हम उसका अध्ययन निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से कर सकते हैं-

  • भारत को USA ने CRAY-XMP तथा CYAY-YMP सुपर कम्प्यूटर देने से मना कर दिया था (शीतयुद्ध के परिणाम स्वरूप) । इसके बाद भारत सरकार ने 1988 में CDAC (Centre for Development of Advanced Computing) का गठन किया। CDAC को Parallel Processing सुपर कम्प्यूटर घरेलू स्तर पर विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई।
  • 1988 में CDAC ने अपना पहला मिशन प्रारंभ किया। इसमें CDAC परम श्रृंखला के Parallel Processing कम्प्यूटरों के निर्माण में सफल रहा। PARAM 8000, PARAM-8600 तथा PARAM-9000 का विकास इस चरण के अंतर्गत किया गया।
  • 1993 में CDAC ने दूसरा मिशन प्रारंभ किया। इसमें भारत का पहला सुपर कम्प्यूटर PARAM-10000 विकसित हुआ। इसकी क्षमता 100 गीगा फ्लॉप थी अर्थात यह एक सेकंड में 100 बिलियन गणितीय गणनाएँ करने में सक्षम था।
  • PARAM 10000 के दव्ारा NICNET (National Informatics centre Network को संचालित किया गया।
  • NICNET का संचालन योजना आयोग करता है। इसके दव्ारा सभी जिला मुख्यालयों तथा राज्यों की राजधानी को दिल्ली से जोड़ा गया है। NICNET उपग्रह आधारित नेटवर्किंग व्यवस्था है जिससे राष्ट्रीय आयोजन प्रक्रिया कानून व्यवस्था को निगरानी सुरक्षा, बाढ़ प्रबंधन, जनगणना जैसे कार्य विकेन्द्रीकृत रूप से संपन्न होते हैं।
  • 1999 में CDAC ने तीसरा मिशन प्रारंभ किया। इसमें अगली पीढ़ी के सुपर कम्प्यूटरों के विकास का लक्ष्य था जिससे कि पोखरण परीक्षण के बाद लगे पश्चिमी प्रतिबंधों से निपटा जा सके।
  • अप्रैल 2001 में ने अगली पीढ़ी का निम्न लागत से निर्मि सुपर कम्प्यूटर निर्मित किया।
  • दिसंबर 2002 में CDAC ने भारत का सबसे शक्तिशाली सुपर कम्प्यूटर परम पदम विकसित किया। इसकी क्षमता Trillion Operation प्रति सेकंड की है। इसका मुख्य प्रयोग Weather Forecasting के लिए किया जा रहा है। परम पदम की प्रारंभिक भंडारण क्षमता 10 टेराबाईट है जिसे 22 टेराबाइट तक बढ़ाया जा सकता है।
  • वर्ष 2001 में परम-पदम राष्ट्र को समर्पित किया गया। परम-पदम के विकास से कम्प्यूटर के क्षेत्र में नई सीमाओं को पार करते हुए भारत विश्व के उन 5 देशों में शामिल हो गया जिनके पास टेराफ्लॉप गणना की क्षमता वाले सुपर कम्प्यूटर हैं। भारत से पूर्व अमेरिका, जापान, इजरायल व चीन ने इस क्षमता के सुपर कम्प्यूटर विकसित किए हैं। परम-पदम में आधुनिकतम 4 RISC प्रोसेसरों का उपयोग किया गया है तथा इसमें SMP (Symmetric Multi Processers का तरीका अपनाया जा सके।
  • इसमें 10 से 100 टेराबाईट की दव्तीयक भंडारण क्षमता भी उपलब्ध है।
  • इसमें FCAL (Fibre Channel Arbitrated Loop) तकनीक का उपयोग किया गया है। इसके माध्यम से कम्प्यूटर के विभिन्न प्रयोगों के मध्य आँकड़ों का अतितीव्र आदान-प्रदान होता है।
  • इस सुपर कम्प्यूटर हेतु एक अति आधुनिक नेटवर्क प्रणाली Param Net-II विकसित की गई है जो ऑप्टिकल तुंतु पर आधारित है। इसमें 2.5 Giga bitscksec की गति से आँकड़ों का आदान-प्रदान किया जा सकता है।

