Science and Technology: Light Detection and Ranging, LIDAR

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होलोग्राफी (Holography)

त्रिविमीय बिंब को उच्च वैषम्य पर उन्नत तुंतु वचन फिल्म दव्ारा प्राप्त करने की प्रक्रिया होलोग्राफी कहलाती है। वास्तव में इस प्रकार का चित्र होता है, जो बहुकोणीय बिंब को दर्शाता है। बिंब विवर्तन बनाने के कारण इस प्रकार के बिंब दिग्भेदक (Parallax) हो जाते हैं। इस प्रकार इसे विभिन्न कोणों से देखा जा सकता है। प्रकाश के दो तरंगदैर्ध्य के बीच बाधा करने के कारण ही संभवत: बिंब विवर्तन हो पाता है। वस्तु का प्रदीपन लेजर के प्रयोग दव्ारा ही हो पाता है। होलोग्राफी में परिशुद्धता विस्तृत रूप से अनावरण काल, लेजर की रेखा की मुटाई, आवृत्ति स्थिरता आदि घटकों पर निर्भर करती है। यह भी सुनिश्चित करना होता है कि बाधा पैटर्न में विघ्न नहीं पड़े। ये बातें होलोग्राफ के निर्माण में मुख्य समस्याएं उत्पन्न करती हैं। चिकित्सा के अतिरिक्त होलोग्राफी का प्रयोग अर्द्धचालकों तथा फोटोनिक्स उद्योग में भी होता है।

लिडार (Light Detection and Ranging, LIDAR)

यह प्रकाश संसूचन एवं रेजिंग के लिए प्रयुक्त होने वाला परिवर्णी शबद है। यह प्रणाली के सिद्धांत पर आधारित है। प्रकाश को एक दूसरे को प्रभावित करने वाली वस्तुओं दव्ारा बदले गए उपकरण से संचारित किया जाता है। फिर भी प्रकाश का एक भाग प्रभावित होता है। उपकरण दव्ारा इसे प्राप्त करने के बाद इसका विश्लेषण किया जाता है। प्रकाश के गुणों में परिवर्तन, लक्ष्य वस्तु की विशिष्टताओं और गुण को उपलब्ध कराता है। प्रकाश के गुणों में परिवर्तन प्रकाश दव्ारा अन्त: क्रिया करने वाली लक्षित वस्तु की जानकारी प्राप्त की जाती है। उपकरण की कार्य सीमा की जानकारी स्रोत से अंत: क्रिया किये गये वस्तु की दूरी तक प्रकाश संचरण में लगे समय की रिकार्ड कर प्राप्त की जाती है। लिडार के तीन प्रकार के हो सकते है, यथा कार्य सीमा की जानकारी प्रदान करने वाला (Range Finders) , अंतरीय अवशोषण लिडार (Differential Absorption Lidar, DIAL) तथा डॉप्लर लिडार (Doppler LIDAR) जैसा कि नाम से स्पष्ट है, रेंज फांइडर का प्रयोग उपकरण से लक्षित वस्तु की दूरी जानने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, डायल का प्रयोग दो अलग-अलग तरंगदैर्ध्य वाली लेजरों का प्रयोग करते हुए रासायनिक संकेन्द्रण को मापने के लिए किया जाता है। परावर्तित संकेतों की तीव्रता के अंतराल को अणुओं के संकेन्द्रण को ज्ञात करने के लिए विश्लेषित किया जाता है। डाप्लर में हुए आंशिक परिवर्तन से लाल या नीली वस्तु या लक्ष्य के वेग की रिकॉर्ड की ओर जा रही है या नहीं, इसकी जानकारी प्राप्त की जाती है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में लेजर (Laser in Healthcare)

