Science and Technology: Biotechnology in Agriculture and Seeds

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जैव प्रौद्योगिकी के अनुपयोग (Applications of Biotechnology)

कृषि के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology in Agriculture)

बीज (Seeds)

पराजीनी फसलों से नुकसान (Disadvantages of Transgenic or Genetically Modified Crops)
  • पर्यावरणविदों के अनुसार आस-पास के पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के संदर्भ में पराजीनी फसलों का उत्पादन आवश्यक नहीं है। इनके अनुसार ये पौधे मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव छोड़ सकते हैं, अत: पराजीनी पौधों से संभावित खतरों का अध्ययन अति आवश्यक है। साथ ही, ध्यान देने योग्य बात यह है कि पराजीनी फसलों पर कार्य बहुराष्ट्रीय निजी कंपनियाँ (MNCs) कर रही हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना है न कि किसानों में खुशहाली लाना।
  • ये पराजीनी फसलें पर्यावरण में संक्रमण करके वनस्पति और पर्यावरण को प्रभावित कर सकती हैं। जीन के साथ छेड़छाड़ के परिणामस्वरूव एलरजैस (एलर्जी उत्पन्न करने वाले तत्व) तथा टॉक्सिन के उत्पन्न होने की संभावना रहती है जो एक पौधे से दूसरे पौधे में स्थानांतरित हो सकते है।
  • पराजीनी फसलों से कीटनाशी प्रोटीन्स का उत्पादन होता रहा है। खाद्य श्रृंखला के माध्यम से ये विषाक्त तत्व अन्य जीव-जन्तुओं तक पहुँच सकते हैं व पारिस्थितिकीय संतुलन बिगड़ सकते हैं।
  • पराजीनी फसलों से परागकण उड़कर खर-पतवारों व अन्य गैर- लक्षित प्रजातियों पर जा सकते हैं, जिससे खर-पतवारों में कीटनाशक प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न हो सकती है तथा इससे किसानों के लिए इन खर-पतवारों को नियंत्रित करना दुष्कर कार्य होगा।
  • पराजीनी फसलें टर्मिनेटर टेक्नोलॉजी से विकसित बीजों से उत्पन्न होती हैं। इस बात की संभावना बनी रहती है कि इन पराजीनी फसलों से परागकण उड़कर अन्य पौधों व फसलों को अपनी चपेट में ले जाएँ तथा गैर-टर्मिनेटर बीज भी टर्मिनेटर बनकर कहीं नष्ट न हो जाएँ।

अत: इस बात की आवश्यकता है कि इन पराजीनी फसलों को विकसित करने के साथ-साथ इनके संभावित दुष्प्रभावों पर भी गहन विचार-विमर्श किया चाहिए।

बीटी कपास (Bt Cotton)

बीटी कपास आनुवांशिक रूप से परिवर्तित कपास है जिसमें बैसिलस थूरिनजिएनसिस नामक बैक्टीरिया का ‘क्राई’ नामक जीन डाला जाता है, जिससे पौधा स्वयं कीटनाशक प्रभाव उत्पन्न करने लगता है और पौधों पर कीटनाशक दवाइयों को छिड़कने की आवश्यकता नहीं रहती। बैसिलस थूरिनजिएनसिस एक भूमिगत बैक्टीरिया है जो एन्डोप्रोटीन नामक क्रिस्टल प्रोटीन का निर्माण करता है। उल्लेखनीय है कि क्रिस्टल प्रोटीन कीटाणुओं को नष्ट कर देता है।

आनुवांशिक रूप से परिवर्तित ‘बीटी कपास’ की तीन किस्मों मैक-12, मैक-162 और मैक-184 के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति भारत सरकार ने मार्च, 2002 में प्रदान की थी। केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय की ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी’ दव्ारा मंजूर की गई बीटी कपास की इन किस्मों को बहुरराष्ट्रीय कंपनी ‘मोनासांटो’ की भारतीय अनुषंगी कंपनी ‘महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी (म्हाइको) ’ ने विकसित किया है। इन बीजों के व्यावसायिक उपयोग की अनुमति कुछ शर्तों के साथ इस कंपनी को प्रदान की गई है, जो निम्नलिखित हैं-

