गाँधी युग (Gandhi Era) Part 4 for Uttarakhand PSC

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असहयोग आंदोलन

1918 में महायुद्ध का अंत हो गया। भारतीयों को यह आशा थी कि युद्धोतर ब्रिटिश सरकार उन्हें स्वशासन का अधिकार देगी। भारतीय शासन सुधार की जो योजना सरकार ने बनाई उससे भारतीय नेता संतुष्ट नहीं हुए। उस समय देश की स्थिति असंतोषजनक थी, जिसके चलते क्रांतिकारी आंदोलन पुन: सक्रिय हो गया। इसी समय गांधी ने भारत के राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया। शुरू में वे भारतीय राजनीति में ब्रिटिश सरकार के एक सहयोगी के रूप में प्रविष्ट हुए। युद्धकाल में ब्रिटिश सरकार की सहायता करने के कारण उन्हें सरकार की ओर से कैसर-ए-हिन्द का सम्मान भी प्रदान किया गया।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने भारतीयों की ओर से सत्याग्रह चलाया था। 1917 ई. में बिहार प्रांत के चंपारण जिले में निलहों के अत्याचार से किसानों को बचाने के लिए गांधी जी ने आंदोलन चलाया। कुछ ही दिनों के बाद अहमदाबाद के मजदूरों की वेतन वृद्धि के लिए उन्होंने आमरण अनशन प्रारंभ किया। उन्होंने सत्याग्रह का मार्ग अपनाकर कांग्रेस में एक नई शक्ति का संचार कर दिया। 1919 ई. में भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हुई और कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिनसे प्रभावित होकर सहयोगी गांधी जी असहयोगी बन गए।

महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन चलाने के लिए रॉलेट अधिनियम ने प्रेरित किया। इसके अनुसार सरकार को यह अधिकार मिला कि वह नियमानुसार मुकदमों लाए बिना ही किसी को नजरबंद करके उसके मुकदमे का फैसला कर सकती है। रॉलेट एक्ट भारतीयों के लिए काला कानून था। गांधी जी ने इस अधिनियम का विरोध करने का नि श्चय किया और जनता को सलाह दी कि वह सत्य और अहिंसा के आधार पर रॉलेट एक्ट का विरोध करे। दिल्ली में संघर्ष में आठ व्यक्ति मारे गए। दिल्ली जा रहे गांधी जी को एलवन स्टेशन (स्थान) पर गिरफ्तार करके बंबई भेज दिया गया।

इसी समय अमृतसर के जिला मजिस्ट्रेट (न्यायाधीश) ने डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थान पर भेज दिया। इस घटना ने पंजाब के शांत वातावरण में उत्तेजना पैदा कर दी। 1919 ई. के 13 अप्रैल की शाम को जलियाँवाला बाग में दमनकारी कानूनों के विरुद्ध सार्वजनिक सभा हो रही थी। डायर नामक अफसर ने निहत्थी तथा शांत भीड़ पर गोली चलाने की आज्ञा दी। बिना किसी पूर्व चेतावनी के गोलियां चलने लगी। यह नृशंस हत्याकांड पंजाब में आतंक फैलाने के लिए जान-बूझकर किया गया था। पंजाब में मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लागू कर दिया गया। इस भीषण हत्याकांड से सारे देश में सनसनी फैल गई। कांग्रेस ने इसकी जांच के लिए कमिटी (समिति) नियुक्त की जिसमें गांधी, सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू थे।

खिलाफत आंदोलन असहयोग आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस आंदोलन का प्रारंभ प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुआ। जर्मनी की हार के साथ ही तुर्की की भी हार हो गई थी। युद्ध का अंत होते ही तुर्की साम्राज्य के एशियाई प्रदेशों को इंग्लैंड और फ्रांस ने आपस में बांट लिया। मित्रराष्ट्रों दव्ारा खलीफा का, जो इस्लामी संसार के धर्माध्यक्ष थे- अपमान किया गया। क्षुब्ध मुसलमानों ने सरकार से असहयोग प्रारंभ किया जो खिलाफत आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध है। खिलाफत आंदोलन का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के खलीफा सुलतान को फिर से शक्ति दिलाना था। दिल्ली में हुए लीग के अधिवेशन का सभापतित्व करते हुए डॉ. अंसारी ने जोरदार शब्दों में खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया। लीग ने भी भारत के लिए स्वशासन की मांग की। बहुत से धार्मिक संप्रदायों ने भी -राजनीति में भाग लेना शुरू कर दिया। उदाहरण के लिए -मौलाना मुहम्मद-उल हसन के नेतृत्व में उलेमा संप्रदाय के राजनीतिक में प्रवेश को लिया जा सकता है। उनके दव्ारा एक संस्था की स्थापना की गई जिसे इत्तेहाद-उलेमी -ए-हिन्द की संज्ञा प्रदान की गई। नवंबर, 1919 में गांधी जी ने हिन्दू और मुसलमान नेताओं का एक सम्मेलन दिल्ली में बुलाया। इस सम्मेलन में भी खिलाफत आंदोलन को समर्थन दिया गया। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए इस आंदोलन को बड़ा ही व्यापक और लोकप्रिय बनाया गया।

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