Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam

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CHAPTER: Independence of Press

प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष

  • 1824 में प्रेस पर अंकुश लगाने वाले एक कानून के खिलाफ राजा राममोहन राय ने सुप्रीम कोर्ट को ज्ञापन भेजा।
  • 1870 - 1918 तक प्रेस ही एक ऐसा हथियार या, जिसके जरिए जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित किया जा सकता था।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपने ज्यादातर कामकाज के लिए प्रेस पर निर्भर थी।
  • 1885 में कांग्रेस की स्थापना करने वालों में करीब पत्रकार थे।
  • उस समय लगभग हर बड़ा राजनीतिक नेता खुद अखबार निकालता या किसी अखबार से जुड़ा हुआ था।
  • जी. सुब्रह्यण्यम अय्यर-द हिन्दू, स्वदेशमित्रम (संपादक)
  • बाल गंगाधर तिलक-केसरी, मराठा ( ″ )
  • सुरेन्दनाथ बनर्जी- बंगाली ( ″ )
  • शिशिर कुमार और मोतीलाला घोष-अमृत बाजार पत्रिका ( ″ )
  • गोपालकृष्ण गोखले-सुधारक ( ″ )
  • एन. एन. सेन-इंडियन मिरर ( ″ )
  • दादाभाई नौरोजी-हिन्दुस्तानी और एडवोकेट ऑफ इंडिया ( ″ )
  • ‘द ट्रिब्यून’ व ‘अखबर-ए-आम’ -पंजाब
  • ‘इंद्रप्रकाश’ - बंगाल
  • ‘बंग निवासी’ ‘साधारणी’ -बंगा-अस्तित्व में आए।
  • अखबार छापना व्यवसाय नहीं देश या समाज सेवा थी।
  • समाजसेवक अपनी हैसियत से चंदा देते थे।
  • अखबार शुरू करने के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं होती थी।
  • 1868 में ‘अमृत बाजार पत्रिका’ सिर्फ 32रू. में शुरू की गई।
  • 1879 में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी में ‘बंगाली’ का पुनप्रकाशन अधिकार 10रू. में खरीदा व प्रेस बैठाने में 1600 रू. का खर्च आया।
  • अखबारों में सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई।
  • वाइसराय-लॉर्ड डफ़रिन (मार्च 1886) - “आए दिन अंग्रेज शासकों के खिलाफ इन सैकड़ों तेज़ तर्रार बाबुओं का हमला बढ़ता जा रहा है। अंग्रेजों के खिलाफ ये रोज-ब-रोज शेष, निंदा और कटु आलोचना भरी बाते लिख रहे हैं।”
  • लॉर्ड डफ़रिन (मई 1886) - “इसमें कोई शक नहीं कि अखबार पढ़ने वाले लोगों के दिमाग में यह बात घर करती जा रही है कि हम (अंग्रेज) सामान्यत: पूरी मानव जाति के और विशेषकर भारत के दुश्मन है।”
  • 1870 में भारतीय दंड संहिता में धारा 124 ए जोड़ा गया।
  • 124 ए- भारत में विधि दव्ारा स्थापित ब्रिटिश सरकार के प्रति विरोध की भावना भड़काने वाले व्यक्ति को 3 साल से आजीवन देश निकाला तक की सजा।
  • ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा संदेह से परे होने पर 124 ए लागू नहीं होती इसलिए पत्रकार अपने लेख के साथ महारानी और सरकार के प्रति अपनी निष्ठा जताने वाली बाते भी लिख देते थे।
  • प्रेस की आजादी का सवाल दरअसल आजादी के सवाल से जुड़ गया।
  • 1876 - 77 के अकाल-लार्ड लिटन के प्रशासन की प्रेस के दव्ारा खुलकर आलोचना की गई।
  • 1878 में वर्नाकुलर प्रेस ऐक्ट (भाषाई अखबार पर अंकुश लगाने के लिए खासकर अमृतबाजार पत्रिका) लागू किया गया।
  • प्रावधान- “अगर सरकार समझती है कि कोई अखबार राजद्रोहात्मक सामग्री छाप रहा है या उसने सरकारी चेतावनी का उल्लंघन किया, तो सरकार उस अखबार, उसके प्रेस व अन्य सामग्री को जब्त कर सकती है।”
  • प्रेस व अन्य संगठनों ने इसके खिलाफ संघर्ष छेड़ा।
  • 1881 में लार्ड रिपन ने यह कानून वापस ले लिया।
  • अमृतबाजार पत्रिका (बंगला व अंग्रेजी) को शतोशत सिर्फ अंग्रेजी अखबार बना दिया गया था।
  • कलकता के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नॉरिस की शालीग्राम की प्रतिमा पर दिए फैसले के खिलाफ ‘बंगाली’ अखबार में लिखने के लिए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को दो मास की कैद की सजा दि गई।
