Science and Technology: New Developments in Nano Technology

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नैनो प्रौद्योगिकी (Nano Technology)

नैनो तकनीक क्षेत्र में हुए नवीन विकास (New Developments in Nano Technology)

  • इंटिग्रेटेड ऑप्टिकल सर्किट (Integrated Optical Circuit) : सिलिकन के नैनोकणों की सहायता से प्रकाश प्रकीर्णन को नियंत्रित करने का प्रयोग किया गया है। यह प्रयोग इंटिग्रेटेड ऑप्टिकल सर्किट के विकास में लाभकारी होगा।
    • वैज्ञानिकों के शोध में दर्शाया गया है कि नैनोकण दृश्य स्पेक्ट्रल परास (Visible Spectral Range) किस प्रकार नियंत्रित प्रकाश प्रकीर्णन में उपयोगी हो सकते हैं। शोधकर्ताओं ने सबसे पहले प्रकीर्णन को मापने की विधि खोजी। तब उन्होंने सिलिकन के छोटे गोलों पर प्रकाश किरणें टकरायीं। टकराने के बाद कुछ प्रकीर्णन पीछे की दिशा में हुए तो कुछ आगे की दिशा में हुए। शोधकर्ताओं ने यह भी दर्शाया कि गोलाकार नैनोकणों के व्यास में परिवर्तन कर दो दिशाओें (आगे-पीछे) में गतिशीलता के अनुपात को नियंत्रित किया जा सकता है। शोध दल ने अवलाेेकन किया कि 100 से 200 नैनोमीटर व्यास वाले सिलिकन गोलों का उपयोग करने से आगे की ओर प्रकीर्णीत प्रकाश (Scattered Light) की मात्रा पीछे की ओर प्रकीर्णीत प्रकाश की मात्रा के लगभग बराबर से लेकर 6 गुना अधिक के बीच रही। उन्होंने यह भी पाया कि प्रकाश के तरंगदैर्ध्य के अनुसार प्रकाश का विखंडन हुआ होगा। उदाहरण के लिए, किसी विशेष आकार के नैनोकण ने यदि हरे प्रकाश को पीछ की ओर प्रकीर्णीत किया तो पीले प्रकाश विकिरण को आगे की ओर प्रकीर्णीत किया।
    • शोधकर्ताओं ने सिलिकन को इस कार्य के लिए इसलिए चुना क्योंकि इसके उपयोग से ऊर्जा क्षय में कमी आती है और यह प्रकाश के वैद्युत और चुंबकीय दोनों घटकों को प्रभावित करता है। साथ ही सिलिकन के नैनोकणों के वैद्युत और चुंबकीय अनुनादों (Resonance) के मध्य परस्पर संपर्क के कारण प्रकाश विकिरण का वांछित प्रकीर्णन होता है। प्रकाशी स्पेक्ट्रल परास में विद्युत और चुंबकीय प्रतिक्रिया वाली उपरोक्त नैनो ऑप्टिकल प्रणाली ऑप्टिकल नैनो एंटीना अवधारणा को समझने में सहायक होगी।
  • नैनोसेंसर (Nano Sensor) : नैनोसेंसर वैसे जैविक रासायनिक या शल्य चिकित्सकीय सेंसरी प्वांइट होते हैं। जिनका उपयोग नैनोकणों के बारे में सूचना प्रेषित करने के लिए किया जाता है।
    • चिकित्सकीय अनुप्रयोग में यह आवश्यक होता है कि नैनोसेंसर शरीर की विशिष्ट कोशिकाओं और स्थलों की पहचान करने में सक्षम हो। शरीर में कोशिकाओं के आयतन, सान्द्रण, विस्थापन, वेग, ताप या दाब आदि में होने वाले परिवर्तन मापकर नैनोसेंसर किन्हीं विशिष्ट कोशिकाओं की पहचान कर सकते हैं कि कहीं वे कैंसर कोशिकाएँ तो नहीं। नैनोसेंसर शरीर के अंदर उभर गए ट्‌यूमर को स्पष्ट दर्शाने के लिए सेंसर के रूप से कैंडमियन सेलेनाइड क्वांटम डॉट्‌स के प्रदीप्ति गुणों का उपयोग करते हैं।
