इंडियन (भारतीय) वेर्स्टन (पश्चिमी) फिलोसोपी (दर्शन) (Indian Western Philosophy) Part 9 for Uttar Pradesh PSC Exam

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सुकरात

सुकरात का मूल उद्देश्य ऐसी सार्वभौमिक नीति मीमांसा की स्थापना करना था जो विभिन्न व्यक्तियों या देश काल की परिस्थतियों से प्रभावित न हो वे सोफिस्टो दव्ारा प्रचारित आत्मनिष्पक्षतावादी और सापेक्षतावादी नीति मीमांसा से असंतुष्ट थे क्योंकि उसके आधार पर किसी भी कार्य को नैतिक या अनैतिक ठहराया जा सकता है, सुकरात अपने बुद्धिवादी तेवर के अनुरूप नीति मीमांसा में भी अनिवार्यता और निश्चियत्मकता की खोज कर रहे है।

सुकरात ने सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों को नैतिकता का प्रतिमाना माना है सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण के गुण है जो कठोर अभ्यास से विकसित होते है और व्यक्ति के भीतर यह क्षमता पैदा करते है कि वह अपनी वासनाओं या ईच्छाओं को अपने विवेक के अधीन रख सके, साहस सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण का अर्थ है भय की भावना को नियंत्रित करने का स्थायी गुण जो बार-बार ऐसी परिस्थितियों में किये गये अभ्यास से विकसित होता है।

ज्ञान:- प्रत्यक्षवाद, बुद्धिवाद-

सुकरात ने ज्ञान को प्रमुख सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण माना है।किन्तु ज्ञान का अर्थ जानकारी रखना नही है, ज्ञान का वास्तविक अर्थ है, अशुभ शुभ, सत्य असत्य, न्याय अन्याय, कर्तव्य अकर्तव्य में भेद कर पाने की क्षमता। ज्ञान सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण तब बनता है जब वह चेतना का हिस्सा नहीं रहता। अंतरीकृत हो जाता है और प्रत्येक आचरण से व्यक्त होने लगता है सभी नैतिक बुराईयां अज्ञान से ही पैदा होती है क्योंकि ऐसे व्यक्ति शुभ अशुभ में भेद करना नही जानते, समाज को नैतिक बनाने का एक ही रास्ता है और वह यह है कि कठोर अभ्यास दव्ारा व्यक्तियों में ज्ञान सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण का विकास किया जाए।

विभिन्न सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों के सबंध में स्पष्ट करने के लिए सुकरात ने “सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुणों की एकता का सिद्धांत” प्रस्तुत किया है इसके अनुसार ज्ञान एकमात्र सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण है शेष सदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू गुण, साहस, संयम, न्याय, विवेक आदि

सोफिस्टो

सोफिस्ट नीति मीमांसा आत्मनिष्ठतवाद पर बल देती है, सबसे प्रसिद्ध सोफिस्ट विचारक प्रोटोगोरस का कथन होम मेनसुरा अर्थात मनुष्य ही सभी वस्तुओं का मापदंड है इस आत्मनिष्ठता का अधार है, यहाँ मनुष्य का अर्थ व्यक्ति से है नीति मीमांसा में इस कथन का तात्पर्य यह हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार तय करेगा कि क्या अशुभ है और क्या शुभ। इस दृष्टि से यह विचार सापेक्षवाद को भी स्वीकार करता है यह विचार देने के पीछे एक मूल कारण यह था कि सोफिस्टों के पीछे हूमन (मानव) विभिन्न नगर राज्यों में बंटा था और उनके नैतिक मानपदंड और कानून परस्पर भिन्न और विरोधी थे। सोफिस्ट अपनी नीति मीमांसा में ऐसी संभावना छोड़ना चाहते थे कि विभिन्न नैतिक मानदंडो को समायोजित किया जा सके।

इस आत्मनिष्ठता का चरम स्तर गार्जियस के कथनों में दिखता है। जहाँ वे वस्तुनिष्ठता का विरोध करते है-

  • वस्तुनिष्ठ सत्य है ही नहीं।
  • अगर है भी तो हम जान नही सकते।
  • अगर जान ले तो किसी को बता नहीं सकते।

सोफिस्टो पर यह भी आक्षेप है कि उन्होंने नैतिक मानदंडो की व्याख्या आदर्शो की बजाए व्यवहारिक स्तर पर की जिसमें परिणाम स्वरूप शक्तिशाली लोगों में नैतिक सिद्धांत स्थापित हुये जैसे-थ्रेसी मेक्स ने न्याय की परिभाषा देते हुये कहा शक्तिशाली का हित ही न्याय है, एक अन्य सोफिस्ट कैलीकल्स ने भी इसका समर्थन किया, इसका अर्थ है कि शक्तिशाली लोग अपने हितों के अनुसार अपनी बात मनवाते है और कमजोर लोगों को उनका पालन करना पड़ता है, प्लेटों ने थ्रेसीमेक्स इस सिद्धांत को खारिज किया है।

सोफिस्टो ने प्राय: ईश्वर तथा पारलोकिक सत्ताओं को खड़ा किया और तत्व मीमांसा की तरह नीति मीमांसा की तरह ईहलोकिक आधारों पर सही किया। यह सही है कि उनकी नीति मीमांसा में वस्तुनिष्ठता में गहराई की लेकिन उन्हें यह श्रेय अवश्य है कि उन्होंने पहली बार मानववादी और उपयोगिता वाद सुखवादी तथा परिणाम सापेक्षवादी नीति मीमांसा का मार्ग स्पष्ट किया।

सोफिस्टो के मूल ग्रंथ उपलब्ध नही है प्राय: प्लेटों के ग्रंथों से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि जानकारी प्लेटो के अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित हुयी हो।

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