टेस्ला: विश्व का प्रथम व्यक्तिगत (Personal) सुपर कम्प्यूटर (Tesla: The World՚S First Personal Super Computer)

सामान्य कम्प्यूटरों की अपेक्षा ढाई सौ गुना अधिक तेज गति वाले विश्व के प्रथम व्यक्तिगत सुपर कम्प्यूटर का विकास वैज्ञानिकों दव्ारा कर लिया गया है, इसके बारे में बताया जा रहा है कि सुपर कम्प्यूटर तकनीक आगामी पीढ़ी के सामान्य कम्प्यूटरों की गति को बढ़ाने में काफी सहायक सिद्ध होगी। वैज्ञानिकों ने बताया है कि ‘टेस्ला’ की सहायता से जहाँ डॉक्टरों को मस्तिष्क तथा शरीर के दूसरे अंगों के स्कैन के परिणाम शीघ्रता से मालूम हो सकेंगे। वहीं ये पर्सनल सुपर कम्प्यूटर चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यवसायियों तथा अनुसंधानकर्ता के शोध कार्यों में भी सहायक होंगे। इन कम्प्यूटरों की एक प्रमुख उपयोगिता यह भी होगी कि इनके दव्ारा सामान्य कम्प्यूटरों की प्रोसेसिंग में भी सौ फीसदी तक तेज सुधार किया जा सकता है।

सी-डैक (C-DAC- Centre for Development of Advanced Computing)

  • 1988 में संचार एवं सूचना तकनीक मंत्रालय के अधीन तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिकस विभाग (Electronics Department) (वर्तमान में इसका नाम सूचना तकनीक विभाग कर दिया गया) दव्ारा स्थापित सी-डैक वस्तुत: भारत का एक उत्कृष्ट अनुसंधान एवं विकास संस्थान है जो इलैक्ट्रॉनिक सूचना प्रौद्योगिकी एवं इससे संबंधित क्षेत्रों में कार्य करता है। सुपर कम्प्यूटिंग तथा भारतीय भाषा कम्प्यूटिंग सी-डैक के दो प्राथमिक कार्यक्षेत्र हैं ग्रामीण तथा सामाजिक विकास के क्षेत्र से संबंधित विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए पोर्टल (w. w. w. indg. in) सी-डैक की एक महत्वपूर्ण पहल है। इस पोर्टल का विकास मुख्य रूप से भारत के पहुँच के बाहर के निर्माण लोगों विशेषकर गरीब, कमजोर तथा महिलाओं तक एकल खिड़की (Single Window) के माध्यम से सूचना सेवाएँ पहुँचाने के उद्देश्य से किया गया है। यह पोर्टल विशेष रूप से प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्रामीण ऊर्जा तथा ई-प्रशासन के क्षेत्र में कार्य करता है।
  • 2003 में भारत सरकार दव्ारा सी-डैक के अंतर्गत ईआर एंड सी डी आई (Electronic Research and Development Centre India) एन सी एस टी (National Centre for Software Technology) और सी ई डी टी आई-मोहाली (Centre for Electronics Design and Technology India-Mohali) आदि का विलय कर दिया गया। विगत कुछ वर्षो से सी-डैक ने सुपर कम्प्यूटिंग और भारतीय भाषा कम्प्यूटिंग के साथ साथ कई अन्य क्षेत्रों जैसे, नेटवर्क तथा इंटरनेट सॉफ्टवेयर, स्वास्थ्य देखभाल, पूँजी तथा वित्तीय बाजार का प्रत्यासी प्रतिरूपण, ई-प्रशासन, रीयल टाइम सिस्टम तथ आभासी बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तथा नेचुरल लेंग्वेज प्रोसेसिंग में भी अपनी-अपनी गतिविधियों को विस्तारित कर दिया है।

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