Science and Technology: Achievements of Indians in Science and Technology

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विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ (Achievements of Indians in Science and Technology)

  • डॉ. होमी जहाँगीर भाभा- डॉ. भाभा भारत में परमाणु कार्यक्रम के सूत्रधार थे। इनके अमूल्य योगदान के परिणामस्वरूप ही भारत विश्वभर में नाभिकीय विज्ञान क्षेत्र में अग्रसर हुआ। 1934 के दौरान उन्होंने ‘क्वांटम सिद्धांत’ पर नील्स बोर के साथ कार्य किया। डॉ. भाभा ने वाल्टर हाइटलर के साथ मिलकर इलेक्ट्रॉन बौछारों से संबंद्ध कैस्केड सिद्धांत (Cascade Theory) पर भी कार्य किया। यह सिद्धांत कॉस्मिक विकिरण के प्रति समझ विकसित करने में बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ही मेसॉन की पहचान की। भाभा ने ‘मेसॉन’ नाम का परामर्श दिया जिसे अब प्राथमिक कणों के वर्ग में रखा जाता है। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान के क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान के लिए एक नवीन संस्थान बनाने का विचार बनाया। जून, 1945 को डॉ. भाभा दव्ारा प्रस्तावित ‘टाटा इंस्टीट्‌यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ (TIFR) की एक छोटी सी इकाई कार्यशील हुई। डॉ. भाभा ने भारत की स्वतंत्रता के पूर्व ही परमाणु ऊर्जा के जनहित अनुप्रयोग को आकलित कर लिया था। अंत: उन्होंने 1944 में नाभिकीय ऊर्जा पर अनुसंधान आरंभ किया।
    • उनकी प्रतिभा के कारण वर्ष 1955 में जेनेवा में आयोजित परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग प्रथम संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन का प्रथम सभापति उन्हें ही नियुक्त किया गया था।
    • डॉ. भाभा के निर्देशन में भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु ऊर्जा विकास पर कार्यारंभ किया। तदोपरांत वर्ष 1956 में बंबई के निकट ट्राम्बे में एशिया का प्रथम परमाणु रिएक्टर कार्य करना शुरू किया। उन्हें भारत और विदेशों में अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें ‘आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम’ भी कहा जाता है।
    • भाभा की मृत्यु 24 जनवरी, 1966 को स्विट्‌जरलैंड में एक हवाई दुर्घटना में हो गई।
  • सुबह्यण्यम चन्द्रशेखर- चन्द्रशेखर एक ख्यातिप्राप्त तमिल भारतीय-अमेरिकी खगोलशास्त्री थे। भौतिकशास्त्र पर उनके अध्ययन के लिए उन्हें विलियम फाउलर के साथ संयुक्त रूप से 1983 में भौतिकी का नोबल पुरस्कार मिला।
    • वर्ष 1935 में लंदन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी में प्रस्तुत किए गए अपने शोध पत्र में उन्होंने दर्शाया था कि सफेद बौने तारे (White Dwarf) एक निश्चित द्रव्यमान प्राप्त करने के बाद अपने भार में और वृद्धि नहीं कर सकते। अंतत: वे कृष्ण छिद्र (Black Hole) बन जाते हैं। उन्होंने बताया कि जिन तारों का द्रव्यमान सूर्य से 1.4 गुना होगा, वे अंतत: सिकुड़ कर बहुत भारी हो जाएंगे। लेकिन लगभग 50 वर्ष बाद वर्ष 1983 में उनके इस शोध सिद्धांत को मान्यता मिली। उनकी खोज से न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल के अस्तित्व की धारणा कायम हुई।
  • चन्द्रशेखर सीमा- खगोल भौतिकी में यह बहुत प्रसिद्ध शब्दावली है। चंद्रशेखर ने पूर्णत: गणितीय गणनाओं और समीकरणों के आधार पर चंद्रशेखर सीमा का विवेचन किया था। यह देखा गया कि सभी श्वेत वामन तारों का द्रव्यमान चन्द्रशेखर दव्ारा निर्धारित सीमा में सीमित रहता है। किसी स्थायी श्वेत वामन तारे के अधिकतम द्रव्यमान को ‘चन्द्रशेखर सीमा’ की संज्ञा दी गयी है।
    • चन्द्रशेखर सीमा वह द्रव्यमान है जिसके ऊपर तारे के केन्द्र में इलेक्ट्रॉन अध: पतन दबाव (Electron Degeneracy Pressure) तारे के अपने गुरूत्वाकर्षण स्वप्न आकर्षण को संतुलित करने में विफल रहता है। परिणामत इस सीमा से अधिक द्रव्यमान वाले श्वेत वामन आगे भी गुरुत्वाकर्षण विस्फोट करते है, जो विभिन्न प्रकार के तारकीय अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं जैसे न्यूट्रॉन तारा, कृष्ण छिद्र) । वैसे श्वेत वामन जो इस सीमा के अंदर ही होते हैं स्थायी बने रहते हैं।
