Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam

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CHAPTER – Revolution Among Common People

नागरिक और आदिवासी विद्रोह

1757 में ब्रिटिश राज की शुरूआत के बाद से ही अंग्रेंजो को छिटपुट प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जनता का यह प्रतिरोध नागरिक विद्रोह, आदिवासी विद्रोह और किसान आंदोलन में बँटा।

नागरिक विद्रोह:-

ये विद्रोह स्थानीय हुआ करते थे, जो किसी खास मुद्दे और स्थानीय असंतोष के कारण उपजते थे।

कारण:-

  • ब्रिटिश राज दव्ारा अर्थव्यवस्था, प्रशासन, भू-राजस्व प्रणाली में जिस तेजी से परिवर्तन किए गए, उसने इन विद्रोह को जन्म दिया।
  • लगान की दरें (बगांल में 30 साल के भीतर दर मुगलकाल के मुकाबले दोगुनी बढ़ा दी गई) बेतहाशा बढ़ायी गई पर गाँव के विकास एवं कल्याण के लिए कुछ नहीं किया गया।
  • ब्रिटिश राज ने जीमंदारों और पोलिगारों से लगान वसूली का अधिकार छीन लिया और लगान न चुका पाने के कारण उन्हें ज़मीन के अपने अधिकार बेचने पड़े।
  • सरकारी अधिकारियों और नवधानाद्य व्यापारियों और महाजनों ने ज़मींदारों व पोलिगारों की सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभुत्व पर कब्जा किया, तो उनके अहं को चोट पहुँची।
  • लगान की ऊँची दरों के कारण किसान या तो कर्ज लेता या ज़मीन बेचता किसानों को जो ज़मीन पट्‌टे पर मिलती भूस्वामियों से उसका किराया चुका पाना किसानों के बूते से बाहर थी।
  • दक्षिण भारत में विजयनगरम के राजा (1794) विद्रोह किया। तमिलनाडु के पोलिगारों (1790) , मालाबार और समुद्रतटीय आंध्र क्षेत्र में पोलिगारो ने 19वीं सदी के पहले दशक में और पारलेकमड़ी के पोलिगारों (1813 - 14) में विद्रोह किया।
  • त्रावनकोर के दीवान वेलु थंपी (1805) , मैसूर के किसानों (1830 - 31) , विशाखापतनम में (1830 - 34) , गंजाम (1838) और कुरनूल में (1846 - 47) में बड़े विद्रोह किए।

आदिवासी विद्रोह

कारण-

  • आदिवासी शेष समाज से अलग रहते थे, परन्तु ब्रिटिश राज ने उनको औपनिवेशिक घेरे में खिंच लिया।
  • कबीलों के सरदास को ज़मीदारों का दर्जा दे लगान की नई प्रणाली लागू की गई।
  • ईसाई मिशनरियों की घुसपैठ को राज ने बढ़ावा दिया।
  • बिचौलियों का इस्तेमाल किया गया, जो आदिवास्याेिं के ज़मीन पर कब्जा जमाते गए।
  • आदिवासी भोजन, ईंधन और पशुओं का चारा आदि जंगल से जुटाते थे, जिस पर तरह-तरह के अंकुश लगा दिए गए।
  • आदिवासी ‘ह्यूम’ व ‘पडु’ खेती करते थे- यानि जब उनकी खेत उपजाऊ नहीं रह जाती तो वे जंगल साफ कर खेती के लिए ज़मीन तैयार करते। इसे पूरी तरह से रोक दिया गया।
  • सरकारी बिचौलिए और दलाल आदिवासियों का शोषण करते और उनसे बेगार करवाते थे।
  • आदिवासियों में असंतोष गहराता गया और उनके हर विद्रोह का यही कारण था। इन्होंने वर्ग के लिए नहीं जातीय आधार पर अपने आप को संगठित किया, जैसे- संथाल, कोल, मुंडा आदि।

