भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास (Development of Indian National Movement) Part 4for Uttarakhand PSC

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अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का प्रभाव

मिस्र, फ्रांस एवं तुर्की में सफल स्वतंत्रता संग्राम ने भारतीयों को काफी उत्साहित किया। 1897 में अफ्रीका के पिछड़े एवं छोटे राष्ट्र अबिसीनिया (इथियोपिया) ने इटली को पराजित किया और 1905 में जापान की रूस पर विजय आदि से उग्र राष्ट्रवादी विचार को बढ़ावा मिला। गैरेट ने कहा-इटली की हार ने 1897 में तिलक के आंदोलन को बड़ा बल प्रदान किया।

ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीयों का अपमान

ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीयों के साथ जो अपमानपूर्ण नीति अपनाई जाती थी उससे भी भारतीय बहुत क्षुब्ध थे, विशेषकर द. अफ्रीका में भारतीयों के साथ बहुत बरा बर्ताव होता था।

उग्रवाद की विचारधारा का प्रकटीकरण प्रथमत: अरविन्द घोष के ’न्यूलैंप्स फॉर (के लिये) द (यह) ओल्ड (पुराना)’ नामक लेख में हुआ। कालांतर में तिलक के मराठा एवं केसरी तथा बंगाल से प्रकाशित होने वाले सांध्य एवं युगान्तर में भी इस विचार को पर्याप्त स्थान मिला। अरविन्द का भवानी मंदिर तथा वंदे मातरमवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू नामक पत्र भी इस सशक्त विचार शक्ति का पोषण कर रहा था। पंजाब में लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र में महात्मा तिलक एवं बंगाल में विपिनचन्द्र पाल इस विचार पद्धति के प्रमुख उन्नायक थे।

उग्रवादी आंदोलन का उद्देश्य

उग्र राष्ट्रवादी विचारकों का अंतिम लक्ष्य स्वतंत्रता की प्राप्ति था। वे ब्रिटिश सरकार से पूर्ण रूप से संबंध विच्छेद करने के पक्ष में थे तथा प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं स्थापना के अनुसार शासन संस्थाओं की स्थापना करना चाहते थे। तिलक ने कहा था, ’स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।’ तिलक ने स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था कि ’स्वतंत्रता ही मनुष्य को स्वतंत्रता के योग्य बनाती है और इसलिए एक बार जब भारत को स्वतंत्रता मिल जाएगी, तब दूसरे क्षेत्रों में उन्नति अवश्यम्भावी है।’ अरविंद घोष ने कहा था कि ’स्वतंत्रता हमारे जीवन का लक्ष्य है और हिन्दू धर्म के माध्यम से इस आकांक्षा की पूर्ति हो सकती है।’

कार्य प्रणाली

उग्र राष्ट्रवादी उदारवादियों की भांति संवैधानिक तरीकों में विश्वास नहीं करते थे। बाल गंगाधर तिलक ने उग्रवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा था कि ’हमारा आदर्श दया याचना नहीं आत्मनिर्भरता है।’ विपिनचन्द्र पाल का कहना था कि ’ अगर सरकार स्वत: स्वराज्य का दान देती है तो मैं उसे धन्यवाद दूंगा, लेकिन मैं उसे स्वीकार नहीं करूँगा जब तक कि उसे मैं स्वयं हासिल न कर पाऊँ।’ उग्रवादियों का विश्वास था कि प्रार्थना पत्र देने, भाषणबाजी करने और प्रस्ताव पास करने में स्वराज्य की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसके लिए वे जनता में राजनीतिक चेतना जागृत कर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशक्त आंदोलन चलाना चाहते थे। उग्र राष्ट्रवादियों ने भारतीयों के हृदय से इस बात को निकालने का प्रयास किया कि अंग्रेज सर्वशक्तिमान नहीं है बल्कि इन्हें भारत से भगाया जा सकता है। इन्होंने अपने कार्यक्रम में बहिष्कार, स्वदेशी आंदोलन, सविनय अवज्ञा और असहयोग की नीति आदि को अपनाया। राष्ट्रीय शिक्षा पर भी उग्र राष्ट्रवादियों ने बहुत जोर दिया।

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