Science and Technology: Nobel Prize-2012: Chemical Sector, Medical and Physics Field

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नोबेल पुरस्कार-2012 (Nobel Prize-2012)

रसायन क्षेत्र (Chemical Sector)

  • इस क्षेत्र में वर्ष 2012 का नोबल पुरस्कार ‘जी-प्रोटीन युग्म संग्राहकों’ के अध्ययन के लिए रॉबर्ट लेफकोवट्‌ज और ब्रायन कोव़िल्का को दिया गया।
  • सामान्यत: हमारे शरीर में करोड़ों कोशिकाओं के मध्य संपर्क होता रहता है। प्रत्येक कोशिका में सूक्ष्म संग्राहक होते हैं जिसके जरिए कोशिका अपने आस-पास के वातावरण का आकलन कर पाते हैं ताकि यह नई परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर सकें। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने ‘जी-प्रोटीन युग्म संग्राहकों’ के रूप में ऐसे सूक्ष्म संग्राहकों के एक महत्वपूर्ण संवर्ग दव्ारा आंतरिक क्रियाकलाप किए जाने की खोज की है।
  • लंबे समय तक यह पहेली बनी रही कि कोशिकाएप अपने आस-पास के वातावरण का आभास कैसे कर पाती हैं। वैज्ञानिकों को इस बात की जानकारी तो थी कि एड्रिनेलिन जैसे हार्मोन के शक्तिशाली प्रभाव होते हैं जैसे -रक्तदाब में वृद्धि और हृदय धड़कन का तेज हो जाना। वे इस मद्देनजर विचार कर रहे थे कि कोशिकीय सतहों पर हार्मोनों के संग्राहक होते हैं। लेकिन ये संग्राहक किस प्रकार संगठित होते हैं और इनकी क्रियाविधि कैसी होती है को लेकर संशय बना हुआ था। लेफकोविट्‌ज ने 1968 में रेडियोसक्रियता के जरिए कोशिकाओं के संग्राहकों की पड़ताल शुरू की। उन्होंने विभिन्न हार्मोनों के साथ आयोडीन समस्थानिक युग्मित (Attaching) कर दिए। विकिरण के प्रभाव से उन्हें कुछेक संग्राहकों की जानकारी मिली। इन्हीं में से एक था एड्रिनेलीन हार्मोन का संग्राहक एड्रिनर्जीक संग्राहक। लेफकोविट्‌ज ने अपने शोध दल के साथ मिलकर कोशिका भित्ति से इस संग्राहक को निकाला और इसके क्रियाकलापों का अध्ययन किया।
  • बाद में कोबिल्का ने वृहद मानव जीनोम से एड्रिनर्जीक संग्राहक को कूटित करने वाले जीन का पता लगाया। इस जीन का अध्ययन करने पर पता चला कि इसके संग्राहक नेत्र में प्रकाश ग्रहण करने वाले संग्राहक के समरूप है। इस प्रकार यह स्पष्ट किया गया कि संग्राहकों का एक संपूर्ण संवर्ग ही है जो एक ऐसा जैसा दिखता है और समान तरीके से कार्य करता है।
  • इसी संवर्ग को ′ जी-प्रोटीन युग्म संग्राहक कहा गया है। यह भी रोचक जानकारी मिली है कि सभी दवाइयों में से लगभग आधी ′ जी-प्रोटीन युग्म संग्राहकों ′ दव्ारा प्रभावित होती है।
  • कहा जा सकता है कि ′ जी-प्रोटीन युग्म संग्राहक मानव जीनोम में प्रोटीन को दर्शाने वाले सबसे बड़े संवर्ग हैं।
  • इन्हीं ‘जी-प्रोटीन युग्म संग्राहकों’ के क्रियाकलापों के अध्ययन से देखने स्वाद, गंध, डरने पर हृदय धड़कन के बढ़ने आदि के मूलभूत कारण को पता लगाया जा सकता है।
  • ये संग्राहक कोशिका के बाहर से होने वाले अत्यंत सूक्ष्म उद्दीपन पर भी प्रतिक्रिया करते हैं। ये ऐसा करने के लिए अपने आकार में परिवर्तन करते हैं और अंतरकोशिकीय प्रोटीनों (मूलत: जी प्रोटीन) के साथ संपर्क करते हैं, ये संग्राहक ही कोशिकाओं के बाह्‌य वातावरण से प्राप्त सूचना प्रवाह के माध्यम के रूप में कार्य करते हैं। निष्कर्षत: लेफकोविट्‌ज और कोबिल्का दव्ारा किए गए खोज से निम्नलिखित के बारे में जानकारी मिल सकेगी- बाह्‌य वातावरण से सूचना प्रवाह (Information Flow) किस प्रकार प्राप्त होती है, एक समान प्रोटीन संवर्ग से अनेक भिन्न प्रकार के सिग्नल कैसे दर्शाए जाते हैं, स्वास्थ्य और रोग की स्थिति में इन प्रोटीनों का विनियमन किस प्रकार होता है और किन्हीं विशिष्ट दवा की खोज के लिए इनका उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है।

चिकित्सा क्षेत्र (Medical Field)

