भारत में असमानता में वृद्धि (Increase in inequality in India-Economy)

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• बोस्टन कंसल्टिंग (परामर्श) ग्रुप (समूह) की 15वीं वार्षिक रिपोर्ट (विवरण), ”विनिंग (जीत) दी ग्रोथ (विकास) गेम (खेल): ग्लोबल (विश्वव्यापी) वेल्थ (धन) 2015” में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं।

• विश्व के सबसे अधिक 20 प्रतिशत निर्धन लोगों में लगभग 25 प्रतिशत लोग भारतीय हैं। इसमें चीन की संख्या केवल 3 प्रतिशत ही हैं।

• आज भारत के 1 प्रतिशत समृद्ध लोग, भारत की 49 प्रतिशत व्यक्तिगत संपत्ति के स्वामी हैं और शीर्ष 10 प्रतिशत भारतीय देश की 74 प्रतिशत व्यक्तिगत संपत्ति के स्वामी हैं।

• हालांकि, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि भारत में इस बढ़ती असमानता से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। यह आर्थिक विकास का सामान्य प्रवाह है। किसी एक शहरी स्थान पर बढ़ते हुए उद्योग समुच्चय, अपने संपूर्ण प्रभाव क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों के और अधिक विकास को प्रोत्साहन देते हैं। कुछ वर्षों तक, इससे आय और विकास के परस्पर अंतरों में बहुत अधिक वृद्धि होती है, परन्तु अधिकतम सीमा पर पहुंचने के बाद, असमानता उलटे ’यू’ शब्द के समान घटनी शुरू हो जाती है, जिसे हम कुज्नेट वक्र कहते हैं। इसे हम जॉन एफ. केनेडी के यादगार कथन ”उठती हुई लहरें सभी नावों को उठा देती है” के रूप में भी जानते हैं।

कुज्नेट वक्र

अर्थशास्त्र में, कुज्नेट वक्र एक परिकल्पना है जिसके अनुसार, जब अर्थव्यवस्था विकसित होती है तो पहले बाजार ताकतें बढ़ती हैं और उसके पश्चात आर्थिक असमानता में कमी आती है। यह परिकल्पना 1950 और 60 के दशक में अर्थशास्त्री कुज्नेट दव्ारा विकसित किया गया था।

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