कांग्रेस की नीतियांँ (Congress Policies) Part 8 for Tripura PSC

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कांग्रेस की विदेश नीति

राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों पर पाश्चात्य प्रभावों का महत्वपूर्ण एवं अवश्यभावी परिणाम यह हुआ कि वे अपने हितों को इसमें तलाशने लगे तथा वे तत्कालीन प्रभावी अंतरराष्ट्रीय विचारों एवं गतिविधियों से अवगत हुए। धीरे-धीरे राष्ट्रवादी चिंतक यह महसूस करने लगे कि उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद एक अंतरराष्ट्रीय चरित्र का शासन है तथा इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। साम्राज्यवाद-विरोधी राष्ट्रवादी विचारधारा के उदय एवं विकास के फलस्वरूप राष्ट्रवादी विदेश नीति का दृष्टिकोण निर्मित हुआ।

1878 के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू अंग्रेजों ने अनेक विस्तारवादी अभियान किए, जिनका राष्ट्रवादियों ने तीव्र विरोध किया। इन अभियानों में सम्मिलित थे-दव्तीय अफगान युद्ध, 1882 में इंग्लैंड दव्ारा मिश्र में कर्नल अराबी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को कुचलने के लिये सेनाएं भेजना। 1885 में बर्मा का कंपनी (संघ) साम्राज्य में विलय, 1890 के दशक में रूस के प्रसार को रोकने के लिये उत्तर पश्चिम में किए गए विभिन्न प्रयास। राष्ट्रवादियों ने उग्र साम्राज्यवाद के स्थान पर शांति की नीति अपनाये जाने की वकालत की। 1897 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सी. शंकरन नायर ने कहा ”हमाारी वास्तविक नीति शांति की नीति है।”

इस प्रकार 1880-1914 के दौरान उभरती विचारधारा थी-उपनिवेशवादी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे राष्ट्रों से घनिष्ठता। जैसे रूस, आयरलैंड, मिस्र, तुर्की, इथियोपिया, सूडान, बर्मा, अफगानिस्तान एवं एशिया समर्थक भावनाएं।

राष्ट्रवादियों ने प्रथम विश्व युद्ध में इस उम्मीद के साथ ब्रिटेन का समर्थन किया कि वह युद्ध के उपरांत भारत में भी लोकतंत्र के उन सिद्धांतों को लागू करेगा, जिसके लिए वे संघर्षरत थे। युद्ध की समाप्ति के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया कि प्रस्तावित शांति सम्मेलन में उसे भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। 1920 में कांग्रेस ने भारतीयों से अपील की कि वे पश्चिम में लड़ने हेतु जाने वाली सेनाओं में सम्मिलत न हों। 1925 में कांग्रेस ने सन-यात-सेन के नेतृत्व में चल रहे चीन के राष्ट्रवादी आंदोलन के दमन हेतु भारतीय सेना को भेजे जाने की कड़ी आलोचना की।

1926-1927 में जवाहरलाल नेहरू यूरोप गए, जहां उन्होंने समाजवादियों एवं अन्य वामपंथी नेताओं से संपर्क स्थापित किया। इससे पहले दादा भाई नौरोजी ने समाजवादी कांग्रेस के हेग सम्मेलन में भाग लिया। 1927 में जवाहरलाल नेहरू पीड़ित राष्ट्रवादियों के ब्रुसेल्स में आयोजित सम्मेलन में शामिल हुए तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व एवं क्रांतिकारियों ने किया था। ये राष्ट्रवादी राजनीतिक एवं आर्थिक साम्राज्यवाद के चुंगुल में जकड़े हुए थे। इस सम्मेलन में जवाहरलाल नेहरू अल्बर्ट आंइस्टीन, श्रीमती सन यांत सेन, रोलैंड रोमा एवं जार्ज लैंसबरी के साथ अध्यक्ष चुने गए। नेहरू अपने यूरोप प्रवास के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंतरराष्ट्रीय चरित्र से परिचित हुए। नेहरू लीग की साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों से संपर्क बनाये रखने के लिये विदेश विभाग की स्थापना की। 1927 में जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ की यात्रा की तथा इस समाजवादी राष्ट्र की उपलब्धियों से वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने रूस को साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक विशाल ताकत के रूप में देखा।

1930 का दशक, यूरोप में फांसदीवाद के उदय एवं उसके विरुद्ध संघर्ष का काल था। राष्ट्रवादियों ने निष्कर्ष निकाला कि साम्राज्यवाद एवं फासीवाद पूंजीवाद के ही दो अंग हैं। राष्ट्रवादियों ने विश्व के विभिन्न भागों, तथा इथियोपिया, स्पेन, चीन तथा चेकोस्लोवाकिया में चल रहे फासीवाद विरोधी आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन प्रदान किया। 1939 में अपने त्रिपुरी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन की फासीवाद समर्थक नीति से खुद को पृथक घोषित कर दिया। 1939 में राष्ट्रवादियों ने जापान दव्ारा चीन पर किए गए आक्रमण को निंदनीय बताया। कांग्रेस ने डॉ. एम. अटल के नेतृत्व में एक चिकित्सा मिशन (लक्ष्य) भी चीनी सशस्त्र सेनाओं की सहायता के लिये चीन भेजा।

फिलिस्तीन के मुद्दे पर कांग्रेस ने फिलिस्तीनियों का समर्थन किया। यद्यपि उसने यहूदियों के प्रति भी सहानुभूति जताई। उसने मांग की कि फिलिस्तीनियों को उनके स्थानों से विस्थापित न किया जाए तथा इस मुद्दे को फिलिस्तीनी एवं अरब आपस में दव्पक्षीय सहयोग दव्ारा हल करें तथा पश्चिम को इस मसले पर हसतक्षेप न करने दें। कांग्रेस ने फिलिस्तीन के विभाजन का भी विरोध किया।

स्वतंत्रता के उपरांत भारत ने तत्कालीन शीत युद्ध तथा विश्वव्यापी गुटबंदी से दूर रहते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनायी। उसकी विदेश नीति गुट-निरपेक्षता की नीति पर आधारित थी तथा शीघ्र ही भारत विश्व के राष्ट्रों के मध्य गुट-निरपेक्षता की नीति का अगुआ बन गया।

प्रमुख विचार

  • आखिरकार यह कठोर तथ्य हमारी समझ में आने लगा है कि जब तक भारत स्वायत्त शासन प्राप्त नहीं कर लेता, उसकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो सकता।

-डी.पी. खेतान

  • गांधी जी और कांग्रेस को यह बताने में कोई बुराई नहीं है कि एक सम्मानजनक समझौते की संभावनाओं का पता लगाने का समय आ गया है। हम सभी को शांति चाहिए।

-खेतान

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