समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-Act Arrangement of the Governance)

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2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार को समान नागरिक संहिता के निर्माण के संदर्भ में प्राप्त अधिदेश के बारे में जानकारी माँगी। समान नागरिक संहिता लागू होने से समान मानक अपनाए जा सकेंगे तथा कानूनी मामलों में सभी धर्मो का समान रूप से विनियमन किया जा सकेगा।

यह क्या है और इसकी वर्तमान स्थिति

• अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता का अर्थ- अनिवार्यत: देश के सभी नागरिकों के लिए चाहे उनका धर्म कोई भी हो, उनके व्यक्तिगत मामलें समान कानूनों दव्ारा शासित होने चाहिए।

• वर्तमान में, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के व्यक्तिगत मामलों का विनियमन विभन्न कानूनों दव्ारा होता हैं। उदाहरण के लिए एक ईसाई व्यक्ति ने तलाक के संबंधित एक प्रावधान पर प्रश्न चिन्ह लगाया है जिसके अनुसार तलाक लेने से पहले ईसाई जोड़े को दो साल तक न्यायिक रूप से अलग रहना होता हैं जबकि हिन्दुओं और अन्य गैर-ईसाइयों के लिए यह अवधि एक वर्ष है।

समान नागरिक संहिता में अनुच्छेद 14 और 25 की भूमिका

• अनुच्छेद 25 के अनुसार, राज्य और इसकी संस्थाओं को विभिन्न धर्मो के पर्सनल (निजी) लॉ (धर्मशास्त्र) सहित धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

• पर्सनल लॉ से उत्पन्न विसंगति को समानता का अधिकार सुनिश्चित करने वाले अनुच्छेद 14 की कसौटी पर चुनौती दी गई है। वादियों का तर्क है कि उनका समानता का अधिकार पर्सनल लॉ के कारण खतरें में है। यह उनके लिए प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न करता है।