Science and Technology: International Thermonuclear Experimental Reactor, ITER

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कुडनकुलम परियोजना (The Koodankulam Project)

  • रूस की सहायता से तमिलनाडु के तिरूनल्वेली जिले में कुडनकुलम में 1000 - 1000 मेगावाट ऊर्जा उत्पादन करने की क्षमता वाले 4 सामान्य जल रिएक्टरों की स्थापना की जा रही है। रिएक्टर VVER (जल शीतलन, जल संचालित ऊर्जा रिएक्टर का रूसी परिवर्णी शब्द है।) प्रकार का है और यह विश्व का सबसे सुरक्षित रिएक्टर होगा। वर्तमान में विश्व स्तर पर कुल 19 परमाणु रिएक्टर इस प्रकार के हैं। जहांँ तक सुरक्षा का प्रश्न है, भारतीय परमाणु उर्जा निगम ने संतोष व्यक्त किया है कि रिएक्टरों में आदि प्रारूप बुल्गेरियन रिएक्टरों की तुलना में कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किये गए हैं। वास्तव में जापान और जर्मनी के बाद परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा के संबंध में रूस का स्थान है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने रिएक्टर का अध्ययन कर कुल 35 सुधार सुझाये हैं। स्थापित होने वाले रिएक्टरों में ऐसे सभी 35 सुधार किये जाएंगे।
  • रिएक्टरों का नियोजन भारत के परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड और रूस के (Atomstoryexport) नामक एजेंसी के बीच करार किया गया है। परियोजना के लिए भारत और रूस के बीच दव्पक्षीय समझौता 20 नवंबर, 1988 में ही किया गया था। इसके अनुसार, रूस संवर्द्धित यूरेनियम की आपूर्ति करेगा जो ईंधन के रूप में प्रयुक्त होगा। सामान्य जल का प्रयोग मंदक और शीतलक, दोनों ही रूपों में किया जाएगा। आरंभिक चरणों में यह करार किया गया था कि प्रयुक्त ईंधन भारत दव्ारा रूस को वापस भेजा जाएगा जहांँ उसका प्रसंस्करण होगा। साथ ही, अपशिष्टों को भारत को लौटा दिया जाएगा। नई योजना के तहत आने वाली लागत को कम करने के लिए यह तय किया गया है कि भारत में ही ईंधन का प्रसंस्करण किया जाएगा।

टोकामैक (Tokamak)

चुम्बकीय बल के प्रयोग दव्ारा गर्म और सघन प्लाज्मा को संग्रहित करने के लिए प्रयुक्त उपकरण टोकामैक कहलाता है। इसका विकास रूसी भौतिक वैज्ञानिक टेम (Tamm) और सकारोव (Sakharov) दव्ारा 1950 में किया गया था। रूसी भाषा में टोकामैक (Toroidal Chamber Magnetic) का संक्षिप्त रूप है। यह इस अवधारणा पर आधारित है जिसमें परिवर्तनशील चुम्बकीय स्थान एक अभिप्रेरित विद्युत क्षेत्र की उत्पत्ति होता है। इससे प्लाज्मा करेंट का साधन उपलब्ध होता है। अंत में यह करेंट टोकामैक की आंतरिक त्रिज्या के साथ चुंबकीय स्थान का निर्माण करता हैं। उन्नत टोकामैक परीक्षण इस दृष्टि से किया जाता है कि प्लाज्मा की ज्यामितीय तथा रूपरेखा जिसमें करेंट घनत्व तथा ताप शामिल किये जाए और नियंत्रण रखा जा सके। दूसरे शब्दों में टोकामैक परीक्षण का लक्ष्य प्लाज्मा के व्यवहार को नियंत्रिक करना है। इस कारण टोकामैक की अवधारणा को ताप नाभिकीय संलयन रिएक्टर के लिए सर्वाधिक उन्नत माना जाता है। संलयन से उत्सर्जित ऊर्जा का प्रयोग करना है।

Toroidal Chamber Magnetic

यद्यपि कम लागत पर संलयन की प्रक्रिया से उर्जा प्राप्त करना दुष्कर है, लेकिन आगामी वर्षो में यह एक महत्वपूर्ण संसाधन बन जाएगा। उच्च तापमान पर प्लाज्मा को गर्म करना भी एक कठिन कार्य है। इस कार्य निष्पादन की दो प्रक्रियाएं हैं:

  • पहली प्रक्रिया को ओमिक हीटिंग (Ohmic Heating) कहते हैं जिसमें प्लाज्मा में विद्युत धारा प्रावाहित की जाती है जो इसके तापमान में वृद्धि करती है।
  • दूसरी प्रक्रिया में प्लाज्मा को संपीड़ित कर उसके तापमान को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। संपीड़न से तापमान और दाब दोनों ही प्रभावित होते हैं। इस प्रक्रिया को Energetic Particle Injection कहते हैं।

भारत ने भी इस दिशा में अनसुंधान कार्य आरंभ किये हैं। वस्तुत: 1989 में ही गांधीनगर स्थिति इंस्टीट्‌यूट ऑफ प्लाज्मा रिसर्च दव्ारा आदित्य नामक टोकामैक विकसित किया गया था। आदित्य की विशेषता यह है कि यह 5 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक तापक्रम पर प्लाज्मा की उत्पत्ति कर सकता है। वर्तमान में संस्थान दव्ारा अतिचालक का प्रयोग कर एक नये टोकामैक का निर्माण किया रहा है, जिसे सुपर कंडक्टिंग स्टीडी स्टेट टोकामैक (Superconducting Steady State Tokmak, SST-I) की संज्ञा दी गई है। इसमें एक चुंबक का प्रयोग किया जाएगा जिसमें अतिचालकता के गुण विद्यमान होंगे।

अंतरराष्ट्रीय तापनाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (International Thermonuclear Experimental Reactor, ITER)

  • यह एक अंतरराष्ट्रीय टोकामैक है जिसमें हाइड्रोजन के समस्थानिकों, ड्‌यूटेरियम तथा ट्रिटियम के नाभिकों का संलयन कराया जाएगा। ऐसे संलयन के बाद हीलियम (अल्फा कण) तथा एक उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन का निर्माण होगा। उल्लेखनीय है कि इन दोनों नाभिकों के संलयन से यूरेनियम-235 की अपेक्षा तीन गुणा अधिक ऊर्जा उत्पादित होती है।
  • स्लांयन के लिए उत्प्रेरक ऊर्जा की मात्रा के अत्यधिक होने के कारण यह है कि दोनों ही नाभिकों में धन आवेशित प्रोटोन शक्तिशाली रूप से विकर्षण दर्शाते हैं। वैज्ञानिक रूप से यह कहा गया है कि प्रतिक्रिया की दर बनाए रखने के लिए नाभिकों को 1 फेम्टोमीटर (1x10 - 15 मीटर) के अंदर होना चाहिए। ऐसी स्थिति में नाभिकीय बल तथा वैद्युत स्थैतिक बल आपस में संतुलित हो जाते हैं जो नाभिकों के संलयन के लिए अनिवार्य है। ड्‌यूटेरियम तथा ट्रिटियम के नाभिकों के संलयन के लिए 100,0000 डिग्री केल्विन तापमान आवश्यक होता है। प्लाज्मा को गर्म करने के लिए ओमिक हीटिंग (Ohmic Heating) नामक प्रक्रिया प्रयोग में लाई जाती है। इसके बाद तापमान को और अधिक बढ़ाने के लिए अत्यधिक ऊर्जा वाले उदासीन कणों के पुंज अथवा रेडियो आवृत्तियों अथवा माइक्रोवे का प्रयोग किया जाएगा।
  • इस रिएक्टर से 500 मेगावाट ऊर्जा 1000 सेकंड की अवधि में लगातार उत्पादित करने का लक्ष्य है। इस परियोजना को सर्वप्रथम 1985 में यूरोपीय संघ (यूराटामे के माध्यम से) तथा अमेरिका दव्ारा संयुक्त रूप से संकल्पित किया गया था। वर्ष 2001 में इससे रूस तथा जापान, 2003 में कनाड़ा, चीन तथा दक्षिण कोरिया तथा 6 दिसंबर 2005 को भारत भी शामिल हो गया। लेकिन बाद में कनाडा इससे बाहर हो गया। परियोजना पर लगभग 13 अरब डालर के व्यय की संभावना है तथा इसका निर्माण कार्य 20 वर्षों की अवधि में पूरा होगा। परियोजना के शेष 10 वर्षों में ऊर्जा उत्पादित की जाएगी। फ्रांस के कैडेरेकी (Cadarache) में स्थापित होने वाले इस रिएक्टर के परिसर का निर्माण 2008 से शुरू होगा जबकि टोकामैक का निर्माण 2010 से आरंभ किया जाएगा।

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