Science and Technology: Greenhouse Effect & Global Warming

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जैव विविधता (Biodiversity)

जैव विविधता विधेयक (The Biodiversity Bill)

विश्व व्यापार संगठन के अधीन व्यापार संबद्ध बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप्स) समझौतों के प्रावधानों के अनुरूप एक अनुकूल पेटेन्ट नियम के निर्धारण अथवा जैव संसाधनों के लिए एक अदव्तीय प्रणाली विकसित करने के उद्देश्य से जैव विविधता अधिनियम 2002 प्रमुख है। साथ ही, भारत जैव विविधता सम्मेलन के प्रावधानों के प्रति भी वचनबद्ध है। अधिनियम की धारा 3 के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को विदेशी कंपनियों या विदेशी साझा प्रतिष्ठानों को जैव संसाधन प्राप्त करने की अनुमति प्रदान करने का अधिकार सौंपा गया है। अधिनियम की धारा 2 (ख) के अंतर्गत जैव संसाधनों को परिभाषित किया गया है। इसके अनुसार, जैव संसाधनों में पौधों, जन्तुओं या सूक्ष्म जीवों या उनके शारीरिक भागों, आनुवांशिक पदार्थों, उपोत्पादन तथा उनके संभवित उपयोग या मूल्यों जिसमें मानवीय आनुवांशिक पदार्थ सम्मिलित नहीं हैं, को समावेशित किया गया है। अधिनियम में किसी भी स्थान पर लुप्तप्राय जीव की व्याख्या नहीं की गई है। धारा 7 के तहत राज्य स्तरीय जैव विविधता बोर्ड की स्थापना का प्रावधान है। धारा 24 में वर्णित तथ्यों के आधार पर इन बोर्डों का कार्य आवेदन पत्रों को संसाधित कर विभिन्न परियोजनाओं को स्वीकृत प्रदान करना है। साझा अनुसंधान परियोजनाओं को त्वरित गति प्रदान करने के उद्देश्य से धारा 5 के तहत प्रक्रियाओं का सरलीकरण किया गया है। पेटेन्ट के संबंध में धारा 6 (i) के अंतर्गत किसी व्यक्ति दव्ारा पेटेन्ट हेतु आवेदन करने की स्थिति में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण दव्ारा पेटेन्ट स्वीकृत होने के उपरांत लेकिन संबंधित अधिकारी दव्ारा पेटेन्ट के मुद्रांकण के पूर्व अनुमति प्रदान की जा सकती है। अधिनियम में उपरोक्त तथ्यों के अतिरिक्त निम्नांकित आयामों पर भी बल दिया गया है:

  • वैधानिक प्रारूप तथा संस्थागत क्षमता का निर्माण।
  • जैव तकनीक के क्षेत्र में निवेश में वृद्धि कर अनुसंधान कार्यों से पर्याप्त लाभ प्राप्त करने का प्रावधान।
  • जैव विविधता के क्षयंकर तथा अक्षंयकर मूल्य (Consumptive & Non-Consumptive Values) का ज्ञान।
  • जैव विविधता संरक्षण तथा इसके सतत्‌ उपयोग से संबंधित सभी कार्यक्रमों में पणधारियों (Stakeholder) की भागीदारी का सुनिश्चितीकरण।
  • इन-सीटू तथा एक्स- सीटू संरक्षण पर समान बल।

हरित गृह प्रभाव तथा भूमंडलीय तापन (Greenhouse Effect & Global Warming)

