1857 के बाद भारत का संवैधानिक विकास (Constitutional Development of India After 1857) Part 6 for Odisha PSC Exam

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प्रमुख विचार

  • 1919 के संवैधानिक सुधारों के बाद उद्योग धंधे चुने गए प्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार सरकार के हाथ में आ गए। दुर्भाग्यवश उपलब्ध धनराशि नाकाफी थी, इसलिए महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाए जा सके।

-डी एच बुकानन

  • तथाकथित ‘संवैधानिक सुधार’ की प्रकिया सरकारी नीति के दो अन्य तत्वों से संबद्ध रही- समय-समय पर ‘नरमपंथियों को साथ लाना’ एवं ‘फूट डालो और राज करो’ के उपायों को चतुराई पूर्वक प्रयुक्त करना।

- (1892 के सुधार के बारे में)

  • रिफार्म्स (सुधार) एक्ट (अधिनियम) और तत्संबंधी वक्तव्य ब्रिटिश जनता के इस अभिप्राय के परिचायक हैं कि वह भारत के साथ न्याय करना चाहती है और अब इस संबंध में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि रिफार्म्स की कटु आलोचना न कर हम उन्हें सफल बनाने के लिए प्रयास करें।

-गांधी (1919 के अधिनियम के बारे में)

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