1857 के बाद भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India After 1857) Part 2 for Odisha PSC Exam

Get unlimited access to the best preparation resource for UGC : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

1909 का मार्ले-मिटो सुधार

1892 के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू संवैधानिक सुधार की दिशा में अगला प्रयास 1909 में मार्ले-मिंटो सुधार के रूप में आया। ब्रिटिश शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का खुला चिटवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू ठा इस अधिनियम दव्ारा लोगों के सामने आया जिसके महत्वपूर्ण बिन्दु निम्न थे-

  • सर्वोच्च विधान परिषद तथा प्रांतीय विधान परिषद की सदस्य संख्या में वृद्धि, गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति।
  • इस अधिनियम के दव्ारा भारत में पहली बार अप्रत्यक्ष एवं सीमित ही सही, निर्वाचन सिद्धांत को मान्यता मिली।
  • मुसलमानों को उनकी साम्राज्य की सेवा एवं व्यावहारिक महत्व को देखते हुए पृथक एवं प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व दिया गया।
  • कुछ प्रतिनिधि प्रांतीय विधान परिषदों दव्ारा, कुछ बड़े-बड़े जमींदारों दव्ारा और कुछ मंडल दव्ारा चुने जाते थे।
  • सुधारवादियों को संतुष्ट करने के लिए ‘बजट’ पर विचार करने एवं उस पर प्रस्ताव करने का अधिकार मिला। पूरक प्रश्न करने का अधिकार दिया गया।
  • सार्वजनिक महत्व के विषयों पर भी प्रस्ताव प्रस्तुत करने का अधिकार मिला।

1909 ई. के वार्षिक अधिवेशन में कांग्रेस ने इस अधिनियम के प्रति घोर असंतोष व्यक्त किया। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, मदन मोहन मालवीय, विलियम वेडरबर्न आदि नेताओं ने इस अधिनियम की तीखी आलोचना की। इनकी ओलाचना का सबसे बड़ा कारण पृथक निर्वाचन मंडल की घोषणा था।

पृथक निर्वाचन की व्यवस्था ने भारत में सांप्रदायिकता का बीज बो दिया जो कालांतर में भारत विभाजन का आधार बना। रैम्से मैकडोनाल्ड के अनुसार यह जनतंत्रवाद और नौकरशाही के बीच एक अधुरा और अल्पकालीन समझौता था।

Developed by: