Science and Technology: Electronic Governance and Internet Telephony

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इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन (Electronic Governance)

सूचना प्रौद्योगिकी के प्रशासकीय अनुप्रयोगों को सामूहिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन कहते हैं। इन अनुप्रयोगों का उद्देश्य सरल, नैतिक, उत्तरदायी, अनुक्रियाशील तथा पारदर्शी (Simple, Moral, Accountable, Responsive and Transparent, SMART) प्रशासन की स्थापना है। दसवीं योजना के लिए अभिसरण एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन पर गठित कार्य समूह ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि निष्क्रिय सूचना एवं सेवा प्रदान करने वाली नीतियों को नागरिकों के साथ सक्रिय संबंधों की स्थापना की संकल्पना से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए। भारत में सफल इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन के लिए रिपोर्ट में कई आवश्यक तत्वों का उल्लेख किया गया है:

  • व्यापक स्तर पर कम्प्यूटर सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  • सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्थानीय भाषाओं के प्रयोग की क्षमता का विकास।
  • विभिन्न प्रशासकीय इकाइयों की मानसिकता में परिवर्तन का प्रयास।
  • विभिन्न प्रकार की सूचनाओं का मानकीकरण।
  • पर्याप्त अवसरंचनाओं का निर्माण और विकास।
  • बेहतर प्रशासन के लिए ज्ञान के नेटवर्क का विस्तार।

भारत में कार्यरत राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी कार्य बल ने नागरिक सूचना प्रौद्येगिकी अन्त: फलक (Citizen-IT Interface) की पहचान कर समाज के विभिन्न वर्गों एवं स्तरों में प्रौद्योगिकी के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया है। कार्य समूह ने इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन एवं अभिसरण तकनीकों के अनुप्रयोगों के संदर्भ में विशिष्ट मार्गदर्शन प्रदान किये हैं। इनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है:

  • सूचना विज्ञान एवं इलेक्ट्रॉनिक्स की सहायता से सरकार दव्ारा अभिसरण के अनुप्रयोगों की संवृद्धि के लिए एक समन्वयकारी संस्था के रूप में कार्य करने की प्राथमिकता।
  • तकनीकों के हस्तांतरण तथा किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही प्रौद्योगिकी के विकास में सार्वजनिक धन के प्रयोग की वांछनीयता।
  • सरकार दव्ारा उच्च बैंडविथ तथा बेहतर सेवा प्रदान करने के लिए कार्यरत संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण।
  • विभिन्न सरकारी परियोजनाओं एवं इलेक्ट्रॉनिक्स की युक्तियों का परीक्षण।
  • सार्वजनिक धन से क्रियान्वित परियोजनाओं के तहत अंकीय विभेद को कम करने का प्रयास।
  • विभिन्न पक्षों के मानकीकरण के कार्य को त्वरित गति।
  • विभिन्न परियोजनाओं के क्रियान्वयन के माध्यम से ज्ञान-आधारित तथा सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विकास से युक्त समाज की स्थापना।
  • दसवीं योजना में कुल परिव्यय 2680 करोड़ रुपए निर्धारित है जिसमें 1830 करोड़ रुपए अभिसरण और 850 करोड़ रुपए इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन के लिए निर्धारित हैं।

राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन योजना (National Electronics Administration Scheme)

सरकार दव्ारा ई-प्रशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए हाल ही में एक राष्ट्रीय योजना क्रियान्वित की गई है।

इसकी क्रियान्वयन रणनीति में निम्नांकित महत्वपूर्ण पक्ष शामिल किए गए हैं:

  • केन्द्र तथा राज्य स्तर पर विभिन्न विभागों में ई-प्रशासन से संबंधित अवसरंचनाओं की उपलब्धता।
  • भारत निर्माण तथा ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसे बड़े कार्यक्रमों को इलेक्ट्रॉनिक प्रशासन की तकनीकों का समर्थन।
  • राज्य स्तर पर अधिकतम पांच परियोजनाओं में ई-प्रशासन का सहयोग।
  • केन्द्र प्रायोजित योजना के रूप में ई-प्रशासन का विस्तार।
  • सार्वजनिक-निजी साझेदारी को प्रोत्साहन।

राष्टीय योजना के क्रियान्यवन के लिए आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिए हैं। इनमें एक ऐसे समूह की स्थापना भी शामिल है, जो प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में कार्य करेगी।

इस समूह में सरकार के विभिन्न विभागों, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग तथा योजना आयोग के प्रतिनिधि तथा कई विशषेज्ञ भी शामिल होंगे। इस समूह का कार्य योजना के कार्यान्वयन पर निगरानी रखना भी होगा। इसी प्रकार, संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय ई-प्रशासन सलाहकार समूह भी गठित किया गया है जो इस विषय पर महत्वपूर्ण सुझाव देगा। योजना के तहत किए जा रहे प्रयासों में निम्नांकित को भी अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।