  • 2012 का चिकित्सा का नोबल पुरस्कार केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जॉन गर्डन और क्योटो विश्वविद्यालय के शिन्या यामानाका को दिया गया है। यह पुरस्कार उन्हें स्टेम कोशिका संबंधी अग्रणी शोध के लिए मिला है। दोनों ही जीव वैज्ञानिकों के शोध का संबंध इस बात से था कि जंतुओं की परिपक्व या प्रौढ़ कोशिकाओं को स्टेम कोशिकाओं में बदला जा सकता है।
  • 1962 में जॉन गर्डन ने एक प्रयोग किया था जो स्टेम कोशिका क्षेत्र में युगांतरकारी माना जा सकता है। उन्होंने दर्शाया था कि मेढक के अंडे में से उसका केन्द्रक निकाल दे और उसकी जगह किसी प्रौढ़ मेढक की आपत की कोशिका (जो बहुसक्षमता खो चुकी है) का केन्द्रक आरोपित कर दें, तो उस अंडे से स्वस्थ टेडपोल बन जाते हैं। यानी प्रौढ़ कोशिका के केन्द्रक को पुन: बहुसक्षम बनाया जा सकता है। यामानाका ने 2006 में इस बात को आगे बढ़ाया। उन्होंने दर्शाया कि यदि किसी प्रौढ़ त्वचा कोशिका में मात्र चार ‘पुनर्जीवन’ जीन्स प्रत्यारोपित कर दिए जाएप तो वह कोशिका वापस भ्रूणनुमा कोशिका में बदल जाती है। इन कोशिकाओं को उन्होंने नाम दिया था ‘प्रेरित बहुसक्षम कोशिकाएप’ यानी ‘इंडयूस्ड प्लूरीपोटेंट सेल्स’ ।
  • स्टेम कोशिकाओं के साथ काम करने में प्रमुख कठिनाई यही रही है कि ऐसी कोशिकाएप भ्रूण से प्राप्त करनी होती हैं लेकिन इस विषय से कई नैतिक प्रश्न जुड़े हुए हैं। यदि सामान्य प्रौढ़ कोशिकाओं को बहुसक्षम कोशिकाओं में बदला जा सके तो काम आसान हो जाएगा। चिकित्सा और शोध की दृष्टि से ऐसी प्रेरित बहुसक्षम कोशिकाओं का महत्व बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन अभी इनका चिकित्सकीय उपयोग दूर है। सामान्य कोशिका को बहुसक्षम कोशिकाओं में बदलने के लिए चार जीन्स एक वाहक वायरस की मदद से प्रत्यारोपित किए गए हैं। इससे कई सुरक्षा संबंधी सवाल जुड़े हैं जैसे, हो सकता है कि इस प्रक्रिया में कैंसर के जीन्स सक्रिय हो जाएप। दूसरा सवाल एक अन्य प्रयोग से उभरा है, शोधकर्ताओं ने जब इस तरह निर्मित प्रेरित बहुसक्षम कोशिकाओं को चूहे में प्रत्यारोपित किया तो उसका प्रतिरक्षा तंत्र इनके विरुद्ध सक्रिय हो उठा जबकि ये कोशिकाएप उसी चूहे की प्रौढ़ कोशिकाओं से बनाई गई थी। कहने का मतलब है कि अभी प्रेरित बहुसक्षम कोशिकाओं के बारे में काफी कुछ समझना बाकी है। फिर भी गर्डन और यामानाका का योगदान पुरस्कार योग्य तो है ही।

भौतिकी क्षेत्र (Physics Field)

फ्रांसीसी वैज्ञानिक सर्गे हरोशे और अमेरिकी शोधकर्ता डेविड जे. वाइनलैंड को संयुक्त रूप से वर्ष 2012 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। दोनों को यह पुरस्कार उस नई प्रायोगिक विधि की खोज के लिए दिया गया, जिसके तहत व्यक्तिगत क्वांटम प्रणालियों की गणना की जा सकती है और उसमें बदलाव भी किए जा सकते हैं। अब तक इस विधि को असंभव समझा जा रहा था। दोनों वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से क्वांटम के सबसे छोटे कण को मापने और इसके प्रयोग का आविष्कार किया तथा इसकी पद्धति विकसित की। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस छोटे कण की क्वांटम और मैकेनिकल प्रकृति को बिना नुकसान पहुपचाए यह प्रक्रिया पूरी की गई। इन वैज्ञानिकों की खोज ने क्वांटम भौतिकी के क्षेत्र में प्रयोगों के लिए नया दव्ार खोल दिया हैं। अब क्वांटम के सबसे छोटे कण को बिना नुकसान पहुपचाए उसका निरीक्षण और पर्यवेक्षण किया जा सकेगा। इससे ही गॉड पार्टिकल की खोज संभव हो सकी है। साथ ही इस नई खोज से क्वांटम भौतिकी पर आधारित सुपर फास्ट कम्प्यूटर विकसित किया जा सकता है और संभव है कि जिस तरह पिछली सदी में पारंपरिक कम्प्यूटर ने हमारे जीवन को बदल कर रख दिया था, उसी तरह क्वांटम कम्प्यूटर के भी परिणाम सामने आएप।