1947 − 1964 की प्रगति (Progress of 1947 − 1964) for Odisha PSC Exam Part 4 for Odisha PSC Exam

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भारत की विदेश नीति

स्वतंत्रता के पूर्व भारत की कोई स्पष्ट विदेश नीति नहीं थी, क्योंकि भारत ब्रिटिश सत्ता के अधीन था। किन्तु विश्व मामलों में भारत की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। इसका न केवल पड़ोसी देशों के साथ अपितु दूर-स्थित देशों के साथ भी सांस्कृतिक एवं व्यापारिक आदान प्रदान होता रहा है। भारत की विदेश नीति की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए पंडित नेहरू ने 1946 में कहा था कि वैदेशिक संबंधों के क्षेत्र में भारत एक स्वतंत्र नीति का अनुसरण करेगा, और गुटों की खींचतान से दूर रहते हुए संसार के समस्त पराधीन देशों को आत्म निर्णय का अधिकार प्रदान करने तथा जातीय भेदभाव की नीति का दृढ़ता पूर्वक उन्मूलन कराने का प्रयत्न करेगा। नेहरू का उपरोक्त कथन आज भी भारतीय विदेश नीति का आधार स्तंभ है और भारत दुनिया के शांतिप्रिय राष्ट्रों के साथ मिलकर आंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं सदभावना के प्रति प्रयत्नशील है।

भारत की विदेश नीति की स्पष्ट झलक पंचशील समझौते में देखने को मिलती है। यह विदेश नीति संबंधी पांच आचरणों पर बल देता है।

  • एक-दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और सर्वोच्च सत्ता के लिए पारस्परिक सम्मान की भावना।
  • अनाक्रमण की भावना।
  • एक-दूसरे के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप न करना।
  • समानता एवं पारस्परिक लाभ।
  • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना का विकास।

पंचशील समझौते के अनुसार भारत ने अंग्रेजों से विरासत में प्राप्त उन विशेषाधिकारों का परित्याग कर दिया, जो अब तक उसे तिब्बत में प्राप्त थे।

अप्रैल, 1955 में इंडोनेशिया के बान्डुंग शहर में एफ्रो-एशियाई देशों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 29 देशों के 340 प्रतिनिधि एकत्रित हुए। इस सम्मेलन का आयोजन भारत, इंडोनेशिया तथा बर्मा ने सम्मिलत रूप से किया था। इस सम्मेलन में पंचशील के सिद्धांतों पर जोर दिया गया तथा एशिया तथा अफ्रीका से संबंध रखने वाली आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार विमर्श किया गया। इन देशों दव्ारा विश्व शांति एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए किए जा सकने वाले कार्यो पर विचार विमर्श तथा नृ-जातीय भेद भाव एवं पृथकत्व समाप्त करने पर जोर दिया गया। इस सम्मेलन को तीसरी शक्ति के अभ्युदय के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा।

20 सितंबर, 1961 को भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति कर्नल नासिर तथा यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति मार्शल टीटो के सहयोग से विश्व की तीसरी शक्ति के रूप में यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में गुट निरपेक्ष संघ का गठन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य गुट निरपेक्षता के क्षेत्र का विस्तार तथा इसके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करना था। बेलग्रेड सम्मेलन में इसके प्रतिनिधियों ने यह प्रस्ताव पारित किया कि सदस्य देश शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर बल दें, समस्त राष्ट्र पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपनी सरकार का गठन करें, एक-दूसरे की अखंडता एवं सार्वभौमिकता का सम्मान करें तथा रंगभेद की नीति की आलोचना करें इसने परमाणु हथियारों से युक्त विश्व व्यवस्था का भी समर्थन किया। गुट निरपेक्ष आंदोलन ने उपनिवेशवाद को समाप्त करने एवं तीसरी दुनिया के नव-स्वतंत्र राष्ट्रों में लोकतंत्र, मानव अधिकारों की सुरक्षा एवं चुनी हुई सरकार की स्थापना पर बल दिया। इस प्रकार दव्तीय विश्वयुद्ध के बाद आंतरराष्ट्रीय राजनीतिक के स्वरूप में परिवर्तन लाने में गुट निरपेक्ष आंदोलन की विशेष भूमिका रही। इसने नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा तथा युद्ध की संभावनाओं को रोकने में अपनी प्रभावी भूमिका का परिचय दिया।

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