    • इस आॅप्टकल नैनोस्केल एंटीना का उपयोग सौर सेल विकसित करने तथा इंटिग्रेटेड ऑप्टिकल सर्किट निर्माण में किया जा सकता है।
  • नैनो टेक फाइबर (Nano Tech Fiber) : वैज्ञानिकों ने कार्बन नैनोट्‌यूब फाइबर का निर्माण किया है जो धागे की तरह दिखता और कार्य करता है तथा धात्विक तार की तरह विद्युत और ऊष्मा का संचालन करता है। पूर्व में एकल परत वाले कार्बन नैनो ट्‌यूब का उपयोग किया जाता रहा है लेकिन ये व्यय साध्य होते हैं। नैनो ट्‌यूब फाइबर कपास के धागे की तरह दिखते हैं। फिर भी ये धात्विक तार और मजबूत कार्बन फाइबर की तरह कार्य करते हैं। ये फाइबर कपास के धागे की तरह मुलायम होते हैं।
    • नैनो फाइबर का इस्तेमाल जीन डिलीवरी उपकरणों, सेंसरों, बैटरी एवं अन्य तकनीकों में किया जा सकता है।
  • नैनो अलेक्ट्रोमेकैनिकल सिस्टम (NEMS) : वैसे उपकरण जो नैनोस्केल पर विद्युत तथा यांत्रिक क्रियाविधियों को एकीकृत करते हैं। नैनो इलेक्ट्रोमेकैनिकल सिस्टम कहलाते हैं। ये उपकरण माइक्रोइलेक्ट्रोमेकैनिकल उपकरणों के बाद इनसे भी छोटे आकार के होते हैं। NEMS में ट्रांजिस्टर समरूप नैनोइलेक्ट्रॉनिक्स, पंप या मोटर को एक साथ एकबद्ध किया जाता है। एक प्रकार के भौतिक, जैविक और रासायनिक सेंसर के रूप में कार्य करता है। इनका उपयोग सभी महत्वपूर्ण तकनीकों में छोटे आकार के उपकरण के रूप में किया जाता है।
  • नैनोफोटोनिक्स (Nano Photonics) : नैनोफोटोनिक्स मूलत: ‘नैनोतकनीक’ और ‘फोटोनिक्स’ के संयोग से बना है। नैनोमीटर स्केल पर प्रकाश के व्यवहार का अध्ययन नैनोफोटोनिक्स के तहत किया जाता है। इसके अंतर्गत नियर फील्ड स्कैनिकंग ऑप्टीकल माइक्रोस्कोपी, स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोपी (NSOM) और सरफेस प्लाजमन ऑप्टीक्स जैसी तकनीकें कार्य करती है।
    • नैनोफोटोनिक्स में पराबैंगनी, दृश्य और अवरक्त प्रकाश का उपयोग किया जाता है। भारत में आईआईटी दिल्ली में नैनोफोटोनिक्स शोध कार्य वर्ष 2005 में प्रारंभ किया गया। इस शोध कार्य में नैनोकणों और नैनो स्ट्रक्चर के संश्लेषण तथा फोटोनिक्स पर ध्यान दिया गया है ताकि इनकी संरचनागत, भौतिक और प्रकाशकीय विशेषताएँ और बेहतर हो सकें।
    • दिसंबर 2012 में आईबीएम ने प्रकाशिकी संचार तकनीक स्तर पर एक नई घोषणा की। इस तकनीक को ‘सिलिकन नैनोफोटोनिक्स’ कहा गया। इसके तहत भविष्यगत कम्प्यूटर प्रणालियों में सूचना स्थानांतरण के लिए विद्युत सिग्नल के स्थान पर प्रकाश का उपयोग किया जाएगा। इससे प्रकाश के जरिए कम्प्यूटर चीप सर्वर, वृहद डाटा केन्द्र और सुपर कम्प्यूटरों के मध्य व्यापक स्तर पर डाटा का आवागमन किया जा सकेगा।
