गाँधी युग (Gandhi Era) Part 23 for Uttarakhand PSC

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वैवेल योजना/शिमला सम्मेलन

मार्च, 1945 ई. में लार्ड वैवेल इंग्लैंड गए और भारतीय समस्यों पर विचार-विमर्श करके जून, 1945 ई. में भारत लौटे। 14 जून, 1945 ई. को वैवेल ने भारतीय नेताओं के एक सम्मेलन के विषय में घोषणा की और 25 जून से शिमला सम्मेलन में भारतीय नेताओं को वार्ता के लिए बुलाया। साथ ही कांग्रेस वर्किंग (काम कर रहें) कमेटी (समिति) के सदस्यों को जेल से छोड़ने के आदेश भी प्रसारित कर दिए। सम्मेलन का निम्न उद्देश्य घोषित किया गया।

  • सांप्रदायिक समस्या का हल जो भारत की संवैधानिक प्रगति में मुख्य बाधा थी।

  • गवर्नर (राज्यपाल) जनरल की एक नई कार्यकारिणी कौंसिल (परिषद) का गठन जिसमें सभी राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व हो। इस कौंसिल में मुसलमानों और हिन्दुओं (हरिजनों को छोड़कर) को समान प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। गवर्नर जनरल और सेनाध्यक्ष को छोड़कर शेष सभी सदस्य भारतीय होंगे। विदेश विभाग भी भारतीय सदस्यों को सौंप दिया जाएगा, इस कौंसिल का कार्य युद्ध संचालन, प्रशासन तथा नए संविधान निर्माण पद्धति का निर्णय करना होगा।

यह सम्मेलन 25 जून से 14 जुलाई तक चला और अंतत: असफल रहा। इसकी असफलता का मुख्य कारण यह था कि जिन्ना ने यह दावा प्रस्तुत किया कि समस्त मुसलमान सदस्य लीग दव्ारा ही मनोनीत होने चाहिए। इस आधार पर कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी कौंसिल के सदस्य नहीं हो सकते थे। अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधियों ने कांग्रेस दव्ारा प्रस्तुत सदस्यों के नाम पर आपत्ति की और पृथक नामांकन करने का अधिकार मांगा। इन मतभेदों के अतिरिक्त वैवेल ने विभिन्न दलों से नामों की एक सूची प्रस्तुत करने के लिए कहा और उसमे से निर्धारित संख्या में चयन का अधिकार अपने लिए सुरक्षित रखा। इस पर लीग सहमत नहीं हुई

सम्मेलन की असफलता के लिए जन्ना की अपेक्षा वैवेल मुख्य रूप से उत्तरदायी था। वैवेल यदि जिन्ना के दृष्टिकोण को इतना अधिक महत्वपूर्ण मानता था तो उसे पहले जिन्ना और कांग्रेस अध्यक्ष से समझौता कर लेना चाहिए था। जिस प्रकार शिमला सम्मेलन में विचार विमर्श हुआ उसका परिणाम जिन्ना को एक ऐसा ’वीटो’ (प्रतिबंध) का अधिकार प्रदान करना था जिससे उसका महत्व अत्यधिक बढ़ा। इस सम्मेलन से केन्द्र में हिन्दु-मुस्लिम समानता भी जिन्ना को उपलब्ध हो गई। अब भारत विभाजन और निकट दिखाई देने लगा। वैवेल ने मुसलमानों के नामों की सूची स्वयं तैयार की थी और इसमें कांग्रेस का एक भी मुसलमान सदस्य नहीं था। चार मुस्लिम लीग के और एक यूनियनिस्ट (संघवादी) दल का सदस्य था। जिन्ना ने इसे स्वीकार नहीं किया। अंतत: सम्मेलन असफल रहा।

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