  • पृथ्वी पर मौसम तथा जलवायु सौर ऊर्जा दव्ारा नियंत्रित होते हैं। कार्बनडाइक्साइड, मिथेन तथा नाइटस ऑक्साइड लघु तरंग दैर्ध्य वाली सौर किरणों को वायुमंडल में प्रवेश करने देती हैं, जिससे ये विकिरणें पृथ्वी की सतह तक पहुँचती हैं, लेकिन दीर्घ तरंग दैर्ध्य वाली ताप विकिरणें वायुमंडल से बाहर नहीं जा पाती हैं। इस कारण वैश्विक तापक्रम में वृद्धि हो जाती है। इस प्रभाव को हरितगृह प्रभाव कहते हैं। ठंडे प्रदेशों में पौधों को उचित तापक्रम उपलब्ध कराने के लिए इस तकनीक पर कांच के हरितगृहों का निर्माण किया जाता है। प्राकृतिक रूप से हरितगृह प्रभाव वायुमंडलीय तापक्रम को सामान्य बनाए रखने हेतु नितांत आवश्यक है, ताकि पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा की जा सके। इन गैसों की मात्रा में हुई अचानक वृद्धि के कारण भूमंडलीय तापन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसके व्यापक कुप्रभाव पौधों, जन्तुओं, मानव प्रजाति तथा जलवायु पर परिलक्षित होते हैं। अनुसंधानों के अनुसार, वायुमंडल में कार्बन डाईक्साइड की मात्रा में 30 प्रतिशत की वृद्धि, मिथेन की सांद्रता में कमोबेश दुगनी तथा नाइटस ऑक्साइड की सांद्रता में औद्योगिक क्रांति के उपरांत अब तक 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस वृद्धि के कारण पृथ्वी के वायुमंडल के ताप अवशोषण की क्षमता में भी वृद्धि हो गई है। यद्यपि एक सामान्य वायु प्रदूषक के रूप में सल्फेट के कण प्रकाश का अंतरिक्ष की ओर परावर्तन कर वायुमंडल को ठंडा करते हैं, लेकिन इन कणों की विद्यमानता अल्पकालिक होती है तथा इनकी सांद्रता क्षेत्रीय दृष्टिकोण से परिवर्तित होती रही है।
  • विभिन्न अध्ययनों में यह स्पष्ट किया गया है, कि वैश्विक स्तर पर पृथ्वी की सतह का औसत तापक्रम 0.3 से 0.60C बढ़ गया है। 1860 से अब तक की अवधि में वर्ष 2000 को सर्वाधिक गर्म वर्ष कहा गया था। महासागरों के तापीय विस्तार के कारण सागर जल के स्तर में 10 से 25 सेंटीमीटर की वृद्धि हो गई है। आगामी 100 वर्षों में महासागरों के जल स्तर में 15 से 95 सेंटीमीटर की सीमा में औसतन 50 सेंटीमीटर की वृद्धि होने की आशंका है। वर्ष 2100 तक गैसों दव्ारा ताप अवशोषित करने के उपरांत औसत वैश्विक तापक्रम के स्थायित्व प्राप्त कर लेने के बावजूद महासागरों के जलस्तर में वृद्धि होने की आशंका है जिसका मुख्य कारण महासागरों का तापीय जड़त्व (Thermal Inertia) है। इस स्थिति में प्रकृति में जल चक्र पर कुप्रभाव पड़ने की आशंका है, जिससे संपूर्ण पारितंत्र में पोषक तत्वों के चक्र पर भी कुप्रभाव परिलक्षित होंगे। उपग्रहों दव्ारा प्राप्त सूचनाओं में भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है। 1997 में क्योटों प्रोटोकॉल के अधीन 6 हरितगृह गैसों की पहचान की गई है। ये गैसे कार्बनडाइक्साइड, मिथेन, नाइटस, ऑक्साइड, हाईड्रोफ्लोरोकार्बन, परफ्लोरोकार्बन तथा सल्फर हेक्साफ्लोराइड हैं। इनमें कार्बन डाईऑक्साइड, मिथेन, नाइटस आक्साइड तथा ओजोन प्राकृतिक गैसें है। कार्बन डाइक्साइड ठोस अपशिष्टों, जीवाश्म ईधनों (तेल, प्राकृतिक गैस एवं कोयला) काष्ठ एवं काष्ठ उत्पादक के ज्वलन से विमुक्त होती है। इसके अतिरिक्त, पशुपालन की अभिक्रियाओं तथा ठोस नगरीय कार्बनिक अवशिष्टों के अपघटन से मिथेन का उर्त्सजन होता है। दूसरी ओर, नाइटस ऑक्साइड कृषि एवं औद्योगिक गतिविधियों, ठोस अपशिष्टों तथा जीवाश्म ईंधनों के ज्वलन से विमुक्त होती है। मानव जनित गतिविधियों से उत्सर्जित होनी वाली हरितगृह गैसों हाइड्रो फ्लोरोकार्बन, परफ्लोराकार्बन तथा सल्फर हेक्साफ्लोकार्बन हैं। प्रत्येक हरितगृह गैस के ताप अवशोषण की क्षमता भिन्न होती है। इन गैसों में ताप अवशोषण की सर्वाधिक क्षमता हाइड्रो फ्लोरोकार्बन तथा परफ्लोराकार्बन की है। कार्बन डाईक्साइड के एक अणु दव्ारा अवशोषित की गई ताप की कुल मात्रा की तुलना में मिथेन के एक अणु दव्ारा 21 गुना तथा नाइटस ऑक्साइड के एक अणु दव्ारा 270 गुणा अधिक ताप अवशोषित किया जा सकता है। हरितगृह गैसों के उत्सर्जन को मिलियन मिट्रिक टन कार्बन समतुल्य (Million Metric Tons of Carbon Equivalent or MMTCE) की इकाई में व्यक्त किया जाता है।

