धारा 377 (Section 377-Act Arrangement of the Governance)

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सुर्ख़ियो में क्यों?

• सुप्रीम कोर्ट (सर्वोच्च न्यायालय) ने छह उपचारात्मक याचिकाओं के एक बैच को एक पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास विचारार्थ भेजा है, इन याचिकाओं में 156 साल पुराने कानून को कायम रखने के 2013 के एक फैसले की समीक्षा की मांग की गयी है।

• याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समलैंगिकता एक मानसिक विकार नहीं था, बल्कि मानव कामुकता का एक सामन्य और प्राकृतिक रूपातंर था।

पृष्ठभूमि

• वर्ष 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि आईपीसी की धारा 377 असंवैधानिक है।

• हालांकि, वर्ष 2013 में, उच्चतम न्यायालय की एक पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले को उलट दिया जिसमें 1860 के उस कानून को रद्द कर दिया था जो समलैंगिक व्यस्कों के बीच सहमति से सेक्स (लिंग) को गैर-कानूनी घोषित करता ळें

भारतीय दंड संहिता की धारा 377

यह “किसी भी आदमी, औरत या जानवर के साथ प्रकृति के नियम के खिलाफ शारीरिक संभोग” पर प्रतिबंध लगाता है।