Science and Technology: Space Capsule Recovery Test-2 (SRE-2)

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स्चाांर, नौवहन/नौसंचालन तथा मौसमविज्ञानीय उपग्रह प्रणाली (Communication and Meteorological Satellite System)

अंतरिक्ष कैप्सूल पुन: प्राप्ति परीक्षण-2 (एसआरई-2) (Space Capsule Recovery Test - 2 (SRE-2) )

  • एसआरई-2 मिशन का मुख्य उद्देश्य एक पूर्णत: पुन: प्राप्ति योग्य कैप्सूल तैयार करना और सूक्ष्म गुरुत्व परीक्षण प्रयोग करते हेतु एक मंच प्रदान करना है। एसआरई कैप्सूल में चार मुख्य हार्डवेयर हैं- वायुतापीय संरचना, एयरो तापीय संरचना अंतरिक्षयान प्लेटफार्म, मंदन व प्लवन प्रणाली और नीतभार। एसआरई-2 हेतु विकसित नवीन तकनीकियों में कार्बन-कार्बन नासा टोप, स्वदेशी यूएचएफ बीकन आदि शामिल हैं।
  • सिलिका टाइल तापीय संरक्षण प्रणाली युक्त एयरो तापीय संरचना, पेलोड का अर्हता मॉडल, सौर पटल, पैराशूट तथा प्लावक तैयार किए हैं। मिशन प्रबंधन यूनिट हार्डवेयर तैयार हैं और अपवर्धन चरण हेतु ऑनबोर्ड सॉफ्टवेयर इन लूप पूर्ण किए गए।

अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science)

अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का अभिन्न अंग रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान क्रियाकलाप, भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पी. आर. एल.) , अंतरिक्ष भौतिक प्रयोगशाला (एस. पी. एल.) , राष्ट्रीय वायुमंडलीय अनुसंधान प्रयोगशाला (एन. ए. आर. एल.) , इसरो उपग्रह केन्द्र (आईजैक) में वैज्ञानिक विश्लेषण समूह (एस. ए. जी.) तथा अंतरिक्ष विज्ञान एवं यंत्रीकरण सुविधा (एस. ए. आई. एफ.) में किये जाते हैं। इसरो अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकार समिति (एड्‌कॉस) की सिफारिशों के जरिये इसरो दव्ारा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्रों में विशिष्ट, राष्ट्रीय समन्वित, बहुसंस्थानिक, विज्ञान नीतभार उपकरण तथा विज्ञान मिशन विकास परियोजनाओं को सहायता दी जाती है तथा उन्हें कार्यान्वित किया जाता है। एडकॉस के जरिये अंतरिक्ष विज्ञान अनुसंधान परियोजनाओं/कार्यक्रमों में किये जाने वाले मुख्य क्रियाकलापों का सार नीचे दिया गया है।

चन्द्रयान-1 (Chandrayaan-1)

22 अक्टूबर 2008 को प्रमोचित चन्द्रयान-1 मिशन ने 312 दिन कक्षा में पूरे कर, चन्द्रमा के 3400 से अधिक चक्कर लगाये और चन्द्रमा का भिन्न-भिन्न परिदृश्यों से अध्ययन कर उच्च विभेदन के उत्कृष्ठ गुणवत्ता वाले आंकड़े प्रदान किये। 28 अगस्त, 2009 तक चन्द्रयान-1 मिशन सफलतापूर्वक कार्य करता रहा, संपर्क के टूटने से संचार असफल हो गया और मिशन रद्द करना पड़ा। वैज्ञानिक प्रेक्षण के प्रमुख परिणामों ने पुष्टि की है कि मिशन के लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया गया है। चन्द्रयान-1 के रसायन, खनिज विज्ञान तथा फोटो भू-विज्ञान मानचित्रण से संबंधित परिणाम अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं (जर्नलों) में प्रकाशित किये गये हैं।

चन्द्रयान-2 (Chandrayaan-2)

चन्द्रयान-2 मिशन मे एक कक्षित्र/लैंडर/रोवर संरूपण के होने की योजना बनाई गई है। इस मिशन को 2014 तक प्राप्त करने की संभावना है। यह भारत-रूसी सहयोग मिशन है। इस मिशन का वैज्ञानिक लक्ष्य, कक्षित्र पर रखे उपकरणों का उपयोग कर चन्द्रमा की उत्पत्ति एवं विकास की जानकरी को और बढ़ाना तथा रोबोटिक/रोवर के उपयोग से चन्द्रमा के नमूनों का स्वस्थान विश्लेषण करना और चन्द्र रेगोलिथ विशेषताओं (सुदूर व सीधे विश्लेषण) का अध्ययन करना है।

भारतीय मंगल मिशन (Indian Mars Mission)