  • बीज अधिनिमय की शर्ते पूरी करना।
  • बीज पर यह इंगित करना कि यह आनुवांशिक रूप से परिवर्तत बीज है।
  • बीजों के वितरकों व बिक्री के डाटा को जी. ई. ए. सी. (G. E. A. C.) को उपलब्ध कराना।
  • बोये गये क्षेत्रफल की जानकारी उपलब्ध कराना।
  • लगातार तीन वर्ष तक यह रिपोर्ट देना कि इन किस्मों में किसी प्रकार की बीमारी के बैक्टीरिया तो नहीं पनप रहे हैं।
  • बीटी कपास वाले खेत की बाह्य सीमा पर गैर-बीटी कपास उगाई जाए ताकि इसके पड़ने वाले प्रभावों का निरीक्षण किया जा सके।
बीटी कपास से लाभ (Advantages of Bt Cotton)
  • कपास के उत्पादन में वृद्धि, जिससे किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।
  • पौधों में स्वयं ही कीटनाशक प्रभाव पैदान करने की क्षमता, जिससे कीटनाशक दवा के छिड़काव की आवश्यकता नहीं होती है।
  • कीटनाशकों के उपयोग में कमी से पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहन।
  • रोग या महामारी से फसलों के खराब होने की संभावना कम।
  • बीटी कपास का उपयोग कीट नियंत्रण की अन्य विधियों के साथ भी संभव।
बीटी कपास के नुकसान (Loss of Bt Cotton)
  • कीटों में प्रतिरोधी क्षमता उत्पन्न होने जाने से बीटी कपास के साथ-साथ अन्य फसलों को भी नुकसान पहुँच सकता है।
  • इस तरह की फसलों के उत्पादन की लागत बहुत अधिक होती है।
गोल्डन राइस (Golden Rice)
  • गोल्डन राइस वस्तुत: वैज्ञानिकों दव्ारा विकसित धान की एक लाभप्रद किस्म है, जिसे धान को विटामिन ‘ए’ से भरपूर बनाने के लिए इसमें अन्य जीवों का जीन डालकर इसके जीनोम को बदल दिया गया है। प्राकृतिक रूप से पैदा किए गए चावल से ‘बीटाकैरोटीन’ का अभाव होता है जिसे हमारा शरीर बिटामिन ‘ए’ के कणों में परिवर्तत कर देता है, जिन्हें ‘रेटिनॉल’ कहा है। यह धान की भूसी में पाया जाता है। अभी तक ऐसा कोई भी चावल पैदा नहीं किया गया जिसके दानों में विटामिन ‘ए’ हो।
  • गोल्डन राइस को विकसित करने के लिए चार बाह्य जीनों का इस्तेमाल किया गया, जिनमें से दो डैफोडिल के तथा दो किसी सूक्ष्म जैविक के थे। इस नए विकसित किए गए चावल में ‘बीटाकैरोटीन’ होने के कारण इसका रंग सुनहरा पीला हो जाता है।

जैव कीटनाशक (Bio-Fertilizer)

  • फसल कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम के लिए भारत में सामान्यत: परंपरागत तरीकों को अपनाया जाता है। परंपरागत तरीकों में यहाँ रासायनिक या अकार्बनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। जैव कीटनाशकों का प्रमुख तत्व है- ‘बैसिलस थ्यूरिजाइएन्सिस’ । सामान्यत: जैव कीटनाशकों में प्राकृतिक कीटों एवं जैव प्रौद्योगिकी में विकसित सूक्ष्म जीवों का उपयोग किया जाता है जो कीटों को नष्ट करते हैं। अथवा उनके प्रजनन को प्रभावित करते हैं। जैव कीटनाशक सामान्य रूप से शाकाहारी (Herbivarous) जीवों को ही प्रभावित करते हैं। माँसाहारी कीटों को ये केवल नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
  • कई बार इन जैव कीटनाशकों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के दुष्प्रभावों को भी जन्म देता है। जैव कीटनाशक जैव कीट नियंत्रक कीटों की अंडे देने की क्रिया को प्रभावित करके इनकी प्रजनन क्षमता को कम कर देते हैं। बायोडिग्रेडेशन होने की वजह से ये कीटनाशक पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
उद्योग के क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology in Industry)

स्वास्थ्य क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी के बहुआयामी उपयोगों के साथ-साथ जैव प्रौद्योगिकी की आवश्यकता एवं अनुप्रयोगों ने खाद्यान्न एवं पेय उद्योग उपयोगिता में भी अप्रत्याशित सफलता अर्जित की है। विगत कुछ वर्षों में मीठे एवं शर्करा रहित (Sugar Free) पदार्थों की मांग में अत्यधिक वृद्धि हुई है, जिसने उद्योग क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग को विस्तारित कर दिया है। जैव प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके एक कैलोरी की कम मात्रा वाले मीठे पदार्थ एस्पार्टेम (Aspartame) का निर्माण किया गया है। इसी तरह ‘थॉमेटोकोकस डेनिएल’ (Thau-matococcus Danielli) नामक पौधे से थॉमेटिन (Thaumtin) नामक पदार्थ बनाया गया है जिसे अब तक निर्मित ऐसे सभी पदार्थों में सर्वाधिक मीठा कहा गया है।

भारत में जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology in India)
  • वर्ष 1982 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के 69वें अधिवेशन में प्रथम बार जैव प्रौद्योगिकी के महत्व पर जोर दिया गया। परिणामस्वरूप 1982 में ही भारत सरकार दव्ारा ′ राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी बोर्ड (National Biotechnology Board) का गठन किया गया, जिसका उद्देश्य देशभर में जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियों का समन्वय करना एवं उन्हें बढ़ावा देना था। इसके पश्चात्‌ वर्ष 1986 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय में एक अलग जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology) की स्थापना की गई।
  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग दव्ारा जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल तथा नीतिगत मुद्दों से संबंधित मार्गदर्शी सिद्धांत बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त विभााग मुख्य रूप से आण्विक औषधि, कृषि एवं पादप जैव प्रौद्योगिकी, जैव सूचना प्रणाली, जीनोमिक्स, जैव इंस्टूमेंटेशन, जैव कीटनाशकों, जैव ईंधनों, मानव संसाधन विकास और पर्यावरण एवं जैव विविधता को शामिल करते हुए आधारभूत एवं प्रयोगोन्मुखी जैव प्रौद्योगिकी विधियों पर कार्य कर रहा है। साथ ही साथ प्रौद्योगिकी का व्यावसायीकरण और जैव उत्पादों के विपणन के लिए सहभागिता करना भी जैव प्रौद्योगिकी विभाग की गतिविधियों के ही भाग हैं।

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