    • चन्द्रशेखर सीमा का वर्तमान स्वीकार्य मान लगभग किग्रा है। यहाँ सौर द्रव्यमान। अर्थात यदि किसी तारे का द्रव्यमान इस सीमा से अधिक है तो यह तारा श्वेत वामन नहीं बनता है।
  • विक्रम साराभाई- विक्रम अंबालाल साराभाई भारत के प्रमुख वैज्ञानिक थे। साराभाई को भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का पिता कहा जाता है। विदित है कि इन्हीं के नेतृत्व में भारत के प्रथम उपग्रह आर्यभट्‌ट का प्रक्षेपण किया गया। इन्होंने देश में विज्ञान की प्रगति में अमूल्य योगदान दिया। सौर भौतिकी (Solar Physics) और कॉस्मिक किरणों के प्रति उनकी वैज्ञानिक अभिरूचि रही। तदुनुरूप इन क्षेत्रों में भारत के विभिन्न स्थानों पर वैधशालाएँ स्थापित की गयी। साराभाई ने भारत के विभिन्न स्थानों पर वैज्ञानिक शोध केन्द्रों की स्थापना में अपनी भूमिका निभायी। अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory -PRL) कीे स्थापना में भी साराभाई की अग्रिम भूमिका रही।
    • वर्ष 1963 में उनके नेतृत्व में नेहरू विकास फाउंडेशन (Nehru Foundation for Development) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य सामाजिक और शिक्षा समस्याओं पर अध्ययन करना है। थुम्बा में भूमध्य रेखीय रॉकेट निर्माण स्टेशन की स्थापना में साराभाई ने ही नेतृत्व किया। डॉ. सी. वी. रमन के निरीक्षण में साराभाई ने कॉस्मिक किरणों पर कार्य किए। इसके जरिए यह जानकारी मिली कि कॉस्मिक किरणें बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी पर पहुँचने वाली ऊर्जा कणों की प्रवाह (Stream of Energy Particles) हैं। पृथ्वी पर पहुँचने के दौरान इन्हें सूर्य, वायुमंडल और चुम्बकत्व से तीव्रता (Influence) मिलती है। यह अध्ययन पार्थिव चुम्बकत्व और वायुमंडल, सूर्य की प्रकृति और बाह्य अंतरिक्ष के अवलोकन में सहायक है।
  • हरगोविन्द खुराना- ये भारत के जाने-माने चिकित्सक थे। इन्होंने जीव कोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना का अध्ययन किया। इन्होंने न्यूक्लिओटाइड नामक उपसमुच्चयों की अत्यंत जटिल, मूल रासायनिक संरचनाओं पर शोध किया। ये इन समुच्चयों का योग कर दो वर्गों के न्यूक्लिप्रोटिड एन्जाइम नामक यौगिक बनाने में सफल हुए।
    • नाभिकीय अम्ल (Nucleic Acid) हजारों एकल न्यूक्लिओटाइड्‌स से बनते हैं। जैव कोशिकाओं के आनुवांशिकीय गुण इन्हीं जटिल बहु न्यूक्लिओटाइड्‌स की संरचना पर निर्भर रहते हैं।
    • डॉ. खुराना 11 न्यूक्लिओटाइड्‌स का योग करने में सफल हो गए थे। 1960 के दशक में खुराना ने नीरबर्ग की इस खोज की पुष्टि की कि डी. एन. ए. अणु के कुंडिलित ‘सोपान’ पर 4 विभिन्न प्रकार के न्यूक्लिओटाइड्‌स के विन्यास का तरीका नई कोशिका की रासायनिक संरचना और कार्य को निधारित करता है। डी. एन. ए. के एक तंतु पर इच्छित अमीनो अम्ल उत्पादित करने के लिए न्यूक्लिओटाइड्‌स के 64 संभावित संयोजन पढ़े गए हैं, जो प्रोटीन निर्माण के खंड होते हैंं खुराना ने जानकारी दी कि न्यूक्लिओटाइड्‌स का कौन-सा क्रमिक संयोजन किस विशेष अमीनो अम्ल को बनाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यूक्लिओटाइड्‌स कूट कोशिका को हमेशा तीन के समूह में प्रेक्षित किया जाता है, जिन्हें प्रकूट (कोडोन) कहा जाता है। उन्होंने यह दर्शाया कि कुछ कोडोन कोशिका को प्रोटीन का निर्माण शुरू या बंद करने के लिए प्रेरित करते हैं।
    • एक यीस्ट जीन की पहली कृत्रिम प्रतिलिपि संश्लेषित करने में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। वर्ष 1968 में इन्हें चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। आनुवंशिक कूट की व्याख्या और प्रोटीन संश्लेषण में इसके कार्य से संबंद्ध अपनी खोज के लिए इन्हें यह पुरस्कार दिया गया।