इसरो 2013 के दौरान मंगल ग्रह पर मिशन भेजने की योजना बना रहा हैं। भारतीय मंगल कक्षित्र मिशन के लिए परियोजना रिर्पोट भारत सरकार के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत की गई है। मंगल मिशन का फिलहाल वैज्ञानिक लक्ष्य उस ग्रह पर जीवन, जलवायु, भूविज्ञान, उत्पत्ति, विकास तथा जीवन की दीर्घकालीनता पर केन्द्रित होगा। एडकॉस समीक्षा समिति दव्ारा वैज्ञानिक नीतभार का चयन किया गया है। उपग्रह की आधार-रेखा सौर व्यूह तथा परावर्तित संरूपण को अंतिम रूप दिया गया है। एफ. एम. ओ. -इसरो मु. के साथ संचार उप-प्रणाली हेतु आवृत्ति फाइलिंग किया जा रहा है।

एस्ट्रौसैट मिशन (ASTROSAT Mission)

  • एस्ट्रौसैट भारत का पहला समर्पित खगोल विज्ञानीय मिशन है जो एक्स-किरण एवं पराबैंगनी स्पेक्ट्रमी बैंडों में एक साथ आकाशीय पिंडो, ब्रह्यणीय स्रोतों के बहु-तरंगदैर्ध्य प्रेक्षण संभव बनाएगा। वैज्ञानिक नीतभार दृशीय (3500 - 6000) , पराबैंगनी (13000 - 3000) , अल्प तथा अतिवेधी एक्स-किरण (0.5 - 8 keV; 3 - 80 keV) क्षेत्र का आवृत्त करता है। दृशीय, पराबैंगनी, अल्प एक्स एवं अतिवेधी एक्स क्षेत्रों पर अपना व्यापक स्पेक्ट्रमी आवरण प्रदान करने में एस्ट्रौसैट अदव्तीय है।
  • एस्ट्रौसैट के वैज्ञानिक उद्देश्य हैं: ब्रह्यणीय स्रोतों का बहुतरंग दैर्ध्य अध्ययन नई क्षणिकाओं के लिए एक्स-किरण आकाश का मानीटरन, अविवेधी एक्स-किरण तथा पराबैंगनी बैंडों में पूरे आकाश का सर्वेक्षण, एक्स-किरण दव्आधारी, ए. जी. एन. , एस. एन. आर. , आकाशगंगाआंे के समूह तथा तारा आयान मंडलों के ब्राडबैंड स्पेक्ट्रमदर्शी अध्ययन, जानकार स्रोतों के एक्स-किरण स्रातों तथा मानीटरन तीव्रता का आवधिक एवं अनावधिक परिवर्तनीयता का अध्ययन और विस्फोटों एवं प्रकाश बदलावों का संसूचन।
  • सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र, श्रीहिरकोटा से 1500 क्रि. ग्रा. भार वाले उपग्रह को प्रचालनात्मक पी. एस. एल. वी. दव्ारा 650 कि. मी. की तुंगता पर 8-डिग्री की कक्षीय आनति पर 2012 में प्रमोचित किया जाना है। इस मिशन की उपयोगी कालावधि लगभग 5 वर्ष होने की संभावना है।

आदित्य-1 (Aditya – 1)

आदित्य 1 प्रथम अंतरिक्ष आधारित सौर प्रभामंडलीयग्राफ, प्रभामंडल नामक सूर्य के बाहरी क्षेत्र के अध्ययनार्थ अभिप्रेत है। आदित्य-1 दृशीय एवं निकट अवरक्त बेंडो में प्रभामंडल द्रव्यमान निष्कासन जैसे, आभामंडलीय चुंबकीय क्षेत्र संरचना, आभामंडलीय चुंबकीय क्षेत्र का विकास इत्यादि और परिणामस्वरूप अंतरिक्ष मौसम हेतु महत्वपूर्ण भौतिक प्राचल का अध्ययन करेगा। आदित्य के क्रियाकलाप इस प्रकार हैं: सौर आभामंडलीयग्राफ नीतभार के विकास एवं सुपुर्दगी के लिए आई. आई. ए. के साथ समझौता ज्ञापन हस्ताक्षर आदित्य-1 की प्रकाशिकी प्रणाली के प्रारंभिक डिज़ाइन को अंतिम रूप दिया गया और डिज़ाइन दस्तावेज तैयार, प्रकाशिकी डिज़ाइन की प्रारंभिक डिज़ाइन समीक्षा पूरी की गई, संसूचन प्रणाली के चयन पर ट्रेड-ऑफ अध्ययन पूरा किया गया और पावर एवं भार का बजट तैयार करने के साथ उप-प्रणाली पैकेजों की सूची तैयार की गई। उपग्रहों का यांत्रिक पुनसंरूपण प्रगति पर है।

गृहीय विज्ञान तथा अन्वेषण (प्लैनेक्स) (Earth Sciences and Exploration (Planx) )