  • सामान्य सेवा केन्द्रों की स्थापना (Establishment of Gammon Service Centres) : भारत के 6 लाख गांवों में ई-प्रशासन के विस्तार के लिए 1 लाख ऐसे केन्द्रों की स्थापना की जाएगी। इसके दव्ारा सरकारी तथा निजी एजेंसियों दव्ारा एकीकृत सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। 4 वर्षों की अवधि वाली इस परियोजना पर लगभग 5742 करोड़ रुपये व्यय होने की संभावना है। इसमें से 856 करोड़ रुपये केन्द्र दव्ारा तथा 793 करोड़ रुपये राज्यों दव्ारा दिए जाएंगे। जबकि शेष राशि निजी क्षेत्र की सहभागिता से प्राप्त की जाएगी। त्रि-स्तरीय इस परियोजना का क्रियान्वयन निम्न रूप में किया जाएगा:
    • पहले चरण में ग्रामीण स्तर पर उद्यमशीलता के विकास का प्रयास।
    • दूसरे अथवा मध्यवर्ती चरण में सेवा केन्द्र एजेंसी बनाई जाएगी।
    • तीसरे चरण में राज्य दव्ारा एजेंसियों की स्थापना की जाएगी।
  • स्टेट वाईड एरिया नेटवर्क (State Wide Area Network, SWAN) : जैसा कि इस अध्याय में पहले कहा गया है, इस नेटवर्क के जरिए 2 मेगाविट प्रति सेकेंड के कनेक्शन उपलब्ध कराने का प्रावधान है। निकनेट के जरिए ऐसे नेटवर्क का निर्माण किया जाएगा तथा इसके लिए अवसरंचनात्मक सहयोग केन्द्रीय विभाग के माध्यम से उपलब्ध होगा।
  • राज्य सूचना केन्द्र (State Data Centres, SDC) : सरकार से सरकार, सरकार से व्यापरिक संस्थान तथा सरकार से उपभोक्ता वाली इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं की उपलब्धता के लिए इन केन्द्रों की स्थापना की जाएगी। यह आशा की गई है कि 2009 - 10 तक ऐसे केन्द्र पूर्ण रूप से कार्य करने लगेंगे।

इंटरनेट टेलीफोनी (Internet Telephony)

  • इंटरनेट पर किये जाने वाले टेलीफोन कॉल को इंटरनेट टेलीफोनी कहा जाता है। यह परिवहन परंपरागत टेलीफोन संचार मल्टीमीडिया आदि उपकरणों तथा प्रणालियों से सर्वथा भिन्न है। इस नई तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी कम कीमत और नई सेवाओं की सरल और सार्वत्रिक उपलब्धता है। भविष्य में इंटरनेट टेलीफोन की सेवा उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं दव्ारा इंटरनेट तथा टेलीफोन सुविधाओं के लिए एक ही आधारभूत संरचना प्रयोग में लाई जाएगी। इस संदर्भ में केवल सूचना-स्विचो का प्रयोग किया जाएगा जिससे आवश्यकतानुसार इंटरनेट तथा टेलीफोन की सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। बहुआयामी सूचनाओं तथा ध्वनि संकेतों के एकीकरण से बैंडविथ के बेहतर अनुप्रयोग की भी संभावना है। इस प्रणाली का उपयोग करने वालों को इसके साफ्टवेयर आधारित होने का भी लाभ मिलेगा। इंटरनेट टेलीफोनी के अवयवों में निम्नांकित प्रमुख हैं।
  • एंड डिवाइस (End Device) : इस श्रेणी में परंपरागत टेलीफोन, श्रव्य गुणों से युक्त वैयक्तिक कम्प्यूटर अथवा एकल उपयोग उपकरण सम्मिलित हैं।
  • गेटवेज (Gateways) : यदि किसी परंपरागत टेलीफोन का उपयोग किया जाता है तो उन ध्वनि संकेतों को इंटरनेट पर संप्रेषित करने के लिए इनकी संरचना में परिवर्तन किया जाता है। इसे गेटवेज कहते हैं।
  • गेटकीपर अथवा प्रौक्सी (Gatekeeper or Proxies) : इस प्रकार के अवयवों दव्ारा केन्द्रीकृत कॉल प्रबंधन सुविधा उपलब्ध होती है। इनके दव्ारा कॉल प्रवेश नियंत्रण, बैंडविथ प्रबंधन आदि सुविधाएं भी प्राप्त होती हैं।
  • मल्टीप्वांइट कॉन्फ्रेंस युूनिट (Multipoint Conference Unit) : इन अवयवों दव्ारा कई व्यक्तियों के सामूहिक वार्तालाप का प्रबंधन किया जाता है।

उपरोक्त अवयवों को हार्डवेयर अथवा साफ्टवेयर के रूप में उपयोग किया जा सकता है। साथ ही, इन्हें वैकल्पिक रूप से एकीकृत प्रणाली के रूप में भी उपयोग में लाया जा सकता है। तकनीकी दृष्टिकोण से आवाज से संबंधित समस्याएं प्रणाली के लिए व्यवधान उत्पन्न करती हैं। लेकिन इस संबंध में अनुसंधान कार्यक्रमों पर बल देकर इन समस्याओं को जल्दी से जल्दी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। भविष्य में भी यह आशा है कि इस प्रणाली को सरकारी संरक्षण प्रदान किया जाएगा। संचार के क्षेत्र में तीव्र विकास ने इस क्षेत्र में कार्य करने वाले कर्मचारियों के लिए नेटवर्क की प्रणाली को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता में भी वृद्धि की है। इसने इंटरनेट टेलीफोनी के अतिरिक्त वैयक्तिक अंकीय सहयोगी प्रणाली पर आधारित मोबाइल फोन और बेतार सेवाओं की आवश्यकता में भी वृद्धि की है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मोबाइल कर्मचारियों तथा कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों के बीच ध्वनि संकेतों के आदान-प्रदान के लिए इंटरनेट टेलीफोनी-आधारित प्रणालियों के विकास से संचार की नई क्षमताओं में वृद्धि हुई है।

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