1988 में अंतरराज्यीय जलवायु परिवर्तन समूह (Inter Governmental Panel on Climate Change, IPCC) का गठन किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव तथा विज्ञान का गहन अध्ययन तथा उनके प्रति अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार के रूप्ज्ञ में प्रतिक्रिया के रूप्ज्ञ में व्यक्त करना था। 1990 में आई. पी. सी. सी. दव्ारा प्रथम मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की गई थी, जिसमें विश्व के 300 वैज्ञानिकों ने अपने विचार व्यक्त किये। सामयिक सूचनाओं की उपलब्धता के लिए 1992 तथा 1994 में भी इस प्रकार के रिपोर्ट जारी किये गये। इन रिपोर्टो में जलवायु परिवर्तन से संबंधित निम्नांकित विशिष्ट तथ्यों पर बल दिया गया था:

  • वायुमंडल में हरित गृह गैसों की मात्रा मेें मानव जनित गतिविधियों के कारण वृद्धि।
  • कार्बन डाईक्साइड तथा अन्य हरित गृह गैसों की उत्सर्जित होने वाली मात्रा को कम करने के प्रयास।
  • विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का प्रावधान।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता।

उपरोक्त तथ्यों पर विशेष बल देने का मुख्य उद्देश्य मानव दव्ारा जलवायु प्रणाली में हस्तक्षेप की सीमा तथा हरितगृह गैसों की वायुमंडल में बढ़ रही मात्रा को कम करना था। इसके उपरांत मार्च-अप्रैल 1995 में बर्लिन मेंडेट (Berlin Mandate) के तहत हरितगृह गैसों के उत्सर्जन की मात्रा को कम करने के लिए विशेष प्रयास प्रारंभ किये गये। आई. पी. सी. सी. की वर्ष 2001 की रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि औसत वैश्विक तापक्रम में विगत एक दशक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण विगत तीन दशकों में मानव जनित गतिविधियाँं है। एक ओर कणिकामय प्रदूषण सामान्यत: वायुमंडलीय तापक्रम को कम करता है, लेकिन दीर्घकालिक हरितगृह गैसों की बढ़ती हुई मात्रा से तापक्रम को कम करता है, लेकिन दीर्घकालिक हरितगृह गैसों की बढ़ती हुई मात्रा से तापक्रम वृद्धि की घटना अधिक प्रभावी होती है।