  • उपचार एवं नैदानिक उद्देश्यों पर आधारित लेजर के विभिन्न प्रकारों का स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रयोग होता है। उदाहरणस्वरूप लेजर चाकू इस प्रकार काट सकता है कि खून न निकले। दूसरी ओर Smart Scalpel नामक उपकरण लेजर का प्रयोग करते हुए कोशिकाओं में विषाणुओं की पहचान करने में सक्षम है।
  • लेजर प्रौद्योगिकी का प्रयोग त्वचा की झुर्रियों को मिटाने अथवा त्वचा के तिल, कृमिकोष, गोदना आदि को हटने के लिए भी किया जा सकता है। प्रकाशपुंज तथा गैर-प्रकाशपुंज समस्याएं उत्पन्न होने की आशंका लेजर के प्रयोग से होती है। तथापि लेजरों का प्रयोग स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्यापक रूप से होता है। लेजर प्रकाशपुंज के खतरों में नेत्र अथवा त्वचा में जलन शामिल है जो सामान्यत: व्यक्ति के शरीर पर लेजर प्रकाशपुंज की चमक के कारण होती है। दूसरी ओर, गैर-प्रकाशपुंज, जोखिमों में लेजर उपकरणों से उत्सर्जित खतरनाक अवयव, लेजर प्रकाशपुंज में प्रयुक्त पदार्थों में उत्सर्जित धुंआ तथा सर्जिकल उत्पादकों के दौरान उत्पन्न हुई लेजर Plume भी शामिल है।
  • प्रकाशपुंज तथा गैर प्रकाशपुंज (बाक्स देखें) जोखिमों के अतिरिक्त लेजर प्रकाशपुंज आग भी उत्पन्न कर सकते हैं। फिर भी यह तभी संभव है जब प्रकाशपुंज कागज एवं उत्तक जैसी किसी ज्वलनशील पदार्थ से टकराएं। जहां तक लेजर से आंखों में होने वाली समस्याओं का प्रश्न है, चोट आने की संभावना लेजर प्रकाशपुंज की शक्ति एवं उसकी तरंग की लंबाई पर निर्भर करती है। प्रकाश की अत्यधिक चमक आंखों को प्रभावित करती है क्योंकि प्रतिबिंब क्रिया के प्रभाव के कारण आंख झपकनी शुरू हो जाती है। कार्बनडाइआक्साईड लेजर प्रकाशपुंज की भांति अदृश्य अवरक्त लेजर प्रकाशपुंज चमकीला प्रकाश नहीं देता। इसके बाद लेजर प्रकाशपुंज की प्रकाशीय प्रवृत्ति नुकसान के स्थल को दर्शाती है। लेजर के कारण होने वाली समस्या भी महत्वपूर्ण है। लेजर Plumes, कार्सिनोजेन (कैंसर उत्पन्न करने वाले पदार्थ) , उत्परिवर्तक, धूल, बीजाणु, रक्त विखंडन, वायुमंडल के जैव कण आदि अवयवों के समूह हैं। लेजर Plumes दव्ारा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों में आंख, नाक तथा कान में खारिश, जुकाम, उल्टी, नकसीर, छाती पर दबाब, पेडू में अकड़न, फ्लू के लक्षण तथा थकावाट शामिल हैं ये लक्षण एक या दो दिनों तक बने रहते हैं। अन्य प्रकाशपुंज जोखिमों के अतिरिक्त गैर प्रकाशपुंज समूह में विद्युतीय जोखिम अत्यंत महत्पूर्ण है, क्योंक लेजर उपकरणों का असावधानी पूर्वक प्रयोग करने की दशा में विद्युतीय झटके की संभावना बनी रहती है। उपरोक्त सभी प्रयोगों के अतिरिक्त लेजर प्रौद्योगिकी प्लाविका प्रौद्योगिकी यूरेनियम को संवर्द्धित करने दृष्टि से समस्थानिकों के पृथकीकरण, रक्षा के प्रकाशपुंज शास्त्रों के विकास, तंतु प्रकाशिकी दव्ारा संप्रेषण तकनीक विकसित करने के लिए भी प्रयुक्त होती है। तंतु प्रकाशिकी में क्वांटम लूप लेजर का प्रयोग किया जाता है।

भारत में लेजर प्रौद्योगिकी (Laser Technology in India)

