Science and Technology: Applications of Radioisotopes: Medicine

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रेडियो समस्थानिकों के अनुप्रयोग (Applications of Radioisotopes)

अनुसंधान रिएक्टरों से उत्पन्न तथा ईंधन प्रसंस्करण के उपरांत पाये जाने वाले रेडियो समस्थानिकों का प्रयोग चिकित्सा, कृषि उद्योग तथा कई अन्य क्षेत्रों में किया जाता है-

चिकित्सा (Medicine)

रोगों की पहचान अथवा निदान के लिए समस्थानिकों और विकरण तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। नाभिकीय चिकित्सा और रेडियो इम्यूनोएस केन्द्रों की स्थापना की जा रही है जिन पर निगरानी रखने का कार्य परमाणु ऊर्जा विभाग दव्ारा किया जाएगा। ये केन्द्र गामा कैमरों के प्रयोग के साथ-साथ ऐसे समस्थानिकों का गहन अध्ययन भी करेंगे। इस क्षेत्र में भाभा परमाणु अनसुंधान केन्द्र के अधीन कार्यरत विकिरण औषधि केन्द्र (Radiation Medicine Centre, RMC) दव्ारा उत्कृष्ट कार्य कर रहा है। इसके उद्देश्यों में निम्नांकित प्रमुख हैं:

  • नाभिकीय चिकित्सा संबंधी अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों पर विशेष बल।
  • रोगों के निदान और उपचार में रेडियो समस्थानिकों तथा विकिरण तकनीक के प्रभावपूर्ण प्रयोग पर विशेष बल।
  • रोगियों से संबंधित सेवाओं का आरंभ।
  • विशेष शिक्षा और प्रशिक्षण की उपलब्धता दव्ारा नाभिकीय चिकित्सा में मानव संसाधन विकास पर बल।

इस प्रकार डिब्रूगढ़ और बंगलौर स्थित केन्द्रों से ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। वर्तमान में देश भर में लगभम 500 ऐसी प्रयोगशालाएं कार्य करती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन विकिरण एवं रेडियो समस्थानिक बोर्ड का मानक विश्व के अन्य किसी भी स्थान के समरूप हैं। बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता क्षेत्रीय केन्द्र में लगभग 5000 से अधिक रोगी प्रतिवर्ष स्कैनिंग में 4 डमट रैखिक त्वरित तकनीक दव्ारा लाभान्वित होते हैं। बोर्ड विकिरण बन्ध्याकरण सुविधा भी प्रदान करता है। कैंसर अनुसंधान एवं चिकित्सा के क्षेत्र में रेडियों समस्थानिकों का प्रयोग अत्यंत लोकप्रिय हो गया है।

  • अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी समर्थित समन्वित अनुसंधान कार्यक्रम (Coordinated Research Project, CRP) वर्तमान में भारत तथा अन्य विकासशील देशों में चलाये जाते है। इसके अधीन दिसंबर 1993 से एक विशेष कार्यक्रम का निरूपण किया गया है जो स्तन कैंसर के रूढ़िगत प्रबंधन के लिए प्रदीपन और जीव प्रभाव प्रारूपों के लिए कार्यरत है।
  • कई अत्यंत सामान्य रेडियो समस्थानिकों का प्रयोग नाभिकीय चिकित्सा में किया जाता है, जिसमें कोबाल्ट-60, टेक्नीशियम-99, आयोडीन-131, क्रोमियम-53, फास्फोरस-32, आयरन-59, सीजियम-137 आदि। दिल्ली स्थित नाभिकीय चिकित्सा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान 1960 अपने उद्भव के साथ ही मुख्य रूप्ज्ञ से गामा कैमरों पर कार्य कर रहा है। हाल ही में एक नई विकिरण तकनीक उपकरण का विकास किया गया है जिसे रक्त सूचक (Blood Indicator) कहा गया है।

कृषि (Agriculture)