संथालों का विद्रोह-

  • संथालों का विद्रोह सबसे जबरदस्त था। ये अंधविश्वास में यकीन करते थें।
  • भागलपुर के राजमहल के बीच का क्षेत्र “दामन-ए-कोह” कहलाता, जो संथाल बहुल क्षेत्र था।
  • ज्म़ाींदार, पुलिस, राजस्व विभाग और अदालतों ने संथालों पर जुल्म ढाए एवं उनकी ज़मीन-जायदाद छीन ली।
  • संथालों को कर्ज देकर 50 - 500 प्रतिशत ब्याज वसूला जाता था।
  • धनी व ताकतवर लोग, संथालों को उजाड़ देते थे।
  • उनकी खड़ी फसल पर हाथी दौड़ा दिए जाते थे।
  • 30 जून, 1855 को भगनीडीह में 400 आदिवासी गाँवों के 6000 आदिवासी ने विद्रोह का निर्णय लिया।
  • दो प्रमुख नेता सीदो और कान्हू ने घोषणा की कि ठाकुरजी (भगवान) ने उन्हें निर्देश दिया है कि आजादी के लिए हथियार उठा लो।
  • सीदो ने कहा- “ठाकुरजी ने मुझे आदेश देते समय कहा कि यह देश साहबों का नहीं है। ठाकुरजी खुद हमारी तरफ से लड़ेंगे। इस तरह आप साहब लोग और सिपाही लोग खुद ठाकुरजी से लड़ेगे।”
  • 60 हजार हथियारबंद संथालों को इकट्‌ठा किया गया एवं कई हजार आदिवासियों को तैयार रहने को कहा गया। उनसे कहा गया नगाड़ा बजे तो हथियार उठा लेना।
  • विद्रोहियों का सफाया करने एक मेजर के नेतृत्व में 10 टुकड़ियाँ भेजी गई।
  • मार्शल लॉ लागू किए गए, विद्रोही नेताओं पर 10 हजार का इनाम घोषित किया गया।
  • 15 हजार से ज्यादा संथाल मारे गए।
  • अगस्त 1855 में सीदो पकड़ा गया, उसे मार डाला गया।
  • कान्हू फरवरी, 1856 में पकड़ा गया।
  • एल. एस. एस. ओ. मुले ने इसे मुठमेड़ की संज्ञा दी है।

कोल, रंपा और बिरसा मुंडा विद्रोह-

  • छोटा नागपुर के कोल आदिवासियों का विद्रोह (1820 - 1826) चला, हजारों आदिवासियों को कत्ल करने के बाद ब्रिटिश शासन सत्तासीन हुआ।
  • अंाध्र की तटवर्ती क्षेत्रों में रंपा पहाड़ी आदिवासियों ने 1879 में नए जंगल कानून के खिलाफ विद्रोह किया। 1880 में विद्रोह को दबा दिया गया।
  • मुंडा विद्रोह (1899 - 1900) बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ।
  • मुंडा जाति में सामूहिक खेती की परंपरा थी, जिस पर जागीरदारों, ठेकेदारों, बनियों और सूदखारों ने हमला बोला।
  • मुंडा सरदार 30 वर्ष तक इसके लिए लड़ते रहे।
  • बिरसा मुंडा का जन्म 1884 में हुआ। 1895 में उसने खुद को भगवान का दूत घोषित कर दिया।
  • 1899 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बिरसा मुंडा में मुंडा जाति का शासन स्थापित करने के लिए विद्रोह का ऐलान किया।
  • उसने कहा ‘दिकुओ’ से हमारी लड़ाई होगी, पर उसने गरीब गैर-आदिवासियों पर हाथ न उठाने की हिदायत दी।
  • फरवरी 1900 बिरसा गिरफ्तार कर लिया गया और जून में यह जेल में ही मर गया।
  • विद्रोह को कुचल दिया गया।

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