  • 5 जजों की बेंच में एकमात्र भारतीय जज रोमेश चंद्र मित्र (विरोध किया) थे। सजा के खिलाफ विरोध करने वालों में युवा आशुतोष मुखर्जी भी थे।
  • प्रेस की आजादी के लिए सबसे ज्यादा जुझारू नेता बालगंगाधर तिलक थे।
  • बाल गंगाधर तिलक और जी. जी आगरकर ने 1881 में केसरी (मराठी) मराठा (अंग्रेजी) का प्रकाशन शुरू किया।
  • तिलक में राष्ट्रीयता के प्रचार के लिए 1898 में गणपति महोत्सव और 1896 में शिवाजी जयंती शुरू किया।
  • 1896 - 97 में तिलक ने पूना सार्वजनिक सभा के युवा कार्यकर्ताओं की मदद से महाराष्ट्र में ‘कोई टैक्स नहीं’ अभियान चलाया।
  • 27 जून 1898 को चापेकर बंधुओं ने पूना की प्लेग कमेटी अध्यक्ष रैंड और लेफ्टिनेंट आयर्स्ट की हत्या कर दी।
  • रैंड की हत्या को लेकर आरोप लगाया गया कि तिलक के नेतृत्व में पूना के ब्राह्यणों की साज़िश थी।
  • सरकार तिलक को हत्याकांड में फंसाना चाहती थी पर उनके पास सबूत न थे इसलिए उन्हें 124ए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।
  • न्यायाधीश स्ट्रेची की अदालत में मुकदमा चला।
  • ज्रूाी में 6 यूरोपीय व तीन भारतीय सदस्य थे।
  • आरोप का आधार-15 जून को केसरी में छपी दो सामग्री।
    • शिवाजी दव्ारा अफजल खान की हत्या का औचित्य सिद्ध करना।
    • कविता-शिवाजी का उदगार
  • कुछ दोस्तों ने तिलक को माफी माँग लेने को कहा, तिलक ने मना कर दिया।
  • मतों से तिलक को अपराधी ठहरा 18 माह की सजा दी गई। विरोध में अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर चारों ओर काली पट्‌िटयांँ छापी गई व विशेष संस्करण निकाले गए।
  • लंदन में भारतीय अप्रवासियों की सभा में- दादाभाई नौरोजी- “ब्रिटिश सरकार अब प्रशासन के रूसी (जारशाही) तरीके अपनाने लगी है। प्रेस का गला घौटने का नतीजा उसके लिए आत्मघाती साबित होगा।”
  • लोगों ने तिलक को लोकमान्य की उपाधि दी।
  • सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (1897) -उन्हें सजा मिलने पर “आज सारा देश रो रहा है” ।
  • 1998 में धारा 124ए में संशोधन कर धारा 153 -ए जोड़ी गईं।
  • 153-ए- अगर कोई व्यक्ति सरकार की मानहानि करता है या विभिन्न वर्गों में नफरत फेलाता है या अंग्रेजों के खिलाफ घृणा का प्रचार करता है, तो यह भी अपराध होगा।
  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को लेकर चले आंदोलन के कारण अंग्रेजों ने दमन चक्र चलाया।
  • 1908 में सरकारी अफसरो पर बमो से हमले किए गए।
  • भारतीय संघर्ष में ‘बमो’ या आतंकवाद के प्रवेश पर तिलक ने लेख-माला लिखी।
  • तिलक ने व्यक्तिगत हत्या व हिंसा की निंदा की साथ ही इसके लिए सरकार को दोषी ठहराया।
  • 24 जून 1908 को तिलक को गिरफ्तार कर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया।
  • जूरी के दो भारतीय सदस्य के असहमति के बावजूद तिलक को दोषी ठहराया गया व 22 जुलाई को सजा सुनाई गई।
  • उस दिन बंबई के सारे बाजार बंद रहे एक हफ्ते तक बंद जारी रहा।
  • बंबई की सभी 80 कपड़ा मिलों व रेल मजदूरों ने 6 दिन का हड़ताल किया।
  • दमन के लिए सेना बुलाई गई 16 मजदूर मारे गए 50 घायल हुए।
  • इस मामले की पुनरावृत्ति गाँधी (तिलक के राजनीतिक उत्तराधिकारी) (यंग इंडिया में लिखे लेख के लिए 6 साल की सजा) (1922) के खिलाफ चले मुकदमें में हई।
  • गाँधीजी- “आप लोगों ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ चले मुकदमें की पुनरावृत्ति कर मेरा सम्मान किया है। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि मेरे लिए यह सबसे अधिक गर्व और प्रतिष्ठा की बात है कि तिलक के साथ मेरा नाम भी जुड़ गया।”
  • अदालत में सवाल उठाया-तिलक- “यहाँ सवाल तिलक का नहीं है। सवाल है कि क्या सरकार वाकई प्रेस की उतनी आज़ादी देने को तैयार है, जो आज़ादी इंग्लैंड में प्रेस को मिली हुई है।”

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