    • खुराना के वैज्ञानिक शोध 20वीं सदी के महत्वपूर्ण खोजों में से एक हैं। इसके जरिए दोषपूर्ण मानव ऊतकों की मरम्मति या मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के उपचार के लिए संश्लिष्ट डी. एन. ए. का प्रवेश इन ऊतकों में कराया जाता है।
  • होमी सेठना- सेठना भारत के परमाणु वैज्ञानिक एवं परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे। वर्ष 1974 में प्रथम पोखरण परमाणु परीक्षण के समय वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे। सेठना ने सीमित संसाधनों के बावजूद भारत को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में स्वावलंबी बनाने का सफल प्रयास किया। देश में यूरेनियम, जिरकोनियम, थ्योरियम भारी जल, प्लूटोनियम जैसे नाभिकीय पदार्थों की प्राप्ति के लिए सुविधाएँ सृजित करने में सेठना ने अतुलनीय योगदान दिया। ट्रॉम्बे से थोरियम संयंत्र और यूरेनियम धातु संयंत्र स्थापित करने में भी डॉ. सेठना ने योगदान दिया।
  • राजा रमन्ना-रमन्ना भारत के प्रमुख नाभिकीय वैज्ञानिक थे। इन्होंने भारतीय नाभिकीय कार्यक्रम के विकास में अपना नेतृत्व प्रदान किया। रमन्ना ने तकनीकी विशेषज्ञ, नाभिकीय भौतिकविद, प्रशासक, नेतृत्वकर्ता, दर्शन शोधकर्ता की भूमिका निभायी। उन्होंने परमाणु भौतिकी के सैद्धांतिक और प्रायोगिक दोनों पहलूओं पर कार्य किया। देश के स्वदेशी परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में इन्होंने योगदान दिया। मई, 1974 में देश के पहले शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण में डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के साथ राजा रमन्ना ने भी योगदान दिया। देश के प्रथम अनुसंधान रिएक्टर अप्सरा की स्थापना में इन्होंने उल्लेखनीय नेतृत्व किया। इन्होंने युवा वैज्ञानिकों को विशेष तौर पर चुनौतियों स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया। इन्होंने अपने निर्देशन में वैज्ञानिकों एवं तकनीकविदों की एक नयी पीढ़ी तैयार की।
  • डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम- डॉ. कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक रहे हैं। इन्होंने वर्ष 1958 में मद्रास प्रौद्योगिकी संस्थान से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1962 में कलाम भारतीय अंतरिक्ष संगठन में आये जहाँ उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई। भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपणयान एसएलवी 3 के निर्माण के दौरान ये परमाणु निदेशक के रूप में कार्य किए। डॉ. कलाम ने ही इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को तैयार किया। इन्होंने स्वदेशी लक्ष्य भेदी (गाइडेड मिसाइल) का डिजाइन तैयार किया। अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल को सफल परीक्षण का श्रेय उन्हीं को हैं। उन्हीें के पर्यवेक्षण में भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण वर्ष 1998 में किया गया। इन्हें भारत सरकार ने भारत रत्न से भी सम्मानित किया है।
  • जयन्त विष्णु नार्लीकर- नार्लीकर प्रसिद्ध भौतिकीय वैज्ञानिक हैं। इन्होंने स्थिर अवस्था सिद्धांत क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। वर्तमान में यह मत प्रचलित है कि ब्रह्यांड की उत्पत्ति बिग बैंग के दव्ारा हुई थी। ब्रह्यांड की उत्पत्ति के बारे में एक और सिद्धांत प्रतिपादित है। इसका नाम ‘स्थायी अवस्था सिद्धांत’ है। इस सिद्धांत के जनक फ्रेड डॉयल हैं। नार्लीकर ने डॉयल के साथ मिलकर इस सिद्धांत पर कार्य किया। इसके साथ ही इन्होंने आइन्सटीन के सापेक्षता सिद्धांत और मैक सिद्धांत को मिलाते हुए डॉयल - नार्लीकर सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
    • हाल में इन्होंने बिग बैंग संबंद्ध एक वैकल्पिक मॉडल का उल्लेख किया है। इसे क्वासी स्टीड स्टेट मॉडल (Quasi Stead State Model) कहा जाता है। 1990 के दशक में होयले, बरब्रिंड और नार्लीकर ने इस मॉडल को प्रस्तुत किया। नार्लीकर का मंतव्य है कि ब्रह्यांड का प्रारंभ या अंत होने के स्थान पर यह विस्तारित और संकुचित होता हुआ पेंडुलम की भाँति दोलित होता है।