  • चिकित्सा रेडियो समस्थानिकों की भांति कृषि क्षेत्र में भी अधिक उत्पादन तथा फसलों की नई प्रजातियों के विकास के लिए भी रेडियो समस्थानिकों का प्रयोग किया जाता है। रेडियो समस्थानिकों का प्रयोग खाद्य पदार्थ के प्रदीपन तथा फलों को पकाने में भी किया जाता है। भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के फसल सुधार कार्यक्रम के अंतर्गत दलहन, तिलहन तथा जूट की कई उन्नत प्रजातियों का विकास किया गया है। वस्तुत: केन्द्र दव्ारा विकसित की गई विकिरण तकनीक व्यावसायिक क्षेत्र में प्रवेश कर गई है। पौधों के पोषण में रेडियो समस्थानिकों पर आधारित नई खोजों से उर्वरकों की प्रभावशीलता बढ़ गई है। नाभिकीय नमी घनत्व पैमाने दव्ारा मृदा की नमी का अनुश्रवण कर जल संसाधन अनुकूलतम उपयोग किया जा सकता है। रेडियो समस्थानिकों का प्रयोग नाइट्रोजन के जैविक स्थिरीकरण तथा कीटनाशकों के कुशल प्रयोग में भी किया जाता है। खाद्य परिरक्षण के लिए विकिरण अब तक महत्वपूर्ण साधन है। भारत सरकार दव्ारा खाद्य परिरक्षण को 1998 में वैधानिक मान्यता प्रदान की गई थी। इसके बाद से प्रमुख खाद्य पदार्थो का परिरक्षित किया जाने लगा है। मुख्य रूप से ऐसे खाद्य पदार्थों में समुद्री उत्पाद शामिल हैं।
  • तकनीकी रूप से खाद्य परिरक्षण में गामा किरणें अथवा एक्स-किरणें अथवा त्वरित इलेक्ट्रॉनों का प्रयोग होता है। प्रदीपन के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले दो सबसे महत्वपूर्ण रेडियो समस्थानिक कोबाल्ट-60 और सीजियम-137 हैं। खाद्य प्रदीपन यदि नियंत्रित रूप में किया जाये तो खाद्य पदार्थ रेडियोधर्मी नहीं बनते। परिरक्षित खाद्य पदार्थ रेडियोधर्मी खाद्य पदार्थ से इस रूप में भिन्न होता है कि खाद्य पदार्थ जो निरंतर कुछ विकिरणों से प्रसंस्कृत होते हैं, परिरक्षित खाद्य पदार्थ कहलाते हैं जबकि रेडियोधर्मिता के साथ किसी आकस्मिक अनावरण दव्ारा खाद्य पदार्थ प्रदूषित हो जाता है। वैज्ञानिक यह सिद्ध कर चुके हैं कि परिरक्षित पदार्थों में पौष्टिकता बनी रहती है।

उद्योग (Industry)

रेडियो समस्थानिक तथा विकिरण तकनीक का प्रयोग उद्योगों तथा जल संसाधनों के प्रबंधन में भी किया जाता है। इस प्रकार के समस्थानिक भारत में अनुसंधान रिएक्टरों दव्ारा उत्पादित किये जाते हैं तथा पदार्थों की क्रिस्टली संरचना और नाभिकीय अन्वेषण की जानकारी प्राप्त करने में प्रयुक्त होते हैं। औद्योगिक क्षेत्र में प्रयोग में लाये जाने वाले रेडियो समस्थानिकों में कोबाल्ट-60 और रिडियम-192 सबसे महत्वपूर्ण हैं।

भारत में रेडियो समस्थानिकों की आपूर्ति विकिरण और रेडियो समस्थानिक तकनीकी बोर्ड है। बोर्ड के अनुसार, कई ऐसे क्षेत्रों में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है:

  • सुपरकम्प्यूटर में प्रयुक्त समानान्तर संगणन तथा प्रसंस्करण तकनीक।
  • अतिशुद्ध पदार्थों की विशेषताओं की पहचान।
  • अवयव प्रतीकों के लिए स्फुरणग्राफी तकनीक (Scientigraphic Technique) ।
  • गंदे जल के कचरे का निस्तारण।
  • समुद्री जल और पृष्ठीय जल की लवणता की जांच।
  • बाँधों, नहरों और सुरंगों का निस्पंदन (Seepage) अध्ययन।

पर्यावरण (Environment)

पर्यावरण संरक्षण विश्व की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने संयुक्त रूप से एक पांच वर्षीय अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की पहल 1978 में ही की थी। इस उद्देश्यों मेंं निम्नांकित प्रमुख थे:

  • शुद्ध पेय जल की जांच।
  • समुद्री प्रदूषण तथा हानिकारक शैवालवृद्ध का प्रबंधन।
  • स्पष्ट एवं ऊर्जा दक्षता उत्पादन प्रक्रिया।

अत्यधिक रुचि प्रदर्शित करते हुए भारत ने इस कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी दिखाई तथा जनशक्ति, पर्यावरण बचाव से संबंधित विभिन्न आंकड़ों का संग्रहण, अपशिष्ट संरक्षा प्रबंधन तथा समन्वित अनुसंधान में योगदान दिया। इसके अतिरिक्त, भारत ने अपशिष्ट प्रबंधन के लिए ढांचा विकसित किया तथा आपसी हित के लिए भूमंडलीय सहयोग के लिए प्रयास कर रहा है।

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