किसानों के आंदोलन एवं विद्रोह (Movement and Uprising of Farmers) Part 4 for Uttarakhand PSC

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नील आंदोलन

1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद किसानों ने अपने आर्थिक मांगो के लिए जो विद्रोह किया इसमें 1860 में हुआ बंगाल का नील आंदोलन प्रमुख था। नील उत्पादक कृषकों को ऐसी शर्तों पर नील उगाने के लिए बाध्य करते थे, जो लाभप्रद नहीं था। आनाकानी करने वाले कृषकों के साथ अत्याचार करना भी आम बात थी। इन अत्याचारों के विरुद्ध कृषकों ने नील उत्पादन बंद कर दिया, उत्पादकों के बल प्रयोग का मुकाबला किया एवं अदालत भी गए। कृषकों दव्ारा आंदोलन में बंगाल के बुद्धिजीवियों एवं मिशनरियों ने भी सहयोग दिया। हिन्दू-मुस्लिम एकता भी देखने में आयी। पूर्ववर्ती विद्रोहों के प्रति कड़े रूख के दुखद अनुभव के कारण सरकार का रवैया संतुलित था। 1860 में सरकार ने नील आयोग गठित किया जिसकी अधिसूचना के कारण रैयत नील की खेती के लिए बाध्य नहीं किए जा सकते थे।

तेलंगाना आंदोलन

तेलंगाना विद्रोह 1946 ई. में हैदराबाद रियासत में प्रारंभ हुआ। किसानों ने जमींदार तथा निजाम के अधिकारियों के खिलाफ आंदोलन किए। इस आंदोलन में किसानों को राहत दिलाने के लिए कई सभाओं का आयोजन किया गया। जिसमें साम्यवादियों का नेतृत्व था। तेलंगाना आंदोलन आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा कृषक गुरिल्ला युद्ध था, जिसने तीन हजार गांवों को प्रभावित किया। हैदराबाद में 1948 ई. में भारतीय सेना के प्रवेश तक यह विद्रोह मुख्य रूप से निजामशाही के खिलाफ चलता रहा।

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