  • भारत में 1960 में भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (Bhabha Atomic Research Centre) दव्ारा लेजर प्रौद्योगिकी विकसित की गई थी। केन्द्र ने सफलतापूर्वक एक अर्द्धचालक लेजर का विकास किया था, जिसका 20 कि. मी. की दूरी पर प्रकाशीय (Optical) संप्रेषण संपर्क स्थापित करने के लिए प्रयोग किया गया था। इसकी सफलता के बाद लेजर विकास कार्यक्रम को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ जिसके कारण कई अन्य प्रमुख लेजरों के विकास हेतु गैर रैखिक प्रकाशिकी, लेजर प्लाविका, आपसी व्यवहार आदि क्षेत्रों में अनुसंधान करने के लक्ष्य भी निर्धारित किये गये। बाद में अधिकांश लेजर गतिविधियां उन्नत प्रौद्योगिकी केन्द्र (Centre for Advanced Technology, CAT) दव्ारा विकसित की जाने लगी है। अब इंदौर स्थित इस केन्द्र को भारत सरकार दव्ारा लेजर का विकास करने वाली एक अग्रणी संस्थान के रूप में पहचाना जाने लगा है। यह राष्ट्रीय लेजर कार्यक्रम के कार्यान्वयन को भी समन्वित करती है। विभिन्न प्रकार की लेजरें, लेजर संबंधित अवयव (पुर्जे/घटक) तथा लेजर पर आधारित उपकरणों को इस केन्द्र दव्ारा विकसित किया गया है। वर्तमान में भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिक के विकास के क्षेत्र में कार्यरत अधिकांश विभाग जैसे परमाणु ऊर्जा विभाग, इलेक्ट्रॉनिक विभाग, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद, विज्ञान एवं तकनीक विभाग आदि लेजर प्रौद्योगिकी के विकास संबंधी कार्यक्रमों का आयोजन करके इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।
  • 1991 में भारत में लेजर की स्थिति पर रिपोर्ट बनाने के लिए गठित वैज्ञानिक सलाहकार समिति ने राष्ट्रीय लेजर कार्यक्रम बनाने की सलाह दी थी, जिसका प्रारंभ परमाणु ऊर्जा विभाग दव्ारा राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों में छोटी एवं बड़ी परियोजनाओं का नियमन कर लेजर तथा उनके अनुप्रयोगों को बढ़ाने की दृष्टि से किया गया। प्रायोगिक लेजर प्रौद्योगिकी तथा प्रकाशीय इलेक्ट्रॉनिक्स में आधुनिकतम परिवर्तनों पर चर्चा करने के लिए फरवरी 2001 में अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी एवं सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसके उपरांत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation, DRDO) ने न केवल रक्षा उद्देश्य से अपितु भारत के सामाजिक चिकित्सकीय तथा आर्थिक क्षेत्र को सहयोग प्रदान करने के उद्देश्य से लेजर प्रौद्योगिकी को विकसित करने का प्रयास किया है। 1999 में रक्षा विज्ञान केन्द्र का नाम बदल कर लेजर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केन्द्र (Laser Science and Technology Centre, LASTEC) रखा गया। (LASTEC) नामक इस केन्द्र ने ND-YAG लेजर का विकास करने में सफलता प्राप्त की है। इसकी सहायता से ठोस अवस्था लेजर के क्षेत्र में (LASTEC) ने वायुगतिकी अनुप्रयोगों के लिए (ND-YAG) लेजर निम्नतापी शीतलन प्रणाली को विकसित किया है तथा Polymer Foam प्रौद्योगिकी को विकसित करने में भी सफलता प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त, कार्बन डाइऑक्साइड गैस डायनामिक लेजर के लिए मुख्य तकनीकों का आधारभूत ढांचा तैयार किया जा सकता है। LASTEC ने Alexandrite लेजर प्रणाली तथा दोहरी आवृत्ति वाले ND-YAG लेजर का विकास क्रमश: संवेदन रोधी एवं व्यक्ति रोधी कार्यों के लिए किया है। मोतियाबिंद के बाद देखभाल एवं ग्लूकोमा के उपचार के लिए LASTEC दव्ारा नेत्र चिकित्सा लेजर प्रणाली दृष्टि-1064 विकसित की जा चुकी हैं।ं DRDO तथा BARC के अतिरिक्त टाटा मौलिक अनुसंधान संस्थान भी लेजर प्रौद्योगिकी पर कार्य करने के लिए इस समूह में शामिल हो गया है।