    • इस तकनीक में विभिन्न प्रकाशिकी घटकों और विद्युत सर्किटों को एकल सिलिकन चीप से एकबद्ध किया जाता है। इसके लिए 90nm (नैनोमीटर) के अर्द्धचालक फैब्रिकेशन का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक में सिलिकन नैनोफोटोनिक्स के घटक जैसे माड्‌यूलेटर, जर्मेनियम फोटोडिटेक्टर और अल्ट्रा कॉम्पैक्ट मल्टीप्लेक्सर को उच्च निष्पादन वाले एनालॉग और डिजिटल सीएमओएस सर्किट (Complementary Metal Oxide Semi-Conductor Circuit) के साथ जोड़ा जाता है। ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि उच्च डाटा दर पर पारेषण तथा रिसीवर करने में सक्षम प्रकाशिकी सर्किटों को एकबद्ध किये जाने (Integration) से डाटा आवागमन में होने वाले अवरोध समाप्त किए जा सकेंगे।
  • नैनोबायोफिजिक्स (नैनो जैव भौतिकी) (Nano Bio Physics) : विज्ञान की इस शाखा में जैविक प्रणालियों में होने वाली जटिल रासायनिक भौतिक गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए रासायनिक नैनोतकनीक और जैव तकनीक का सहयोग लिया जाता है।
    • भारतीय मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक अनीता गोयल ने विज्ञान की इस नई शाखा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भौतिकी में क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के व्यवहार प्रारंभिक दशाओं तथा उन पर लग रहे गणितीय सूत्रों पर निर्भर करते हैं। जबकि जैव तंत्रों में इसके अतिरिक्त घटनाओं का व्यवहार उसके गतिकीय पर्यावरण पर भी निर्भर करते हैं।
    • उल्लेखनीय है कि नई कोशिका का निर्माण किसी DNA प्रतिलिपि (DNA Replication) के अनुसार ही होता है। इस क्रिया में बहुत सारे घटक काम करते हैं जिन्हें सामग्री और सही पर्यावरण की आवश्यकता होती है जो कि हमेशा नहीं मिल पाता। अत: प्रतिलिपि एकदम शुरू में नहीं बन पाती, जिसके फलस्वरूप नया डीएनए आंशिक रूप में बदल जाता है।
    • अनीता गोयल के अनुसंधान से जानकारी मिलती है कि जैव या आण्विकी मोटर की उपरोक्त गतिकी पुराने प्रचलित अवधारणा के विपरीत मात्र डीएनए श्रृंखला पर निर्भर नहीं करती वरन उस प्रक्रिया के पर्यावरणीय परिवेश पर भी निर्भर करती है। इसका शरीर के व्यवहार पर सीधा असर पड़ता है। आण्विक मोटर के पर्यावरणीय संपर्क में आने के कारण डीएनए पर प्रभाव पड़ता है। इससे डीएनए का पाठ अशुद्ध हो सकता है। इसके फलस्वरूप इस डीएनए का वहन करने वाले कोशिका के गुणधर्म में परिवर्तन हो सकता है। इससे कैंसर की संभावना भी बनती है।
    • ऐसे गतिकीय तंत्र (Dynamic Mechanism) को समझने के लिए उन्होंने मॉडल परिपथ का विकास किया है। इसके जरिए यह आकलन किया जा सकता है कि पर्यावरणीय घटक डीएनए की प्रतिलिपि की प्रक्रिया पर किस तरह प्रभाव डालते हैं। ये पर्यावरणीय घटक हैं- परिवेश का तापक्रम, उसमें उपस्थित न्यूक्लिओटाइडस का घनत्व तथा अन्य जैव पदार्थ, डीएनए पर यांत्रिक तनाव आदि।