इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 24 for Uttar Pradesh PSC Exam

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Naitik Manyata
नैतिक मान्यताएं
कर्म सिद्धांतपुरुषार्थवर्णाश्रम धर्मसंस्कारऋण
नैतिकता के क्षेत्र में कार्य सिद्धांत को कर्म सिद्धांत कहा जाता है (जैसा कर्म-वैसा फल)
पुनर्जन्म सिद्धांत
जिसको फल नहीं मिला है पुनर्जन्म होगा।कर्म सिद्धांत को सही साबित करने के लिएआत्मा की अमरता की धारणा है
Dharnae
धारणाएं
ऋणपुण्यपाप
स्पाूंर्ण विश्व में एक नैतिक व्यवस्था विद्यमान है उसी के अनुरूप सभी नैतिक प्रश्नों का निर्धारण है।जो अच्छे कर्म या सदगुण है, शुभ की प्राणित में सहायक, सत्य बोलना, माता-पिता, गुरू की सेवा, सभी प्राणियों पर दया करना।जो अशुभ के सहायक है
पूर्णत: वस्तुनिष्ठझूठ बोलना चोरी करना देवी, देवताओं का अपमान करना आदि।
Roon
ऋण
फायदानुकसानदेव ऋणऋषि ऋणपितृ ऋण
व्यक्ति अपने कर्तव्य नहीं भूलता जिस समाज में बूढ़ो के लिए सामाजिक सुरक्षा की वैक्तिक संयम न हो वहां अगली पीड़ी ही उसकी सुरक्षा का दायित्व निभा सकती है।दबाव बढ़ता है, कई बार झेलना असंभव हो जाता है।

देव ऋण प्रासंगिक नहीं।

कृषि ऋण की धारणा भी व्यक्ति को अति आज्ञाकारी होना सिखाती है विद्यार्थी को अध्यापक की तुलना में रखती है, (प्रश्न पूछने की मनाही आज्ञापालन पर बल)

व्यक्ति अपने नैतिक कर्तव्यों को न भूले सो वैदिक मीमांसा में ऋण की धारणा विकसित की गयी, व्यक्ति पर शुरू से ही 3 ऋण होते जिन्हें चुकाना उसका धर्म है, इन्हें चुकाये बिना उसे मुक्ति नहीं मिल सकती

∙ देव ऋण-ईश्वर के प्रति ऋण, विभिन्न अनुष्ठान से चुकाया जाता है।

∙ गुरू ऋण-गुरूओ आदि के प्रति ऋण उनकी आज्ञा मानना, आर्थिक सहायता करना आदि (ऋण चुकाने के उपाय)

∙ पितृ ऋण- अपने माता-पिता अन्य वरिष्ठ सदस्यों के प्रति जिम्मेदारी (बुढ़ापे/अशक्तता में उनकी सेना सहायता करना आदि)

संस्कार:-

  • 3 जन्म से पूर्व -उदाहरण गर्भाधारण (उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए)
  • 4 से 8 जन्म के बाद और शिक्षा की तेजी-5वां नामकरण, 8वां चूंढ़ाकर्म
  • 9 से 13 तक-11वां उपनयन, शिक्षा प्राप्ति से संबंधित
  • 14,15-विवाह से संबंधित/प्राणीग्रहण
  • 16- (अंतेष्टी संस्कार)

मूल्यांकन

Goodness and Badness of Sanskar
अच्छाईबुराईयां
जीवन में व्यवस्था बनी रहती हैकर्म कोड बढ़ता है।
विभिन्न उत्सवों के होने से व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में आनंद।पुरोहितों के लिए लाभकरी गरीबों के लिए कष्टकारी
समाजीकरण की प्रक्रिया व्यवस्थितव्यवस्था इतनी मजबूत है कि नवाचार और लचीलेपन की संभावना कम हो जाती है।
महिलाओं और अवर्णो के प्रति समानता की भावना नही। उदाहरण-उपनयन संस्कार
Sankar
संस्कार
वैदिक साहित्य में संस्कार यही हैजीवन की विभिन्न अवस्था
वैदिक साहित्य में कोशिश की गयी है कि व्यक्ति के जीवन को विभिन्न नैतिक व्यवस्थाओं में बांध दिया जाए जिस तरह उसकी उम्र के अनुसार 4 आश्रम बनाये गये है वैसे ही उसके जीवन को 16 अन्य चरणों में बांटा गया है जिन्हें संस्कार कहते हैं।
नैतिक मूल्य जो बार-बार अभ्यास से सदगुणों या आदत बन गये हैं।
संस्कार बनने का अर्थ है कि व्यक्ति अब यह कार्य किसी निर्णय प्रक्रिया के आधार पर ना बल्कि बिना सोचे विचारे आदत के करेगा।

जैसे-स्टेज (चरण) 1 बच्चे का माता-पिता के पैर छूना (बाहरी दवाब के कारण) ।

स्टेज 2 बाहरी दबाव लेकिन आदत नहीं पड़ी है-हर ऐसी स्थिति में सोचकर निर्णय करना और फिर पैर छूना।

स्टेज 3 संस्कार की स्थिति जैसे कोई बड़ा दिखे बिना किसी सोच ′ विचार के उसके पैर छू लेना।

Varnashram Dharma
वर्णाश्रम धर्म
वर्णआश्रम
ब्रह्यमचर्य 25गृहस्थ 25 - 30वाणप्रस्थ 50 - 75सन्यास 75 …
इद्रिय संयम

अध्ययन विभिन्न

कौशल सीखना

विवाह संतान की उत्पत्ति, जीवन के सामान्य सुख भोग (नैतिकता की परीधी में रहते हुये)संयम पूर्वक जीते हुये अन्य व्यक्तियों को नैतिक जीवन के लिए मार्ग दर्शन देना। आत्मचिंतन ईश्वर चिंतन करते रहना। निस्वार्थ, समाज सेवा करना।75 वर्ष के बाद (सिर्फ मोक्ष प्राप्ति का उद्देश्य भिक्षा माँगना-जीवन रहने का एकमात्र तरीका मानव मात्र के कल्याण का प्रयास करना।

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