अतिचालकता (Superconductivity)

  • अतिचालकता भौतिकी का एक अत्यंत रुचिकर, आकर्षक तथा चुनौतीपूर्ण पहलू है। प्रथम अतिचालक पदार्थ की खोज 1911 में (Heike Kammerlingh Onnes) दव्ारा तब की गई थी, जब पारे को -2690C तक शीतल किया गया था। वास्तव में दमे ने हीलियम को 4250F अथवा 4K तक सफलतापूर्वक शीतल करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इसके बाद, विश्व में पदार्थ की इस अनोखी स्पष्टता के प्रायोगिक अनुप्रयोग जानने के लिए कार्य आरंभ किये गये, फिर भी लगभग साढ़े तीन दशकों तक यह अवधारणा अस्पष्ट ही थी। हाल में निम्नतापी कार्यों के लिए अतिचालकों की आवश्यकता के संदर्भ में इस दिशा में पुन: प्रयास आरंभ किये गये हैं।
  • अतिचालक एक ऐसा पदार्थ है जिसमें प्रतिरोध रहित विद्युत प्रवाह संभव है। दूसरे शब्दों में, अन्य पदार्थों की तुलना में अतिचालकों ऊर्जा के ह्यस के बिना विद्युत प्रवाह संभव होता हैं। 1993 में (Walther Meissner) दर्शाया था कि चालक विद्युत के आदर्श चालकों से अधिक कार्यक्षेम होते हैं, तथा उनमें चुंबकीय क्षेत्र को त्यागने का चुंबकीय गुण भी होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, एक अतिचालक चुंबकीय क्षेत्र को अपने आंतरिक भाग में प्रवेश नहीं करने देता। उसके आंतरिक भाग वाहित होने वाली धारा से एक ऐसे क्षेत्र का निर्माण होता है, जो चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश को रोकता है। इस प्रभाव को डमपेदमत कहते हैं। अतिचालकता की अवधारणा को प्रोत्साहन वास्तव में 1957 में दिया गया, जब BCS (John Barden, Lean Cooper John Shriffer) का सिद्धांत प्रस्तावित किया गया था। सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि अतिचालकता शून्य के समान ताप पर है। सिद्धांत के अनुसार, जब अतिचालकता की संजालिका में धनात्मक क्षेत्र से एक ऋणात्मक आवेश वाला इलेक्ट्रॉन गुजरता है, संजालिका अव्यवस्थति हो जाती है। इसके कारण प्रोटॉन उत्सर्जित होते है, जो इलेक्ट्रॉन के चारों ओर धनात्मक आवेशों की एक संजालिका बनाते हैं। स्थिति के फिर से सामान्य होने के पूर्व, अर्थात संजालिका के व्यवस्थित होने से पहले नलिका में अन्य इलेक्ट्रॉनों को खींच लिया जाता है। इस स्थिति में दो इलेक्ट्रॉन एक दूसरे के प्रतिकर्षण की बजाय एक दूसरे से जुड़े जाते हैं। इलेक्ट्रॉनों के इस को ‘Cooper युग्म’ कहते हैं। जब तक अतिचालक अत्यंत कम ताप पर ठंडा रहता है तब तक ‘Cooper युग्म’ अखंडित रहता है लेकिन ताप बढ़ने से ताप ऊर्जा ‘Cooper युग्म’ को तोड़ देती है, और पदार्थ की अतिचालकता समाप्त हो जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि किसी अतिचालक को उसी स्थिति में रहने के लिए ताप व्यवस्था एवं चुंबकीय क्षेत्र को बनाए रखना चाहिए। वह जिस पर कोई पदार्थ अतिचालक बनता है, क्रांतिक तापमान कहलाता है। सामान्यत रूप से उपयोग में आने वाले अतिचालकों में कॉपर आक्साइड, बेरियम, थैलियम, वेनेडियम आदि शामिल है।

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