महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-1: Important Political Philosophies for Odisha PSC

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उदारवाद

उदारवाद एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन है जिसका गहरा संबंध पूंजीवाद के साथ है। पूंजीवाद एक आर्थिक प्रणाली है। जिसे वैचारिक समर्थन देने वाला दर्शन उदारवाद है। उदारवाद का आरंभ 17वीं शताब्दी के अंतिम चरण में हुआ और जो कई परिवर्तनों के साथ आज तक एक प्रमुख राजनीतिक विचारधारा बना हुआ है। उदारवाद ’लिबरलिज्म़्‌’ शब्द का हिन्दी अनुवाद है। इसे उदारवाद इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह व्यक्ति के लिए अधिकतम स्वतंत्रता की मांग करता है।

उदारवाद का उद्भव 17वीं शताब्दी में हुआ। उस समय बहुत सी ऐसी परिस्थितियाँ थी जिन्होंने इस विचारधारा के विकास में योगदान दिया। पुनर्जागरण और धर्म सुधार आंदोलन ने धर्म के भीतर तार्किकता को बढ़ावा दिया जिससे मनुष्य और उसके सांसारिक हितों को महत्व मिलना शुरू हुआ। इसी समय वैज्ञानिक क्रांति के कारण पूंजीवाद का विकास शुरू हुआ। पूंजीवाद प्रणाली में जिस बुर्जुवा (पूंजीपति) वर्ग ने सामंत वर्ग के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की, उसी बुर्जुवा वर्ग के पक्ष में उदारवादी विचारधारा की स्थापना हुई। बुर्जुवा वर्ग ने सामंतों को मिलने वाले विशेषाअधिकारों को चुनौती दी, स्वतंत्रता और समानता जैसे राजनीतिक आदर्शों की मांग उठाई तथा अनुबंध की स्वतंत्रता जैसे आर्थिक विचारों को प्रस्तुत किया। ये सभी विचार वस्तुत: पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक स्थितियाँ निर्मित करने वाले विचार थे। इसलिए राजनीति दर्शन में प्राय: माना जाता है कि उदारवाद पूंजीवाद का वैचारिक तर्क है।

उदारवाद के विभिन्न रूप

उदारवाद का विकास कई चरणों में हुआ है। इसके विकास के प्रमुख चरणों का संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है-

’पारंपरिक’ या ’नकरात्मक’ उदारवाद

यह उदारवाद का आरंभिक चरण है जो 17वीं शताब्दी के अंत से शुरू होकर लगभग 1850 ई. तक चलता रहा। इस वर्ग के प्रमुख विचारक हैं-जॉन लॉक, एडम स्मिथ, जेरेमी बेंथम तथा हर्बर्ट स्पेंसर। जॉन लॉक को उदारवाद का जनक भी कहा जाता है। इन विचारकों को ’पारंपरिक उदारवादी’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्होंने स्वतंत्रता और समानता के विचारों की आरंभिक धारणा इन्होंने प्रस्तुत की थी। इन्हें ’नकरात्मक उदारवादी’ इसलिए कहते हैं क्योंकि इन्होंने स्वतंत्रता और समानता जैसे आदर्शों की परिभाषा नकरात्मक पद्धति से की। नकरात्मक उदारवाद के प्रमुख विचार इस प्रकार हैं-

  • मनुष्य एक तार्किक प्राणाी है तथा अपने जीवन के संबंध में सर्वश्रेष्ठ निर्णय वह स्वयं ही ले सकता है।

  • व्यक्ति के वैयक्तिक तथा सामाजिक हितों में कोई अंतर्विरोध नहीं है। व्यक्तिगत हित की साधना से ही व्यक्ति सामाजिक हित में सहायक होता है।

  • प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मूल अधिकार प्राकृतिक रूप से ही प्राप्त हैं जिनमें स्वतंत्रता का अधिकार, जीवन का अधिकार तथा व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकार प्रमुख हैं।

  • सभी व्यक्तियों के आपसी संबंध एक दौड़ के समान हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के साथ दौड़ में भाग लेता है। राज्य का काम सिर्फ यह देखना है कि कोई भी व्यक्ति दौड़ के नियमों का उल्लंघन न करें। अंतिम रूप से किसकी हार होती है तथा किसकी जीत-यह तय करना राज्य का काम नहीं है। दौड़ में होने वाली हार और जीत न्यायोचित है, न कि अनैतिक।

  • राज्य प्राकृतिक या दैवीय संस्था नहीं है बल्कि व्यक्तियों दव्ारा अपने हित में बनाया गया एक कृत्रिम यंत्र है। राज्य का निर्माण सिर्फ इसलिए किया गया है कि सभी व्यक्ति शांति के साथ रह सकें। उसका कार्य सिर्फ यह देखना है कि कोई व्यक्ति कानूनों का उल्लंघन न करे। राज्य की इस धारणा को रात्रिरक्षक राज्य या प्रहरी राज्य कहा जाता है।

  • अर्थव्यवस्था के संबंध में यह विचारधारा अहस्तक्षेप के सिद्धांत की समर्थक है। इसके अनुसार अर्थव्यवस्था मांग और पूर्ति के नियम के अनुसार स्वत: चलने वाली व्यवस्था है जिसमें राज्य की ओर से कोई भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

  • ’स्वतत्वमूलक व्यक्तिवाद’ इस विचारधारा का प्रमुख सिद्धांत है जिसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में निहित शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं का स्वामी है चूँकि वह इन क्षमताओं का स्वामी है, इसलिए इन क्षमताओं से अर्जित होने वाले सभी लाभों पर उसका नैतिक अधिकार है जिसे उससे छीना नहीं जा सकता।

  • ’अनुबंध की स्वतत्रंता इनके आर्थिक विचारों का एक और महत्वपूर्ण अंग है। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति से जबरन कोई कार्य नहीं कराया जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति कोई भी कार्य करने या न करने हेतु स्वतंत्र है। यदि रोजगार देने वाले तथा उसे स्वीकार करने वाले व्यक्तियों के मध्य सहमति बनती है तो उनकी सहमति की शर्तें अनुबंध के रूप में होंगी। अनुबंध करने तक व्यक्ति पूर्णत: स्वतंत्र हैं किन्तु अनुबंध स्वीकार करने के पश्चात्‌ वह उसकी शर्तों से बंध जाता है।

  • संपत्ति का अधिकार इनकी आर्थिक मान्यताओं में प्रमुख है। लॉक का मानना था कि संपत्ति का अधिकार प्राकृतिक अधिकार है जिसे कोई भी राज्य या सरकार नहीं छीन सकती मानव के अधिकारों का सारतत्व है।

  • जहाँ तक समाज का प्रश्न है, ये चिन्तक आधुनिक दृष्टिकोण के समर्थक है। इनका स्पष्ट मानना है। कि व्यक्ति को सभी प्रकार की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यह तभी संभव होगा जब उसे धार्मिक संस्थाओं सामाजिक रूढ़ियों इत्यादि से भी पर्याप्त स्वतंत्रता मिले।

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