महाराष्ट्र सरकार दव्ारा राजद्रोह से संबंधित परिपत्र (Circular Related to Treason by the Maharashtra Government – Arrangement of the Governance)

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• यह परिपत्र पुलिस के संज्ञान में यह तथ्य लाता है कि भारतीय दंड संहिता के राजद्रोह का प्रावधान केवल उन लोगों के खिलाफ लगाया जा सकता है जो लिखित या अभिव्यक्त शब्दों, प्रतीकों का दृश्य माध्यमों से अथवा अन्य किसी माध्यम दव्ारा केंद्र या राज्य सरकार के खिलाफ घृणा, अवमानना या असंतोष उत्पन्न करते हैं, इन गतिविधियों के माध्यम से हिंसा के लिए प्रेरित करते हैं या ऐसा करने का प्रयास करते हैं।

• हालांकि, धारा 124-ए के प्रावधान, ऐसे लोगों के खिलाफ लागू नहीं किये जाएंगे जो घृणा और तिरस्कार के बिना, कानूनी साधनों के माध्यम से सरकार में परिवर्तन लाने की कोशिश करते हैं।

• यह माना जा रहा है कि यह स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाने का प्रयास है। इसलिए यह मुद्दा गंभीर आलोचना का विषय बन गया है।

वाक्‌ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारत का संविधान अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत मौलिक अधिकार के रूप में वाक्‌ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हालांकि, यह एक निरपेक्ष अधिकार नहीं है। भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा, राज्य की सुरक्षां, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण्ण संबंधों, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकात, अदालत की अवमानना, मानहानि, और अपराध उद्दीपन की दशा में राज्य इस अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है।

धारा 124ए

• भारतीय दंड सहिता की धारा 124ए एक स्वतंत्रता -पूर्व काल का प्रावधान है जो सरकार के खिलाफ राजद्रोह भड़काने के आरोपों से संबंधित है।

• 1962 में सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने धारा 124ए को संवैधानिक ठहराया और यह निर्णय दिया कि यह मौलिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच एक सही संतुलन के लिए जरूरी है।

• भारत अधिकार कार्यकर्ताओं और वाक्‌ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थकों का तर्क है कि यह धारा कठोर है और इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए।