व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 15 for Uttarakhand PSC

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स्वतंत्रता की अवधारणा

टैगोर की स्वतंत्रता संबंधी अवधारणा राजनीतिक चिंतन की अमूल्य देन कही जाती है। संपूर्ण मानव समाज के लिए वे स्वतंत्रता को अपरिहार्य मानते थे। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का अर्थ है संपूर्ण मानवता के लिये विपत्ति का आहवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू ावन करना। टैगोर ने जिस स्वतत्रंता का प्रतिपादन किया उसका संबंध व्यक्ति के अंत: करण से था अर्थात आत्मा की स्वतंत्रता की चर्चा उन्होंने की।

गुरुदेव मानव के प्रकृतिगत विकास के समर्थक थे। इसलिए आत्मिक स्वतंत्रता पर उन्होंने बल दिया। उनकी स्वतंत्रता का प्रयोग व्यापक अर्थों में हुआ है न कि नागरिक स्वतंत्रता के अर्थों में। प्रथाओं एवं रूढ़ियों से मुक्त होना, मन एवं दृष्टिकोण के संकोच से मुक्ति पाना; उनकी स्वतंत्रता के मापदंड थे। उनके अनुसार सच्ची स्वतंत्रता के लिए उन्मुक्त मानसिक परिवेश एवं पारस्परिक सहानुभूति एवं संवेदनात्मक भावों का अस्तित्व आवश्यक है।

टैगोर की मान्यता थी कि हमारी आत्मा की स्वतंत्रता ही यथार्थ प्रगति के मार्ग को प्रशस्त्र कर सकती है। भारत की पराधीनता से मुक्ति के लिए, उनके अनुसार आवश्यक था कि आत्म शक्ति का संचय हो और अपने को नैतिक धरातल पर स्थापित किए जाए।

उन्हें उदारवादी नेताओं की याचना पद्धति से सख्त नफरत थी, ’हम लोग सोचते हैं कि हमारी नई शक्तिमान सरकार के साथ हमारा काम संवैधानिक आंदोलन से चल जाएगा। अत: उन्होंने देशवासियों के भीतर जागृति पैदा की कि स्वराज्य प्राप्ति के लिये आत्म निर्भरता एवं स्वतंत्रता आवश्यक है।’

उनका कहना था यदि हम राजनीति स्वतंत्रता प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते हैं तो हमें राजनीतिक लुटेरों से जो हमारी महान स्वतंत्रता (आत्मा की स्वतंत्रता) के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं, सहयोग नहीं करना चाहिए।

आर्थिक दृष्टिकोण

समाज की मूलभूत आवश्यकताओं में अर्थ प्रधान आवश्यकता है। टैगोर ने समकालीन आर्थिक प्रणाली को शोषण का पोषक बताया था। उनका तर्क था कि यह प्रणाली शक्तिशाली वर्ग दव्ारा कमजोर वर्ग का शोषण करती है। अत: यह व्यवस्था व्यक्ति के समष्टिगत विकास में सहायक नहीं है।

उनकी मान्यता थी कि समाज के अधिकांश लोग जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनकी उपेक्षा करके कोई भी सभ्यता बलवती नहीं हो सकती है। किन्तु टैगोर को यह बात बिल्कुल अमान्य थी कि मानव जाति का एकमात्र लक्ष्य आर्थिक विकास ही है। उनके अनुसार ’किसी राष्ट्र का आर्थिक जीवन एक पृथक तथ्य नहीं हो सकती है, तथा आधुनिक समाज में दरिद्रता के साथ-साथ सांस्कृतिक दरिद्रता भी विकसित हो रही है।’

भूखे व्यक्ति के लिए उनके हृदय में पीड़ा थी, नंगे एवे निराक्षित व्यक्ति के लिये वे चिंतित थे। किसानों के आर्थिक जीवन में सहकारी प्रणाली के वे समर्थक थे। उन्होंने नोबेल पुरस्कार से प्राप्त अधिकांश धन को असहाय एवं जनता में बाँट दिया था।

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