  • इसरो की अंतरिक्ष विज्ञान सलाहकारिता समिति (एडकॉस) दव्ारा प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय ग्रहीय विज्ञान एवं अन्वेषण कार्यक्रम, प्लैनेक्स अल्प एवं दीर्घ-कालीन नीति को ग्रहीय विज्ञान तथा अन्वेषण के क्षेत्र में अनुसंधान एवं संबंधित क्रियाकलापों को शुरू करने के लिए अभिकल्पित किया गया है।
  • वर्ष के दौरान, प्लैनेक्स कार्यक्रम के क्रियाकलाप प्रारंभिक सौर मंडल की प्रक्रिया को समझने हेतु उल्कापातों पर अन्वेषण करने पर चन्द्रमा पर सतही विशेषताओं तथा सतही प्रक्रियाओं को समझने हेतु चन्द्र मिशनों से प्राप्त सुदूर संवेदन आँकड़ों के विश्लेषण और ग्रहीय अन्वेषण हेतु प्रयोगशाला आदिप्रारूपी उपकरणों के विकास करने पर केन्द्रित है।
  • विस्तृत भूआकृतिविज्ञान, रसायन, खनिजविज्ञान तथा भौतिक प्राचलों के जरिये विशिष्ट सतही विशेषताआंे और विकास के पहलूओं को समझने के लिए चन्द्रयान-1 के नीतभारों, (HySI, TMC, M3) कागुआ (एम. आई. वी. आईएस.) तथा एल. आर. ओ. (एन. ए. सी.) मिशनों से प्राप्त प्रकाशिकी सुदूर संवेदन आँकड़ों का विश्लेषण किया गया है। टाइको गड्‌ढे की केन्द्रीय चोटी की भूआकृति तथा सम्मिश्रण के संरचना तथा बाद के परिवर्तनों को समझने के लिए उसका अध्ययन किया गया है। केन्द्रीय चोटी पर ज्वालामुखी छिद्र गुंबद, पाइरोक्लास्टिक, लावाताल तथा पृथक शीतलन दरारें तथा फ्लो-फ्रन्टस दर्शाते चैनल निर्दिष्ट किये गये हैं। M3, डिविनर एवं चन्द्र कक्षित्र लेजर तुगंतमापी आँकड़ों के समेकित विश्लेषण दव्ारा चन्द्रमा पर विरल भू तत्वों तथा फासफोरसों की ज्वालामुखी पर अंतर्दृष्टि प्राप्त की गई। चन्द्रमा की अन्य घाटियों के विपरीत, ओरियेन्टेल मेंं मारे (काले धब्बों) बसाल्ट अपेक्षाकृत कम हैं जो घाटी के अधिकांश भाग को दृष्टव्य बनाते हैं।
  • ओरियेन्टेल घाटी में अवशोषण विशेषताओं तथा रैखीय स्पेक्ट्रमी अमिश्रित अतिस्पेक्ट्रमी तकनीकों पर आधारित खनिजों के आधिक्य को पहचानने तथा उसका अनुमान लगाने पर अध्ययन केन्द्रित था। वर्ष 2013 में प्रमोचन के लिए निर्धारित चन्द्रयान-2 मिशन के दो नीतभार विकासधीन हैं। एक नीतभार, एक्स-किरण सौर मानीटर किरण सौर मानीटर कक्षित्र के लिए है और दूसरा, अल्फा कण एक्स-किरण स्पेक्ट्रममापी रोवर के लिए। चन्द्रमा तथा ग्रहीय अन्वेषण हेतु बेतार संवेदक नेटवर्क की नई प्रौद्योगिकी विकासधीन है। दो वार्षिक बैठकों के अलावा, प्लैनेक्स कार्यशाला एवं प्लैनेक्स पी. आई. वार्षिक समीक्षा बैठक, दो आँकड़ा विश्लेषण कार्यशालाएँ (दोनों सैक तथा अहमदाबाद के सहयोग में) तथा मंगल विज्ञान एवं अन्वेषण पर एक कुशाग्र सत्र का भी आयोजन किया गया। प्लैनेक्स कार्यक्रम विश्वविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थानों से ग्रहीय विज्ञान के विषयों पर अनुसंधान परियोजनाओं का निधि-पोषण करता रहा है। इस अवधि के दौरान, आठ नई परियोजनाओं का वित्त-पोषण किया गया है और दो परियोजनाएँ प्रक्रियाधीन हैं। फिलहाल 14 चालू परियोजनाएँ हैं। मार्च 26 - 27,2011 के दौरान प्लैनेक्स पी. आई. की समीक्षा बैठक हुई जिसमें सोलह पी. आई. ने भाग लिया और अपनी प्रगति प्रस्तुत की। उनके परिणाम राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय जर्नलों (18 लेख) में प्रकाशित हुए तथा राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों मेंं प्रस्तुत किये गये।